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रेतीले धोरों में मिश्री सा मीठा खजूर, अरब देशों से लाई गई 64 किस्मों में से छह का चयन

बीकानेर. रेतीले धोरों में कम लम्बाई के खजूर के पेड़ और उन पर मिश्री सी मिठास वाले फल लगाने का अनूठा अनुभव बीकानेर के केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान में होता है। करीब 5 हैक्टेयर में खजूर की बागवानी हो रही है। इनमें 2 हैक्टेयर में खजूर की अच्छी पैदावार भी दे रहे है। संस्थान ने अरब देशों में उगने वाले ६४ प्रकार की किस्मों के खजूर के पौधों का यहां प्रशिक्षण किया गया। शुष्क बागवानी संस्थान में स्थानीय वातावरण के अनुरूप पाई किस्म की बागवानी शुरू की है। मूल्यांकन में ६ किस्म के खजूर यहां शानदार फल-फूल रहे है।

शुष्क बागवानी संस्थान के बगीचे में खड़े खजूर के प्रत्येक पेड़ से औसत ६० से ८० किलो खजूर निकल जाते है।
हालांकि उत्पादन इससे दो गुणा होता है। परन्तु बारिश आदि के मौसम में फल खराब हो जाते है। यहां पैदा होने वाले खजूर का फल मिश्री सा मीठा है। जो अरब देशों से देश में आयात होकर भी आता है। रेतीले धोरों वाले इस इलाके में भविष्य में इन खजूरों की बागवानी होने का विकल्प खुला है।

कम कीमत में मिलते हैं
खजूर के उत्पादन के हिसाब से इनकी रेट तय होते है। संस्थान में यह खजूर 30 रुपए प्रति किलो के हिसाब से मिलती है। वही साफ करने के बाद डिब्बे में बंद खजूर 50 रुपए प्रति डिब्बे के रेट पर मिलते है। मुख्य सड़कों पर भी खजूर के ठेले लगते है। जहां भी लोग खरीदारी करते है।

दोनों तरह के पौधे जरूरी
खजूर में नर-मादा पौधे अलग-अलग होते है। इसलिए खजूर की खेती करते समय 5 से 10 प्रतिशत नर पौधे लगाने भी आवश्यक होते है। प्रमुख नर पौधों में घनामी व एल-एन-सीटी है। नर पौधों की अनुपस्थिति में फ ल नहीं होंगे। खजूर में हाथ से परागण करवाना पड़ता है।

यह किस्में प्रमुख
मेडजूल, हलावी, बरही, खुनेजी, खलास, जाहिदी

मुनाफे की खेती
खजूर की खेती सिंचित क्षेत्र में एक लाभदायक साबित होती है। ताजा फल के रूप में इसका विपणन करने से अच्छा लाभ मिलता है। आवश्यकता इस बात की है कि फल तोडऩे के बाद सफाई कर हवादार डिब्बे में पैकिंग कर विक्रय किया जाए। एेसा करने से ज्यादा लाभ मिलता है।
-प्रो. पीएल सरोज, निदेशक केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान बीकानेर

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