जयपुर
राजस्थान में पहली बार किसी अफसर की ओर से सरकारी ऑर्डर में ब्यूरोक्रेसी की पूरी चेन पर दबाव डालने का मामला सामने आया है। मामला पाली जिले की रायपुर तहसील में एक आवासीय जमीन के कन्वर्जन को रद्द करने का है। हाईलेवल के दबाव का तत्कालीन तहसीलदार नरेंद्र सिंह पंवार का लेटर सामने आने से ब्यूरोक्रेसी में पाली से जयपुर तक हलचल मच गई है। तत्कालीन तहसीलदार नरेंद्र सिंह ने हाईलेवल से आए प्रेशर का पूरा ब्योरा आर्डर शीट में लिखा है। इसमें बताया कि रायपुर तहसील में मील कॉलोनियों आवासीय जमीन के कंवर्जन किया गया था और इसे रद्द करने के लिए जयपुर से साहब के कहने पर कलेक्टर और रायपुर तहसीलदार लगातार दबाव बनाते रहे। जबकि जिन धाराओं का हवाला दिया गया है उसमें ऐसा मामला बनता ही नहीं। उसका यह भी आरोप है कि नौकरी ध्यान में रखने तक भी धमकी दी गई। इधर, कलेक्टर का कहना है कि यह आरोप गलत है और बेकडेट में आर्डर जारी किए गए जबकि एपीओ तहसीलदार अब भी इस बात पर बना है कि उस पर बेवजह का प्रेशर बनाया गया।
साहब के कहने पर ‘साहब’ का दबाव
रायपुर तहसील के मील कॉलोनी में 8 साल पहले रेजिडेंशियल जमीन में कन्वर्जन किया गया था। रायपुर की कुछ कॉलोनियों में पिक एंड चूज के आधार पर जमीन का कंवर्जन रद्द करने की कार्रवाई के दबाव की बात सामने आ रही है। तहसीलदार के लेटर के मुताबिक, मामले को टीनेंसी एक्ट के तहत केस बनाकर तहसीलदार पर खातेदार को बेदखल करने के लिए जयपुर से साहब के कहने पर पाली कलेक्टर और एसडीएम ने दबाव बनाया। रायपुर तहसीलदार ने दावा किया कि मामला इन धाराओं में बनता ही नहीं।
गलत तरीके से बेदखली का प्रकरण दर्ज करने के लिए फोन का हवाला
रायपुर तहसीलदार ने लिखा- मौखिक रूप से एसडीएम कार्यालय में तहसीलदार को बुलाकर बताया गया कि कलेक्टर का बार-बार फोन आ रहा है कि मिल कॉलोनी का प्रकरण दर्ज कर कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही? तब एसडीएम के कहने पर रेवेन्यू इंस्पेक्टर रायपुर व पटवारी हल्का रायपुर सेकेंड से रिपोर्ट लेकर 1849/1, 1849/3, 1849/5, 1849/7. 1849/8, 1849/10, 1849/11, 1849/12 1849 / 13 किस्म आवासीय इकाई का धारा 177 और धारा 212 के तहत प्रकरण तत्परता से तैयार कर एसडीएम को पेश किया गया।
एसडीएम ने कलेक्टर और जयपुर से बार बार मैसेज आने की बात कह नौकरी की धमकी दी
रायपुर तहसीलदार ने आगे लिखा- एसडीएम कार्यालय से मील कॉलोनी का प्रकरण दर्ज करने के लिए कोई भी लेटर जारी नहीं किया गया। न ही किसी की लिखित में शिकायत प्राप्त हुई। तहसीलदार का कहना है कि मुझे कलेक्टर , चेनाराम सरपंच प्रतिनिधि और जयपुर से मैसेज आने की बात व दबाव डालकर प्रकरण तैयार करने को कहा गया। यह भी कहा कि अपनी नौकरी का ख्याल रखना, तब मैंने कहा कि नौकरी किसी की दान में नहीं दी हुई है।

रायपुर के तत्कालीन तहसीलदार का लेटर
यह प्रकरण बेदखली का बनता ही नहीं
तहसीलदार ने आगे ऑर्डरशीट में लिखा है – इस तरह के मामले धारा 177 के प्रकरण में नहीं आते हैं। फिर भी एसडीएम ने दबाव बनाकर रिपोर्ट पेश करने को कहा। पटवारी हल्का रायपुर द्वितीय और आरआई रायपुर ने फिर से विड्रो के लिए रिपोर्ट पेश की, जो एसडीएम को 6 मई 2021 को भेज दी गई। उसने बताया कि यह रूपान्तरण कन्वर्जन आठ साल पहले के हैं। मेरे से पहले भी कई तहसीलदार रहकर गए हैं। रायपुर और हरिपुर तहसील में इस तरह के कई प्रकरण होंगे, लेकिन मुझ पर दबाव बना इसी प्रकरण की रिपोर्ट तैयार कर पेश करने को कहा। जबकि यह मामला धारा 177 की परिभाषा के अनुरूप नहीं है इसे खारिज किया जाना उचित होगा।
पाली कलेक्टर ने कहा- तहसीलदार ने एपीओ होने के बाद बैकडेट में लेटर लिखा
पाली कलेक्टर अंशदीप ने कहा- आरोप दबाव में लगाए हुए प्रतीत हो रहे हैं। मुझे रायपुर तहसील की कुछ अवैध कॉलोनियों के बारे में बताया गया था, जिसके बाद एसडीएम को गाइडलाइन के मुताबिक आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। तहसीलदार को मैंने कोई निर्देश नहीं दिए। हमने जांच के बाद पाया कि तहसीलदार ने एपीओ होने के बाद बैकडेट में लेटर लिखा है।
एपीओ तहसीलदार नरेंद्र सिंह बोले- मैंने जो लिखा, वह सही है
नरेंद्र सिंह पंवार ने कहा, मैंने ऑर्डर में जो लिखा है, वह सही लिखा है। गलत बात क्यों लिखूंगा। आठ साल पहले आवासीय जमीन का कन्वर्जन किया था, जो किया मेरे से पहले के तहसीलदारों ने किया। कानून सम्मत जो बात थी, वह मैंने लिख दी।
क्या है टीनेंसी एक्ट की धारा 177 और 212
राजस्व मामलों के जानकार आरएस बत्रा के मुताबिक, टीनेंसी एक्ट की धारा 177 में कृषि भूमि का आवासीय में कन्वर्जन करवाने के 5 साल के भीतर उस पर मकान बनाना जरूरी है। अगर पांच साल में मकान नहीं बनता है, तो उसका कन्वर्जन रद्द कर दिया जाता है। जमीन खातेदार के पास ही रहती है। अगर कृषि से आवासीय में कंवर्ट की गई जमीन किसी गैर एससी व्यक्ति ने एससी के व्यक्ति से खरीदी है और 5 साल में उसका उपयोग नहीं किया है तो ऐसी हालत में उस जमीन का कन्वर्जन रद्द कर उसे सिवायचक में दर्ज कर लिया जाता है। मतलब वह जमीन सरकारी हो जाती है। टीनेंसी एक्ट की धारा 212 में किसी जमीन की आगे कोई गतिविधि नहीं करने पर स्टे दिया जाता है। राजस्थान में एससी से खरीदी हुई ऐसी जमीनों के 50 हजार से ज्यादा मामले हैं।