Thursday, May 7निर्मीक - निष्पक्ष - विश्वसनीय
Shadow

मलेरिया का ऐसा मामला भी:अफ्रीका में ड्रग रेसिस्टेंट मलेरिया के मामले सामने आए, मरीजों पर इसकी सबसे कारगर दवा बेसअर साबित हो रही; जानिए इसके क्या मायने हैं

अफ्रीका में ड्रग रेसिस्टेंट मलेरिया के मामले सामने आए हैं। यानी मलेरिया के खास तरह स्ट्रेन पर इसकी दवाएं बेअसर हो रही हैं। अफ्रीका के युगांडा में इसके प्रमाण भी मिले हैं। वैज्ञानिकों का कहना है, चिंता करने वाली बात यह है कि मरीजों पर मलेरिया की वो दवा बेअसर साबित हो रही है, दुनियाभर में जिसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल इसके इलाज में किया जाता है। ड्रग रेसिसटेंट मलेरिया के मामले बढ़ते रहे तो इसकी दवाएं मलेरिया को रोकने में नाकाम साबित होंगी।

कैसे पता चला मलेरिया का नया स्ट्रेन, अफ्रीका में इसका मिलना क्यों है सबसे ज्यादा खतरनाक, हर साल कितने लोग मलेरिया से दम तोड़ रहे… जानिए इन सवालों के जवाब-

कैसे पता चला कि मरीज पर दवा हुई बेअसर?

शोधकर्ताओं का कहना है, युगांडा में मलेरिया के जिन मरीजों का इलाज सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली दवा आर्टिमीसिनिन से किया जा रहा था, उनके ब्लड सैम्पल लिए गए। रिपोर्ट में 20 फीसदी तक सैम्पल में जेनेटिक म्यूटेशन की बात सामने आई। यानी मलेरिया के वायरस ने अपनी संरचना में इतना बदलाव कर लिया है कि दवा असर ही नहीं कर रही।

अफ्रीका में ड्रग रेसिस्टेंट मलेरिया के मायने क्या हैं?
इससे पहले एशिया में भी ड्रग रेसिस्टेंट मलेरिया का मामला सामने आ चुका है, लेकिन अफ्रीका में ऐसा मामला सामने आना बड़ी चिंता की बात है क्योंकि दुनियाभर में 90 फीसदी तक मलेरिया के मामले अफ्रीका में सामने आते हैं। अगर यहां यह स्ट्रेन पैर पसारता है तो मलेरिया को काबू करना मुश्किल हो जाएगा।

अफ्रीका में कहां से आया यह खतरनाक स्ट्रेन?
न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में बुधवार को पब्लिश रिसर्च कहती है, मलेरिया का यह स्ट्रेन अफ्रीका के आसपास वाले बॉर्डर में फैल सकता है। शोधकर्ताओं ने मलेरिया के इस ड्रग रेसिस्टेंट स्ट्रेन के युगांडा में ही विकसित होने की आशंका जताई है। उनका मानना है कि मलेरिया का यह स्ट्रेन बाहर से नहीं आया, बल्कि यहीं पनपा है।

सैन फ्रांसिस्को की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. फिलिप रोजेनथल का कहना है, रवांडा के बाद युगांडा में मलेरिया का ऐसा मामला मिलना साबित करता है कि यह अफ्रीका में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। मलेरिया का ड्रग रेसिस्टेंट स्ट्रेन कुछ सालों पहले कम्बोडिया में मिला था जो फैलकर एशिया तक पहुंच चुका है। इसी तरह ये भी अफ्रीका में भी फैला है और मलेरिया के मामलों को भविष्य में और बढ़ा सकता है।

हर साल इससे 4 लाख से अधिक लोग दम तोड़ रहे
मलेरिया मच्छरों के काटने से फैलता है। मलेरिया के कारण हर साल 4 लाख से अधिक लोग दम तोड़ देते हैं। इसका सबसे ज्यादा खतरा 5 साल से कम उम्र के बच्चों और गर्भवती महिलाओं को रहता है।

वर्ल्ड मलेरिया रिपोर्ट 2020 के मुताबिक, मलेरिया से होने वाली 90 फीसदी मौतें अफ्रीका में हुई हैं, इसमें 2,65,000 से अधिक बच्चे थे। 2000 में मलेरिया के 7,36,000 मामले थे जो 2018 तक घटकर 4,11,000 हो गए। 2019 में मलेरिया के 4,09,000 मामले सामने आए।

सीख लेने की जरूरत, 70 साल की कोशिशों के बाद मलेरियामुक्त हुआ चीन

70 साल की लगातार कोशिश के बाद चीन हाल में ही मलेरियामुक्त हुआ। मलेरिया से निपटने के लिए चीन ने 2012 में 1-3-7 की रणनीति लागू की। स्वास्थ्य कर्मियों के लिए टार्गेट तय किए किए। रणनीति के मुताबिक, 1 दिन के अंदर मलेरिया के मामले को रिपोर्ट करना अनिवार्य किया गया। 3 दिन के अंदर इस मामले की पड़ताल करना और इससे होने वाले खतरे का पता लगाना जरूरी किया गया। वहीं, 7 दिन के अंदर इस मामले को फैलने से रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने की बात कही गई थी।

मलेरिया के खिलाफ चीन ने कब-कब कदम उठाए

  • 1950: तेजी से फैल रहे मलेरिया के मामलों को रोकने के लिए मलेरिया की दवाओं पर काम करना शुरू किया। घरों में कीटनाशक का छिड़कने की रणनीति बनाई।
  • 1967: चीन ने मलेरिया का नया इलाज ढूंढने के लिए अभियान शुरू किया। नतीजा, यह हुआ कि 1970 में आर्टिमिसनिन दवा की खोज हुई जो अब तक की मलेरिया की सबसे असरदार दवा साबित हुई है।
  • 1980: चीन ऐसा पहला देश बना जिसने मलेरिया को रोकने के लिए लगातार बड़े स्तर पर जांच शुरू की और कीटनाशक से लैस मच्छरदानी का इस्तेमाल शुरू किया।
  • 1988: देशभर में 25 लाख मच्छरदानी बांटी गईं। मलेरिया की जांच और सावधानियों के कारण धीरे-धीरे इसके मामले कम होने शुरू हुए।
  • 1990: 90 के दशक के अंत तक मलेरिया के मामले घटकरा 1,17,00 रह गए। मौत के आंकड़े में 95 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *