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यहां मुस्लिम भाइयों की कलाई पर सजती है राखी:50 सालों से हिंदू बहनें बांध रही हैं राखी, 1991 के दंगों में भी नहीं टूटा बंधन; शादी समेत अन्य धार्मिक कार्यक्रमों में दोनों परिवार होते है शामिल

टोंक

रक्षाबंधन का पर्व हिंदू भाई-बहन के अटूट रिश्ते का प्रतीक है। टोंक जिले के आवा कस्बे में हिंदू परिवार की बेटियों ने इस पर्व को हिंदू- मुस्लिम भाईचारे की पहचान बना दी हैं। ब्राह्मण परिवार की बहनें 50 साल से मुस्लिम भाइयों के राखी बांधती आ रही है। इस दौरान दोनों परिवारों ने न तो धार्मिक बंधन और न लोगों के तानों की परवाह की। ताज्जुब की बात तो यह है कि 1991 में हिंदू-मुस्लिमों के बीच बिगड़े सांप्रदायिक सौहार्द में भी राखी का यह बंधन नहीं टूटा। आज भी इन दोनों परिवारों का रिश्ता सगे की तरह है। शादी से लेकर अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में परिवार के सदस्य की तरह शामिल होकर पूरी जिम्मेदारी निभाते है। आज सरदार अली को लोग मामू के नाम से जानते हैं।

टोंक निवासी 75 साल सरदार अली ने बताया कि 65 साल पहले उनके फूफाजी पुलिस चौकी में मुंशी (कॉन्स्टेबल) के पद पर थे। वह यहां परिवार के साथ रहते थे। करीब 8 साल की उम्र से वह भी उनके पास ही रहता था। करीब 20-22 साल की उम्र में सरदार अली की शादी हो गई। वह तत्कालीन शिक्षक राधेश्याम चतुर्वेदी के पड़ोस में किराए के मकान में रहने लगे। इस दौरान दोनों परिवारों के आचार-विचार इस तरह से मिलता गया कि इनमें आज भाइयों जैसा व्यवहार बन गया।

करीब 20 साल पहले शिक्षक पद से रिटायर्ड हो चुके राधेश्याम चतुर्वेदी की तीन बेटियां 50 साल से सरदार अली के परिवार की सदस्य है। हर साल रक्षाबंधन पर्व पर राखी बांधती आ रही है। यह अटूट रिश्ता आज भी दोनों परिवार बखूबी निभा रहे है। यह रिश्ता यहां तक ही सीमित नहीं रहा। राधेश्याम चतुर्वेदी की बेटियों के बाद अब उनकी पोत्रियां भी सरदार अली के बेटों व पोत्रों के राखी बांध रही है।

करीब 10 साल पहले राधेश्याम की बेटी कविता शर्मा की शादी में सरदार अली और उनकी पत्नी दूल्हा दुल्हन को आशीर्वाद देते हुए। (फाइल फोटो)

करीब 10 साल पहले राधेश्याम की बेटी कविता शर्मा की शादी में सरदार अली और उनकी पत्नी दूल्हा दुल्हन को आशीर्वाद देते हुए। (फाइल फोटो)

सरदार अली की तीन बेटियों की शादियों में की मदद

इन दोनों परिवारों की परस्पर घनिष्ठता इस तरह है कि एक परिवार का दुख तो दूसरे परिवार का दुख और एक परिवार का सुख तो दूसरे परिवार का सुख की धारणा बनी हुई है। सरदार अली की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। 4 क्लास तक पढ़े-लिखे सरदार अली शुरुआत में माइक को किराए पर देकर अपनी आजीविका चलाते थे। फिर धीरे-धीरे साइकिल मैकेनिक की दुकान खोली। अभी भी वे ये ही काम करते है। उनकी तीन बेटियों शकीला बानो, शमीम बानो और नसीम बानो का निकाह किया तो सारी जिम्मेदारी इस हिंदू परिवार ने संभाली। यहां तक कि आर्थिक सहयोग भी किया।

सरदार अली के पौत्र शैरू की डेढ़ साल पहले हुई शादी में राधेश्याम चतुर्वेदी की पत्नी व सरदार अली की पुत्रवधू। (फाइल फोटो)

सरदार अली के पौत्र शैरू की डेढ़ साल पहले हुई शादी में राधेश्याम चतुर्वेदी की पत्नी व सरदार अली की पुत्रवधू। (फाइल फोटो)

सरदार अली सरपंच का लड़ चुके हैं चुनाव
सरदार अली बचपन से व्यवहारिक थे। हिंदू-मुस्लिम धर्म से ऊपर उठ कर वे इंसानियत को ज्यादा मानते हैं। उनके इस कुशल व्यवहार के मुरीद होकर लोगों ने करीब 40 साल पहले उन्हें सरपंच का चुनाव लड़वाया था। दूसरे प्रत्याशी पूर्व मंत्री प्रभुलाल सैनी और सरदार अली को बराबर मत मिले थे। लॉटरी सिस्टम से प्रभुलाल सैनी सरपंच बने थे। दोनों का यह पहला चुनाव था।

शेरू की शादी में स्टेज प्रोग्राम में राधेश्याम चतुर्वेदी का बड़ा बेटा महावीर व परिवारजन। (फाइल फोटो)

शेरू की शादी में स्टेज प्रोग्राम में राधेश्याम चतुर्वेदी का बड़ा बेटा महावीर व परिवारजन। (फाइल फोटो)

बेटे-बेटियों के रिश्ता निभाते देख दोनों परिवार
मामू के नाम से चर्चित सरदार अली और उनके दोस्त शिक्षक राधेश्याम चतुर्वेदी ने बताया कि करीब 50 -55 साल पुरानी उनकी दोस्ती हुई थी। दोस्ती आज भी भाइयों की तरह कायम है। सबसे ज्यादा खुशी तो इस बात की है कि अभी भी उनके बेटे-बेटियां इस रिश्ते को सगे की तरह निभा रहे हैं। सरदार अली के दो बेटे और तीन बेटियां हैं। बेटियां शकीला बानो, शमीम बानो, नसीम बानो और बेटे अफजल अली, सोकत अली है। राधेश्याम चतुर्वेदी के तीन बेटे और तीन बेटियां हैं। इनमें बेटियां सरला, अंजू, माया चतुर्वेदी और बेटे महावीर, नारायण व बनवारी चतुर्वेदी है।

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