जोधपुर
जोधपुर की बेटी साईमा सैयद तमाम बंदिशों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने के लिए चट्टान सी खड़ी रहीं। इसका ही नतीजा है कि वो घुड़सवारी में वन स्टार रैंक हासिल करने वाली पहली महिला घुड़सवार बन गई हैं। वो भी महज 20 साल की उम्र में। उन्हें 40 से 100 किलोमीटर की रेस पूरी करनी होती है, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचा आसान नहीं था। कॉम्पीटीशन में पार्ट लेने के लिए लीज पर घोड़ा और घोड़ी लेनी पड़ती है। एक रेस के लिए एक लाख रुपए तक की कीमत चुकाई। इस वजह से परिवार को भी दिक्कत आई, यहां तक की पिता को एक प्लॉट तक बेचना पड़ा।
पढ़िये बीस वर्षीय साईमा की जुबानी, कैसे हासिल किया यह मुकाम….
साईमा ने बताया कि परिवार में खेल का माहौल शुरू से मिला। दस सदस्यों के परिवार में सात राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं। दादा ने हॉकी में नाम कमाया तो पिता मोइनुल हक ने क्याकिंग में। जबकि दो भाई सटीक निशाने साध शूटिंग में अपना नाम चमका रहे थे। ऐसे में मेरा खेलों से जुड़ना तय था। और उतर पड़ी खेल के मैदान में। कई खेलों में खुद को आजमाया। हर खेल में लड़के व लड़कियों के खेल अलग, यह कुछ जमा नहीं। तो किसी ने बताया कि घुड़सवारी में महिला व पुरुष में कोई भेदभाव नहीं है। ऐसे में उसे आजमाने का फैसला किया। घुड़सवारी आकर्षित तो बहुत करती है, लेकिन इसके लिए न केवल मजबूत इच्छा शक्ति बल्कि कद काठी भी उसी के अनुरूप चाहिए। साथ ही काफी महंगा खेल है। मयूर चौपासनी स्कूल में पहली बार घुड़सवारी की इच्छा पूरी की और फिर घोड़ों के साथ मैंने एक मजबूत रिश्ता बना लिया। यह सफर अब तक जारी है।
परेशानियां भी कम नहीं झेली
वन स्टार रैंक हासिल करने से बधाइयों का अंबार लगा है, लेकिन इस मुकाम को हासिल करने के लिए मैंने अपनी घोड़ी के साथ घंटों पसीना बहाया है। इसमें पिता के साथ पूरे परिवार का साथ मिला। फिलहाल मेरे पास मारवाड़ी नस्ल की एक घोड़ी है। उसके साथ मेरा अभ्यास चलता है। लेकिन प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए लीज पर घोड़े लेने पड़ते हैं। एक रेस के लिए एक लाख रुपए तक का भुगतान करना पड़ता है। साल में साईमा कम से कम 6 से 7 रेस करती हैं। इतने पैसों की व्यवस्था करना परिवार के लिए काफी दिक्कतों वाला रहा, लेकिन उन्होंने मेरी ख्वाहिश को टूटने नहीं दिया। यहां तक कि अपना प्लॉट तक बेच डाला।

साईमा सैयद कई अवॉर्ड अपने नाम कर चुकीं।
ऐसे होती है ट्रेनिंग
सिर्फ घोड़ों को भगाने से ही यह रेस नहीं जीती जा सकती है। ऐसे में तीन दिन घुड़सवारी का अभ्यास करती हूं। तीन दिन व्यायाम व अन्य खेलों के जरिए खुद को तरोताजा रखने की कोशिश रहती है। घोड़े की पीठ पर घंटों बैठना अपने आप में बेहद थका देने वाला अनुभव होता है। उसके लिए शारीरिक के साथ ही मानसिक मजबूती की दरकार रहती है।

ट्रेनिंग के लिए फिजिकल के साथ ही मानसिक मजबूती की दरकार रहती है।
क्या है ऐंडयूरेन्स रेस
घोड़ों की ऐंडयूरेन्स रेस को काफी मुश्किल माना जाता है। इसमें घोड़े के साथ ही घुड़सवार के कौशल के साथ ही शारीरिक दमखम की परीक्षा होती है। यह रेस 40, 60, 80, 100 व इससे अधिक किलोमीटर लंबी होती है। इस रेस के दौरान प्रत्येक 20 किलोमीटर के अंतराल से घोड़े के साथ ही घुड़सवार का परीक्षण किया जाता है। उसमें खरे उतरने पर उन्हें नंबर प्रदान किए जाते है और फिर अगला चरण शुरू होता है। एक गलती किसी को रेस से बाहर कर सकती है। अंत में जितने लोग रेस पूरी करते है, उनके बीच रास्ते में मिले नंबरों के आधार पर विजेता का फैसला होता है। घुड़सवार से ज्यादा घोड़े का वेलफेयर जरूरी है। घोड़े के पल्स रेट, डी हाइड्रेशन, बीपी, लेमनेस, चोट आदि के परीक्षण किए जाते हैं। घोड़े की सेहत को पहली प्राथमिकता दी जाती है। घोड़े का सही रहना उसके राइडर की काबिलियत की पहचान कराता है।
क्या है स्टार रैंकिंग
इक्वेस्ट्रीयन फैडरेशन ऑफ इंडिया ऐंडयूरेन्स रेस में भाग लेने वाले घुड़सवारों की रैंकिंग तय करती है। इसके आधार पर उन्हें वन स्टार की रैंक प्रदान की जाती है। इस रैंक के आधार पर अब विदेशों में आयोजित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने की सुविधा हो जाती है। वर्तमान में ऐंडयूरेन्स रेस में देशभर में 200 खिलाड़ी है। इनमें 20 लड़कियां भी शामिल हैं। गुजरात के करण पटेल, महाराष्ट्र के तौसीफ अहमद व राजस्थान की साईमा सैयद ही अभी तक वन स्टार की रैंक हासिल कर पाई है।