लखनऊ : साल 1986 में सरकारी खजाने को भारी हानि पहुंचाने पर सेना के पूर्व कमांडर वर्क्स इंजीनियर, सैन्य इंजीनियरिंग सेवाओं के सैन्य दुर्ग इंजीनियरों समेत आठ आरोपितों को तीन साल की सजा सीबीआइ की विशेष न्यायाधीश प्रथम कविता मिश्रा ने सुनाई। इसके अलावा 1.25 लाख का जुमार्ना भी लगाया गया है।
सीबीआइ मामलों की विशेष न्यायाधीश कविता मिश्रा ने सत्यपाल शर्मा (लेफ्टिनेंट कर्नल), तत्कालीन कमांडर वर्क्स इंजीनियर (सीडब्ल्यूई), एमईएस, इलाहाबाद/(कर्नल प्रशासन, कमांड स्टेशन, श्रीनगर), वाईके उप्पल, तत्कालीन सैन्य दुर्ग इंजीनियर (पश्चिम), इलाहाबाद, केएस सैनी (लेफ्टिनेंट कर्नल), तत्कालीन सैन्य दुर्ग इंजीनियर (पश्चिम), इलाहाबाद, वीरेंद्र कुमार जैन, तत्कालीन सैन्य दुर्ग इंजीनियर (पूर्व), इलाहाबाद, एसएस ठक्कर (मेजर), तत्कालीन सैन्य दुर्ग इंजीनियर (वायुसेना), बमरौली, इलाहाबाद एवं विभिन्न काल्पनिक फर्मों के मालिक/साझीदार अशोक कुमार देवड़ा, अनिल कुमार देवड़ा, पवन कुमार देवड़ा को दोषी ठहराया और उन्हें तीन वर्ष की कारावास की सजा सुनाई।
सीबीआइ ने नवंबर 1983 से नवंबर 1985 की अवधि के बीच निर्धारित दिशानिदेर्शों से ज्यादा दरों पर 3.82 करोड़ रुपये की स्थानीय खरीद की। लेफ्टिनेंट कर्नल एस.पी. शर्मा, तत्कालीन कमांडर वर्क्स इंजीनियर (सीडब्ल्यूई), सैन्य अभियंता सेवा (एमईएस), इलाहाबाद एवं सीडब्ल्यूई, इलाहाबाद के तहत अन्य कर्मियों और निजी फर्मों के मालिकों/साझीदारों के विरुद्ध सन 1986 में वर्तमान मामला दर्ज किया था।
विशेष न्यायाधीश सीबीआइ प्रथम कविता मिश्रा ने प्राइवेट फर्मों के मालिक/साझीदार को तीन-तीन साल के कारावास के अलावा एक लाख साठ हजार का जुमार्ना लगाया। इन्हें अपील दाखिल करने के लिए जमानत पर छोड़े जाने का आदेश भी दिया।
कई की ट्रायल के दौरान हुई मौत
यह मुकदमा सीबीआइ कोर्ट के सबसे पुराने वादों में से था। सुनवाई के दौरान अभियुक्त मैकू लाल रावत तत्कालीन बैरक स्टोर आफिसर सीडब्लूई (एमईएस) इलाहाबाद, मेजर रंजन राय तत्कालीन गैरिसन इंजीनियर बमरौली इलाहाबाद व मेजर एनएस आरसी मूर्ति तत्कालीन गैरिसन इंजीनियर वायुसेना गोरखपुर की मृत्यु हो गई। सभी अभियुक्त 80 से 90 वर्ष की आयु के हैं।
कागजों पर दे दी थी सप्लाई, खातों में जमा कराई रकम
लखनऊ सीबीआइ की जांच में इलेक्ट्रिकल आइटम की आपूर्ति के मामले में दोषी पाए गए सैन्य अफसरों सहित आठ लोगों के खिलाफ कई पुख्ता सबूत मिले थे। इलेक्ट्रिकल आइटम के लिए जहां तय दर से अधिक के बिल पास कराए गए थे, वहीं प्रयागराज (तब इलाहाबाद), अयोध्या (उस समय फैजाबाद) और वाराणसी सैन्य स्टेशनों में इलेक्ट्रिक उपकरण की आपूर्ति कागजों पर ही की गई थी।
सैन्य अफसरों के बैंक खातों में इस घोटाले से जुड़ी रकम भी मिली थी। सीबीआइ की जांच में मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस की ठेकेदारी करने वाले जिन अशोक कुमार देवड़ा, अनिल कुमार देवड़ा और पवन कुमार देवड़ा को दोषी पाया गया है। उनकी कंपनी देवड़ा इलेक्ट्रिकल्स अब भी एमईएस के करोड़ो रुपये के ठेके लेती है। इस कंपनी के तार लखनऊ तक जुड़े हैं।
आइटी चौराहे के पास इन देवड़ा भाईयों से जुड़े करीबी रिश्तेदार का एक बड़ा शोरूम भी है। इन दिनों बिहार में कंपनी बड़े पैमाने पर काम कर रही है। इस पूरे फजीर्वाड़े की जांच सीबीआइ को भेजी गई शिकायत के आधार पर शुरू की गई थी।
साक्ष्य के साथ भेजी गई शिकायत में तत्कालीन कमांडर वर्क्स इंजीनियर (सीडब्ल्यूई) ले. कर्नल सत्यपाल शर्मा, गैरिसन इंजीनियर (पश्चिम) वाईके उप्पल, तत्कालीन गैरिसन इंजीनियर (पश्चिम) ले. कर्नल केएस सैनी, गैरिसन इंजीनियर पूर्व वीरेंद्र कुमार जैन, गैरिसन इंजीनियर वायुसेना मेजर एसएस ठक्कर के साथ ठेकेदार अशोक कुमार देवड़ा, अनिल कुमार देवड़ा, पवन कुमार देवड़ा की मिलीभगत के साक्ष्य भेजे गए थे। इसी के बाद सारा खेल खुल गया और फजीर्वाड़े से पर्दा उठ गया।