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महामारी में अपनों में दूर हुए डॉक्टर्स बोले; उस मुश्किल दौर में हम डॉक्टर्स होने के साथ मरीज के लिए फैमिली भी थे, कैसे पीछे हटते

चुनौती भरा एक-एक लम्हा और पल-पल बढ़ते मौतों के आंकड़े ने सबसे ज्यादा परेशान डॉक्टर्स को किया। मरीजों को बचाने की जद्दोजहद में ये अपनों से दूर हुए। कई रातों तक सो नहीं पाए। इनमें से कई डॉक्टर्स ऐसे भी थे, जिन्होंने अपनों को खोया लेकिन मरीजों का साथ नहीं छोड़ा।

आज डॉक्टर्स डे है। यह दिन जाने-माने डॉक्टर बिधान चंद्र रॉय की याद में मनाया जाता है। डॉ. बिधान चंद्र स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री भी रहे।
महामारी के इस दौर में अभी भी डॉक्टर्स और आम लोगों के लिए चुनौतियों का दौर खत्म नहीं हुआ है। डॉक्टर्स डे के इस मौके पर जानिए, महामारी ने डॉक्टर्स का जीवन कितना बदला और क्या सबक दिए…

कोरोना की दूसरी लहर में मरीजों में नए तरह के मामले ज्यादा दिखे

मसीना हॉस्पिटल मुम्बई की कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. सोनम सोलंकी कहती हैं, महामारी का सामना करते हुए एक साल से अधिक बीत चुका है। इस दौरान कोविड को समझा गया, यह वायरस किस तरह से व्यवहार करता है, इसे भी पहचाना। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात रिस्क जोन को समझना रहा। महामारी के दौरान, हमारे पास ऐसे युवा मरीज आए जो आमतौर पर रिस्क जोन में नहीं आते, लेकिन जब इनमें संक्रमण हुआ तो हालत बेहद नाजुक हो गई।

कोरोना से संक्रमित कुछ ऐसे मरीज भी आए जिन्हें पहले से कोई बीमारी नहीं थी, लेकिन उनमें संक्रमण का स्तर बेहद गंभीर था। कुछ ऐसे मरीज भी थे जो होम क्वारैंटाइन हुए लेकिन 24 से 48 घंटे बाद हालत तेजी बिगड़ने लगी। ऐसे में मामलों में तेजी से बढ़ता संक्रमण डराने वाला था।

इस तरह की चुनौतियां हमारे लिए नई थीं, जो कोरोना की पहली लहर से काफी अलग थीं। दूसरी लहर में डेल्टा वैरिएंट ने मामले बढ़ाए। मुझे और मेरे स्टाफ को चुनौतियों का सामना करना पड़ा। अभी भी कुछ कहना मुश्किल है कि आगे क्या होगा, लेकिन हमे बीमारी से लड़ना जारी रखना होगा।

अपनों से मिलने का समय नहीं बचा, कई बार खाना तक नहीं खा सका

ग्लोबल हॉस्पिटल मुम्बई के सीनियर पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. हरीश चाफले कहते हैं, महामारी के दौरान एक समय जब हर तरफ सन्नाटा था और टीवी पर कोरोना की दिल दहला देने वाली खबरें आ रही थीं, तब कई कोरोना वॉरियर मिसाल भी पेश कर रहे थे। चीन में एक नर्स ने सिर के बाल मुंडवा लिए थे, ताकि बालों से संक्रमण न फैले। वु यालिंग नाम की एक दूसरी नर्स अपनी मां की मौत होने के कुछ ही मिनटों बाद वापस मरीजों के इलाज में जुट गई।महामारी में डॉक्टर्स और मेडिकल स्टाफ ने पूरी मेहनत के साथ लगातार काम किया। कोविड वार्ड में काम करते हुए मेरा जीवन के प्रति नजरिया बदला। एक डॉक्टर के तौर पर कोविड से हुई मौतों के कारण तनाव बढ़ा। कई बार खाना तक नहीं खा सका। लगातार एन-95 मास्क पहनने के कारण चेहरे पर रैशेज और दाने पड़ गए। खानपान का रूटीन बिगड़ने के कारण वजन बढ़ गया। फैमिली मेम्बर्स और दोस्तों के लिए समय नहीं बचा। अभी भी अलर्ट रहने की जरूरत है। उम्मीद करता हूं, महामारी का यह दौर जल्द ही खत्म होगा। हम वापस उसी तरह से जी सकेंगे जैसे महामारी के पहले समय बिताते थे।

पहली बार ऐसी महामारी देखी जिसकी कोई दवा उपलब्ध नहीं है

मसीना हॉस्पिटल के कंसल्टेंट चेस्ट फिजिशियन डॉ. सुलेमान लधानी कहते हैं, जीवन में पहली बार इस तरह की महामारी का सामना करना पड़ा है जिसकी कोई दवा नहीं। हम सब महामारी के दौरान मरीजों को बचाने और इलाज के तरीके खोजते रहे।

यह दौर इसलिए भी चुनौतीभरा रहा क्योंकि हम सिर्फ डॉक्टर्स ही नहीं है बल्कि बीमारी से लड़ रहे मरीजों के लिए एक परिवार की तरह थे, कैसे पीछे हटते। इन हालातों ने हमें एक नया नजरिया दिया। महामारी का एक सकारात्मक पहलू यह भी रहा है कि हम सब नई डिजिटल तकनीक को करीब से समझ पाए। मरीजों को ऑनलाइन देखने का ट्रेंड शुरू हुआ। उनसे दूर रहते हुए भी मदद की जा सकी। हम सब अपनी स्पेशिएलिटी को भूलकर सिर्फ और सिर्फ कोविड का इलाज करने में जुटे रहे। मानसिक रूप से मजबूत हुए।

इसके ठीक उलट हम अपने फैमिली मेम्बर्स से दूर हुए लेकिन उनके साथ रिश्ता और मजबूत हुआ। इलाज के बाद मरीजों के चेहरे पर आई मुस्कान ने हमे प्रेरित किया। मैंने ईश्वर को धन्यवाद अदा करता है कि लोगों की सेवा करना का अवसर हमे मिला। सफर जारी है, उम्मीद करते हैं कि तीसरी लहर को रोक सकें और जल्द से जल्द महामारी खत्म हो।

मरीजों को बचाने के दौरान पिता का साथ छूटा तो परिवार ने सम्भाला

जसलोक हॉस्पिटल के सीनियर इनटेंसिविस्ट डॉ. पिनांक पांड्या कहते हैं, कभी किसी ने सोचा नहीं था कि इतनी जिंदगियां प्रभावित होंगी, खासतौरपर फंटलाइन वर्कर। पहली लहर से लड़ने के बाद थोड़ी राहत मिली थी कि दूसरी लहर ने शरीर और दिमाग दोनों पर असर डाला। लम्बे समय तक काम करने के कारण लगातार खुद और अपनों के संक्रमित होने का डर बना रहता था। लेकिन मैं तब टूट गया जब कोरोना के कारण इसी साल जुलाई पिता जी का साथ छूट गया। ऐसे हालत में परिवार में मुझे सम्भाला और अब भी महामारी के थमने का इंतजार कर रहा हूं।

दूसरी लहर ने यह बताया कि कोरोना कितना खतरनाक है और इसके लिए हमेशा तैयार रहने की जरूरत है। ज्यादा से ज्यादा जांच के कारण इसे कंट्रोल किया जा सका। अब वैक्सीन से इसे कंट्रोल किया जा सकता है।

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