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कैंसर के इलाज में दी जाने वाली इम्यूनोथैरेपी के साइड इफेक्ट से बचाएगी गठिया की दवा, जानिए ऐसा होता क्यों है

कैंसर के इलाज में दी जाने वाली इम्यूनोथैरेपी के कारण कई बार मरीजों को साइड इफेक्ट झेलना पड़ता है। लेकिन गठिया की दवा से ऐसे साइड इफेक्ट से बचा सकती है। इन दवाओं को टीएनफ अल्ट्रा इन्हीबिटर कहते हैं। गठिया के मरीजों में सूजन होने पर ये दवाएं दी जाती हैं। यह दावा जेनेवा यूनिवर्सिटी और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में किया है।

शोधकर्ताओं का कहना है, कैंसर के मरीजों को इम्यूनोथैरेपी देने पर कई बार सांस लेने में कठिनाई, मांसपेशियों में दर्द, वजन बढ़ना और सिरदर्द जैसे साइड इफेक्ट दिखते हैं। ऐसे साइड इफेक्ट को रोकने में गठिया की दवाएं असरदार हैं।

ऐसे हुई रिसर्च
शोधकर्ता माइकल पिटेट कहते हैं, जब इम्यून सिस्टम अधिक तेजी से काम करता है तो शरीर में सूजन भी तेजी से बढ़ती है। शरीर पर इसका बुरा असर पड़ता है। कई बार स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचने लगता है। इसलिए हम चाहते थे कि कैंसर खत्म करने के दौरान ऐसे साइड इफेक्ट को कैसे रोका जाए।

इसके लिए हमने इम्यूनोथैरेपी के कारण इम्यून सिस्टम पर पड़ने वाले पॉजिटिव और निगेटिव असर को समझा। रिसर्च के लिए सबसे पहले कैंसर के मरीजों की लिवर बायोप्सी की गई। ये ऐसे मरीज थे जो इम्यूनोथैरेपी के साइड इफेक्ट से जूझ रहे थे।

इम्यूनोथैरेपी से ऐसे होता है साइड इफेक्ट
इम्यूनोथैरेपी के बाद साइड इफेक्ट के लिए दो तरह की कोशिकाएं जिम्मेदार होती हैं। पहली-मैक्रोफेज और दूसरी न्यट्रीफिल। ये स्वस्थ ऊतकों पर अटैक करती हैं लेकिन कैंसर वाली कोशिकाओं को नहीं मारतीं। इम्यूनोथैरेपी की दवाएं ऐसे प्रोटीन का निर्माण करने लगती है जो रोगों से बचाने वाले इम्यून सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है। यहीं से साइड इफेक्ट की शुरुआत होती है।

वहीं, डेंड्रिटिक कोशिकाएं कैंसर को खत्म करने का काम करती हैं। हालांकि, ये दुर्लभ होती हैं और मैक्रोफेज-न्यूट्रिफिल अधिक पाई जाती हैं। इसलिए इम्यूनोथैरेपी की दवा शरीर में पहुंचने के बाद ये एक्टिव हो जाती हैं और साइड इफेक्ट का खतरा बढ़ता है।

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