बांसवाड़ा
बांसवाड़ा शहर से महज 10 किलोमीटर दूर रूंजिया गांव में बारिश में चिता जलाना बड़ी चुनौती बनी हुई है। करीब 400 परिवार वाले गांव में श्मशान की सुविधा तक नहीं है। इसके चलते ग्रामीणों को गुरुवार को उस समय परेशानी का सामना करना पड़ा, जब गांव की 55 वर्षीय लक्ष्मी पत्नी कमरू सारेल की बीमारी से मौत हो गई। शव लेकर परिवार श्मशान पहुंचा तो चिता तैयार करते ही बारिश तेज हो गई। तब चिता को जलाने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। श्मशान से एक किलोमीटर दूर गांव जाकर ग्रामीणों ने तिरपाल तलाशा। बाद में तिरपाल को छाते का रूप देकर शव का अंतिम संस्कार किया। दोपहर दो बजे श्मशान पहुंचे ग्रामीण करीब 4 घंटे तक बरसात से जूझते रहे। तब कहीं जाकर चिता आग पकड़ पाई।

छाता बनाने के बाद चिता ने पकड़ी आग।
संघर्ष की कहानी लंबी
गांव के भवानी निनामा ने बताया कि यहां रूंजिया वड़लापाड़ा में करीब 1500 मतदाता हैं। पिछले 10 साल से ग्रामीण यहां श्मशान बनवाने के प्रयास कर रहे हैं। तत्कालीन राज्यमंत्री जीतमल खांट से भी यहां श्मशान बनवाने की अपील की थी। तब तत्कालीन सरपंच ने लापरवाही बरती। समय पर प्रस्ताव नहीं लिए। अब नए सरपंच से भी कई बार अपील कर चुके हैं, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं है। जिला परिषद में बार-बार सरपंच से प्रस्ताव दिलाने को कहा जाता है। कुछ समय पहले गढ़ी विधायक कैलाश मीणा से भी अपील की थी। उन्होंने स्थानीय सरपंच से पत्र लिखवाकर भिजवाने को कहा था, लेकिन अब तक पत्र नहीं पहुंचा है। ऐसे में श्मशान के प्रस्तावों को गति नहीं मिली है। हमेशा मानसून के दौरान चिताओं को जलाने के लिए ऐसी ही तकलीफें आती हैं।

ग्रामीणों ने यूं ताना तिरपाल।
सेंक्शन के लिए भिजवाया
रूंजिया सरपंच दीपक डिंडोर ने मामले में कहा कि उन्होंने श्मशान की सेंक्शन को लेकर पंचायत समिति तलवाड़ा को लिखा है। एक दिन पहले ही उन्होंने नया पाड़ा और रूंजिया में श्मशान के लिए सेंक्शन भिजवाई है। उम्मीद है कि अब लोगों को परेशान नहीं होना पड़ेगा।