बांसवाड़ा
राजस्थान में बारिश के लिए कई जतन किए जाते हैं। कहीं ढोल-नगाड़ों के साथ गांव में जुलूस निकाला जाता है तो कहीं रातभर भजन होते हैं। राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में एक ऐसा गांव है जहां इंद्रदेव को मनाने के लिए रासलीला होती है। इस दौरान लोग भगवान का वेश धारण कर गांव पहुंचते हैं और बताते हैं कि देवी-देवता धरती पर आ गए हैं। यह देवी-देवता मिलकर वाटर प्रोजेक्ट बनाते हैं और इंद्रदेव को बुलाते हैं। इनमें भगवान कृष्ण बना युवक इंद्रदेव को बारिश करने का आदेश देता है।
यह गांव है, बांसवाड़ा जिले से 12 किलोमीटर दूर बड़ोदिया। सदियों पुरानी स्थानीय परंपरा को दोहराते हुए बुनकर समाज के कलाकार बरसात की गुहार कर रहे लोगों की आवाज को इंद्र देवता तक पहुंचाने में जुटे हैं। पीढ़ियों से हो रहे ऐसे अनोखे प्रयोग को लेकर ग्रामीण भी खासे उत्साहित रहते हैं। बकायदा बुनकर समाज के लोगों को बुलाने के लिए इन्हें नारियल देकर न्योता भेजा जाता है। रात भर समाज के लोग भगवान इंद्रदेव को मनाने के लिए रासलीला करते हैं। इसके बाद सुबह यह लोग पास के मंदिरों में जाकर धोक लगाते हैं और बारिश की कामना करते हैं।

किरदार के अनुरूप उसकी शक्तियों का प्रदर्शन करते कलाकार।
नारियल भेजकर देते हैं न्योता
बरसात में देरी के बीच अनूठी परंपरा की शुरुआत तब होती है, जब वैष्णव (भगवान विष्णु के उपासक) समाज के पंच प्रमुखों की ओर से बुनकर समाज को नारियल भेजकर न्योता दिया जाता है। लोगों को मुसीबत में देख वैष्णव समाज रासलीला करने की अपील करता है। तब बुनकर समाज के कलाकार पांच ऋषियों का रूप बनाकर गांव में आते हैं। आमजन उनसे परिचय मांगता है। जवाब में वह ऋषि खुद की पहचान भगवान के प्रतिनिधि के तौर पर बताते हैं। इसके बाद एक ब्राह्मण का आगमन होता है, जिसकी पत्नी काशी स्नान तक उसके साथ थी, लेकिन बाद में भीड़ में खो जाती है। ब्राह्मण उसकी पत्नी को खोजते हुए गांव में आता है और उसकी पत्नी को ढूंढने में सहयोग करने की मांग करता है। तभी गांव वाले उसके ब्राह्मण होने पर शक करते हैं और उससे प्रमाण मांगते हैं। पावागढ़ वाली मां जगदम्बा, नारद ऋषि, इंद्र देवता, राधा और गोपियों का भी आगमन होता है। अलग-अलग पात्र बारी-बारी से उनकी पहचान को साबित करने के लिए प्रदर्शन करते हैं। यह मंचन पूरी रात चलता है। सुबह के समय सभी बुनकर किरदार गांव के सभी मंदिरों में जाते हैं। साथ ही पूरी रात की गई तपस्या के प्रतिफल में बारिश की प्रार्थना करते हैं।

सिर पर कलश रख उस पर जलाते हैं ज्योत।
पीढ़ियों से है मान्यता
यह अनूठी परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है। कमलेश बुनकर (समाज के प्रदेश प्रवक्ता) बताते हैं कि रासलीला का आयोजन देवराज इंद्र को मनाने के लिए होता है। गांव के गौतमलाल और रूपजी बुनकर की मानें तो उनका समाज भगवान कृष्ण का वंशज है। मथुरा में जुलाहा के तौर पर पहचान रखने वाली जाति को राजस्थान में बुनकर कहते हैं। कृष्ण वंश की नजदीकी के कारण ही देवराज इंद्र उनकी पुकार को प्राथमिकता से सुनते हैं। मुसीबत में उन्हें देख भगवान धरती पर अवतार लेकर लीलाएं करते हैं। लोगों की ओर से रातभर भजन-कीर्तन होते हैं। इंद्र-इंद्राणी, राधा-कृष्ण और गोपिकाओं के साथ मां जगदम्बा धरती पर पानी की जरूरत का आकलन करती हैं। इसके बाद भगवान कृष्ण इंद्र को पानी बरसाने के आदेश देते हैं। इस रासलीला के माध्यम से समाज के लोग इंद्र को पानी के अभाव छाई मायूसी बताते हैं।
बुनकर समाज के ही कोदरा भाई कहते हैं कि यह प्रदर्शन इतना आसान नहीं होता। सिर पर भगवान का कलश रखकर उसके ऊपर दीपक जलाया जाता है। बिना किसी सहारे के मां जगदम्बा की शक्तियों का भी जिक्र किया जाता है। इसमें भोड़ोजी अवतार और ब्राह्मण की खोई हुई पत्नी के बाद दूसरी शादी के बारे में भी बताते हैं।