जयपुर
चुनाव में बड़े चहरों और स्थापित नाम वाले नेताओं के ही जीतने की थ्योरी को बीजेपी अब बदलाना चाहती है। बीजेपी ने नेता की जगह कार्यकर्ता आधारित चुनाव जीतने का गुजरात मॉडल राजस्थान में भी पूरी तरह से लागू करने का फैसला किया है। गुजरात मॉडल के तहत मजबूत बूथ मैनेजमेंट और चुनाव की रणनीतिक तैयारी से अनाम चेहरों को भी चुनाव जितवाने की कवायद पार्टी ने शुरू कर दी है। इस मॉडल ने बड़े नेताओं की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
गुजरात मॉडल के तहत ही बीजेपी ने सशक्त मंडल अभियान शुरू कर दिया है। अगले साल अप्रैल तक इस अभियान के तहत हर बूथ तक 25 वोटर पर एक कार्यकर्ता की ड्यूटी लगाई जाएगी। कार्यकर्ता को वोटरों से संपर्क करने का जिम्मा दिया जाएगा। यह तैयारी चुनाव से डेढ़ साल पहले ही हो जाएगी। विधानसभा और लोकसभा चुनाव से पहले कार्यकर्ता लगातार अपने वोटर से संपर्क में रहेगा। इस व्यवस्था से बीजेपी के पास ग्राउंड जीरो से लगातार राजनीतिक फीडबैक मिलता रहेगा कि जनता क्या सोच रही है। बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया का कहना है कि गुजरात मॉडल के तहत पार्टी ने काम शुरू कर दिया है। फोकस बूथ मैनेजमेंट पर है। अप्रैल तक मंडल से लेकर बूथ तक पन्ना प्रमुख लग जाएंगे। यह राष्ट्रीय स्तर का अभियान है, हम हर वोटर तक पहुंचेंगे।
यह है बीजेपी का गुजरात मॉडल
बीजेपी ने गुजरात के सूरत से इसकी शुरूआत की। वोटर लिस्ट के एक पन्ने में जितने वोटर होते हैं, उन पर एक कार्यकर्ता की नियुक्ति की। फिर उसके आधे पन्ने पर जितने वोटर होते हैं, उन पर अर्ध पन्ना प्रमुख की नियुक्ति की गई। यह काम चुनाव से डेढ़ से दो साल पहले ही कर लिया। जिन कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी गई, उनसे पार्टी नेताओं ने लगातार फीडबैक लिया। चुनाव में बूथ मैनजमेंट और वोटर को बूथ तक लाने में इन्हीं कार्यकर्ताओं को लगाया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी का ग्राउंड कनेक्ट मजबूत हो गया, वोटर से लगातार संपर्क बना रहा। दूसरी पार्टियां इसके मुकाबले मेहनत नहीं कर पाई और कई अनाम चेहरे भी आसानी से चुनाव जीत गए। अब बीजेपी इस गुजरात मॉडल को पूरे देश में लागू करना चाहती है।
पिछले चुनाव से हो चुकी शुरुआत, लेकिन अधूरा काम होने से फायदा नहीं
पिछले चुनावों में भी बीजेपी ने पन्ना प्रमुख और विस्तारक लगाए थे, लेकिन यह काम सब जगह नहीं हुआ। पन्ना प्रमुख कागजों में तो लग गए, पर ग्राउंड पर काम नहीं हुआ था। पार्टी सत्ता में थी, गुजरात मॉडल पूरी तरह से लागू नहीं हुआ। पिछली बार रही कमियों को इस बार विपक्ष में रहते हुए बीजेपी दूर करना चाहती है।
गुजरात मॉडल से सेकंड लाइन के नेताओं का महत्व घटने की संभावना
गुजरात मॉडल पूरी तरह लागू हुआ तो इससे क्षेत्रीय क्षत्रपों का महत्व कम हो जाएगा। नेताओं के बूते चुनाव जीतने के मॉडल की जगह कार्यकर्ता आधारित सिस्टम तैयार होने से सियासी समीकरण बदल जाएंगे। उम्मीदवार चयन में भी इस मॉडल से बहुत कुछ बदल जाएगा। बीजपी कैडर बेस पार्टी होने से पहले से ही कार्यकर्ता आधारित मॉडल है, लेकिन अभी चुनाव में हाइब्रिड मॉडल अपनाया जाता है। अब पूरी तरह कैडर बेस सिस्टम तैयार होने से सेकंड लाइन के नेताओं का महत्व और दबदबा कम हो सकता है।
नई लीडरशिप को राज्यों में स्थापित करने की कवायद
गुजरात मॉडल से बीजेपी का राष्ट्रीय नेतृत्व अपनी पसंद के नए नेताओं को स्थापित करने की कवायद में है। राज्यों में पुराने स्थापित नेताओं के बराबर नई लीडरशिप तैयार की जा रही है। चुनाव के गुजरात मॉडल से क्षेत्रीय और स्थानीय नेताओं का उतना दबदबा नहीं रह जाएगा। गुजरात मॉडल के सियासी साइड इफेक्ट को लेकर बीजेपी के भीतर खूब चर्चाएं हैं। बीजेपी के कई नेता दबी जुबान में यह मान रहे हैं कि इस मॉडल से चुनाव जितवाने का श्रेय किसी क्षेत्रीय नेता को जाएगा ही नहीं, सब कुछ हाईकमान और सिस्टम आधारित हो जाएगा। पार्टी का राष्ट्रीय अभियान होने से कोई नेता इस मॉडल के सियासी साइड इफेक्ट पर बोलने को तैयार नहीं हैं।