राजस्थान में बढ़ती गर्मी के साथ राजस्थान के कुछ गांवों में लोगों को अपनी प्यास बुझाने के रोज घंटों मेहनत करनी पड़ रही है। इसके बावजूद लोगों को साफ पानी नहीं मिलता। जैसे-तैसे कुछ मटमैला पानी मिलता है। कुछ दिन काम चलाता है। फिर पानी के मेहनत शुरू हो जाती है। ऐसा ही मामला जालोर जिले के चितलवाना में भी रोज देखने के लिए मिलता है। जहां 6 गांवों के करीब 10 हजार लोग बेरियों से निकलने वाले मटमैले पानी से प्यास बुझा रहे हैं। तालाब के सूखे पेटे में खुदे गड्ढे़ स्थानीय बोली में बेरी कहे जाते हैं।
इस इलाके में तमाम सरकारें आजादी के 7 दशक बाद भी पानी का इंतजाम नहीं कर पाई हैं। ये हालात जिला मुख्यालय से 200 किमी दूर स्थित भवातड़ा, रणखार, आकोडिय़ा, कुकडिय़ा जैसे गांवों के हैं। क्योंकि यहां न नल हैं न हैंडपंप।
5 से 7 फीट गहरी होती है बेरी
तालाब में बारिश का पानी सूखते ही गांव वालों के पास बेरी का ही विकल्प बचता है। बेरी 3 फीट चौड़ी व 5 से 7 फीट की गहरी होती है। जिले के अंतिम गांव भवातड़ा के तालाब में 40 से अधिक कच्ची बेरियां 1 साल में खुदी हुी हैं।

बेरी में से रस्सी के सहारे निकाला जाता है पानी।
कुछ दिन मीटा रहने के बाद पानी हो जाता है खारा
ग्रामीण गफूर खां ने बताया कि एक कच्ची बेरी 20 से 25 तो कुछ 2 दिन में सूख जाती हैं। नई बेरी खोदने में पूरा दिन लग जाता है। कुछ दिन ही पानी मीठा रहता है। फिर खारा हो जाता है, जिसे पशु पीते हैं। बेरी का पानी खारा हो जाने ग्रामीण आपस में मिलकर नई बेरी खोदते हैं। यही नियती बन चुकी।

कुछ दिन में ही खारा हो जाता है पानी। फिर जानवरों के आता है काम।
अधिकारियों का कहना- टैंकर से पहुंचा रहे पानी
जलदाय विभाग के एक्सईएन बीएल कुमावत का कहना है कि क्षेत्र में अभी पानी के टैंकर पहुंचा रहे।हैं। भवातड़ा में सरपंच ने भुगतान नहीं होने की बात कहते हुए कुछ दिनों से टैंकरों को बंद करवा दिया है। नेहड़ क्षेत्र को पेयजल से जोडऩे के लिए अभी दो साल लग जाएंगे। जल जीवन मिशन के तहत 2 वर्षों में जोड़ दिया जाएगा।

तालाब सूखने के बाद लोग बेरी खोदकर बुझाते हैं प्यास।
15 दिन से एक भी टैंकर नहीं पहुंचा
प्रशासन का दावा है कि पानी की समस्या के चलते नेहड़ क्षेत्र के सभी गांवों में पानी टैंकरों में पहुंचाया जा रहा हैं। भवातड़ा में पिछले करीब 15 दिनों से एक भी टैंकर नहीं पहुंचा है। यहां के ग्रामीण कच्ची बेरी का ही पानी पी रहे हैं।