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राज्यों को OBC लिस्टिंग का अधिकार:आज राज्यसभा में पेश हो सकता है संविधान संशोधन विधेयक, कल लोकसभा ने इसे बिना विरोध के पास किया

नई दिल्ली

राज्यों को OBC की लिस्टिंग करने का अधिकार देने वाला बिल आज राज्यसभा में पेश किया जा सकता है। लोकसभा ने मंगलवार को इसे मंजूरी दे दी थी। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने यह बिल पेश किया। लोकसभा में बिल पर वोटिंग के दौरान इसके पक्ष में 385 वोट पड़े। वहीं, विपक्ष में एक भी वोट नहीं पड़ा। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने सोमवार को ये बिल पेश किया था। इसका नाम संविधान (127वां संशोधन) विधेयक-2021 है।

संसद में 127वां संशोधन संविधान के अनुच्छेद 342A(3) में बदलाव के लिए लाया गया है। इसके बाद राज्य OBC की लिस्ट अपने हिसाब से तैयार कर सकते हैं। खास बात यह है कि सदन में पेगासस, किसानों जैसे मुद्दों पर हंगामा कर रहे विपक्ष ने भी इस बिल को बगैर किसी शोरशराबे के पास होने दिया। लोकसभा के बाद राज्यसभा में भी बिल के पास होने के बाद इसे राष्ट्रपति से मंजूरी मिलनी बाकी रहेगी। इसके बाद यह कानून बन जाएगा।

लोकसभा में बिल के पक्ष में 385 वोट पड़े, जबकि इसके विरोध में एक भी वोट नहीं आया।

लोकसभा में बिल के पक्ष में 385 वोट पड़े, जबकि इसके विरोध में एक भी वोट नहीं आया।

विधेयक पर सरकार के साथ आया विपक्ष
मानसून सेशन में हंगामे और विरोध के बीच, इस बिल पर पहली बार केंद्र सरकार को विपक्ष का सपोर्ट मिला। लोकसभा में सोमवार को संविधान का 127वां संशोधन बिल पेश होने से पहले विपक्षी पार्टियों ने कहा था कि वे इस बिल को लेकर सरकार के साथ हैं। दरअसल, इस संशोधन के लोकसभा और राज्यसभा में पास होने के बाद राज्यों को ये अधिकार मिल जाएगा कि वो OBC की लिस्ट में अपनी मर्जी से जातियों की लिस्टिंग कर सकें।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया था मराठा आरक्षण
इसी साल 5 मई को सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में मराठा समुदाय को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मिले आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया था। यह आरक्षण आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था। कोर्ट ने कहा था कि 50% आरक्षण की सीमा तय करने वाले फैसले पर फिर से विचार की जरूरत नहीं है। मराठा आरक्षण 50% सीमा का उल्लंघन करता है।

आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
राज्य सिफारिश कर सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा था कि राज्यों को यह अधिकार नहीं कि वे किसी जाति को सामाजिक-आर्थिक पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लें। राज्य सिर्फ ऐसी जातियों की पहचान कर केंद्र से सिफारिश कर सकते हैं। राष्ट्रपति उस जाति को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के निर्देशों के मुताबिक सामाजिक आर्थिक पिछड़ा वर्ग की लिस्ट में जोड़ सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने देश में कुल आरक्षण की ऊपरी लिमिट 50% तय कर रखी है।

सुप्रीम कोर्ट ने देश में कुल आरक्षण की ऊपरी लिमिट 50% तय कर रखी है।

रिजर्वेशन की लिमिट तोड़ने का अधिकार नहीं
मराठा समुदाय के लोगों को रिजर्वेशन देने के लिए उन्हें शैक्षणिक और सामाजिक तौर पर पिछड़ा वर्ग नहीं कहा जा सकता। मराठा रिजर्वेशन लागू करते वक्त 50% की लिमिट को तोड़ने का कोई संवैधानिक आधार नहीं था।

इंदिरा साहनी के केस के बाद 50% लिमिट तय हुई

  • 1991 में पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने आर्थिक आधार पर सामान्य श्रेणी के लिए 10% आरक्षण देने का आदेश जारी किया था। इस पर इंदिरा साहनी ने उसे चुनौती दी थी।
  • इस केस में नौ जजों की बेंच ने कहा था कि आरक्षित सीटों, स्थानों की संख्या कुल उपलब्ध स्थानों के 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए। संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया गया है। तब से यह कानून ही बन गया।

कई राज्यों में आरक्षण को लेकर आंदोलन जारी
विपक्ष लंबे समय से यह मांग कर रहा है कि राज्यों में आरक्षण की तय सीमा को खत्म कर दिया जाए। अभी राज्य 50% से ज्यादा आरक्षण नहीं दे सकते हैं। दरअसल, आरक्षण को लेकर कई राज्यों में आंदोलन चल रहे हैं। कर्नाटक में लिंगायत, गुजरात में पटेल, हरियाणा में जाट और महाराष्ट्र में मराठा समुदाय आरक्षण की डिमांड कर रहे हैं और इसे लेकर आंदोलन भी जारी हैं।

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