भरतपुर
शुक्रवार देर रात टोंक हादसे में भरतपुर के कामां तहसील के 4 युवकों की मौत हो गई। इन्हीं में से एक अरिहंत जैन था। उसका रविवार को ही जन्मदिन था। मौत उसे भरतपुर के कामा से टोंक खींच ले गई। पिता कुमकुम जैन और मां सुधा का इकलौता बेटा अब उनके कारोबार को आगे नहीं बढ़ा पाएगा। बड़ी बहन महक हर साल उसे हाथ से बनाकर राखी बांधती थी। रक्षाबंधन से पहले ही अरिहंत उसकी थाली में सजी राखी छोड़कर चला गया। अब तीनों की आंखों में सिर्फ आंसू हैं। कोरोना के समय पिता के साथ हर जरूरतमंद की मदद करने वाले अरिहंत के लिए उन लोगों की दुआ भी ज्यादा दिन तक साथ नहीं दे सकी। कस्बे का लाडला अब छोड़कर जा चुका है। जरूरतमंदों के लिए तो कोई और दूसरा अरिहंत आ जाएगा, लेकिन परिवार के लिए उनके बेटे की भरपाई कभी नहीं हो सकती। पूरा परिवार उसके जन्मदिन पर उसे सरप्राइज देना चाहता था। उदयपुर में बर्थ-डे पार्टी और फिर उज्जैन में महाकाल के दर्शन के बाद लौटते ही कारोबार की पूरी जिम्मेदारी दी जाने वाली थी। यही था उसका सरप्राइज।

मां सुधा और पिता कुमकुम के साथ बेटा अरिहंत। (फाइल फोटो)
बेटा कारोबार आगे बढ़ाता
अरिहंत पढ़ाई के साथ-साथ पिता कुमकुम जैन के कारोबार में मदद भी कर रहा था। पिता सीमेंट का कारोबार करते हैं। कुमकुम व्यापारियों के बीच कहते रहते थे कि मेरा बेटा होनहार है। जितना कारोबार मैं करता हूं, देखना वह उसे बहुत आगे लेकर जाएगा। पिता को यह नहीं पता था कि उसके परिवार के लिए वह आगे का रास्ता कैसे विकट मोड़ पर लाकर खड़ा करने वाला है। रास्ता बहुत कठिन है। अब कुमकुम के सामने कलेजे के टुकड़े की बॉडी पड़ी है। वह बेहाल हैं। बेसुध हैं।

अरिहंत की बहन महक, जिसने अब भाई को खो दिया है।
वो महक है, इसलिए महकती रहे…, लेकिन अब सिर्फ आंसू
अरिहंत छोटा था। बीए कर रहा था। बहन महक के लिए हमेशा बड़े भाई की भूमिका में दिखता था। कस्बे के हर जरूरतमंद की मदद को वह आगे रहता था। बहन के लिए भी हर मौके पर वह आगे खड़ा दिखता था। बहन के लिए अपार प्रेम था। वह उसे खुश रखने के लिए हर संभव प्रयास किया करता था। रो-रोकर बहन की आंखें सूख गई हैं। अब वह भाई के लिए राखी की थाल नहीं सजा पाएगी।

मां सुधा के साथ अरिहंत। (फाइल फोटो)
मां बड़ी जिम्मेदारी देने को आतुर थीं
मां सुधा जैन घटना के बाद से बेसुध हैं। हर मां की तरह वह भी अरिहंत में बचपना ही देखती थी। परिवार में जब भी वह घर से बाहर जाता, वह घबराती थीं। आज उसे इतनी बड़ी जिम्मेदारी देने वाली थीं। बेहद खुश थीं। पर मां की खुशी का वह पल आ नहीं पाया। अब वह मां की गोद से छिटक चुका है।
कोरोना में पेट भर जाए, रोटी के लिए तड़पना न पड़े, बस यही धुन सवार थी
अरिहंत पिता की प्रवृत्तियों को अपना रहा था। वह स्वाभाविक था। पूजा-पाठ और धार्मिक प्रवृत्ति अब उसके भी जीवन का अंग बन चुके थे। इसी स्वभाव ने सेवा का भाव भी जागृत किया। लॉकडाउन में कारोबार बंद था, लेकिन सेवा का यह भाव जागृत था। रोज कुमकुम उठते थे और घर से निकल पड़ते थे। पीछे-पीछे अरिहंत भी। मन में आया, मेरा कारोबार तो बड़ा है, साल दो साल बंद भी रहा तो संकट नहीं आएगा, लेकिन जो रोज कमाकर खाते हैं, उनका क्या होगा। बस यही सोच बेटे अरिहंत के साथ बेसहारों की मदद किया करते थे। पूरे लॉकडाउन में हर तबके की मदद करते रहे। बस पेट भर जाए, रोटी के लिए किसी को तड़पना नहीं पड़े। यही धुन सवार थी।