बीकानेर. हमारे तालाबों और तलाइयों पर संस्कृति साकार होती है। जब पानी से लबालब भरे होते है तो इनके किनारे हरियाली के बीच लोग गोठ और गोठों का आनंद लेते है। अब शहर के एक दर्जन से अधिक तालाबों में पानी सूख चुका है। देखभाल के अभाव में इनमें कचरा, गंदगी के साथ झाडि़यां उगी हुई है। बरसात का पानी तालाब में आने के रास्ते अवरूद्ध हो चुके है। तालाबों में पानी आने के लिए बारिश के दौर शुरू होने का इंतजार है। राजस्थान पत्रिका ने बरसात से पूर्व शहर के तालाबों के हालात की पड़ताल की। अधिकांश में पानी सूख चुका है अथवा पैंदे में नाम मात्र का पानी शेष है। तालाबों में पानी सूखने से सबसे ज्यादा परेशान भीषणगर्मी में जीव-जंतु और पशु-पक्षी हो रहे है। वे इन तालाबों पर अपना गला तर करते है।
संस्कृति में रचे-बसे हैं जलस्रोत
बीकानेर की संस्कृति में कुए, बावड़ी और तालाबों का अपना महत्व है। तालाबों-तलाइयों पर मेले-मगरियों के आयोजन होते है। पूजा-अर्चना के कई आयोजन इनसे जुड़े हुए है। हालांकि सभी तालाब रियासत के बने हुए है। तब दानदाताओं और भामाशाहों ने पारंपरिक जल स्त्रोतों के रूप में इनका निर्माण कराया था। अब इनके पानी को शहरवासी पेयजल के लिए उपयोग नहीं करते। शहर के बाहरी क्षेत्र के तालाब वन्य जीव-जंतु की प्यास बुझाते है। शहर में तालाबों किनारे पशुओं के पानी पीने के लिए खेलियां बनी हुई है। आस-पास पेड़-पौधे भी है। कई तालाबों का संस्थाएं संरक्षण करती है। जो इनके पानी से पेड़-पौधों को सींचती है।
अतिक्रमण ने बिगाड़े हालात
तालाबों के आस-पास आगोर और सारण के लिए छोड़ी जमीनों पर अतिक्रमण हो रहे है। प्रशासन इस तरफ ध्यान नहीं देता। कोई शिकायत भी करता है तो कार्रवाई नहीं होती। हालात एेसे हो गए है कि तालाबों में पानी आने के रास्ते तक बंद कर दिए गए है। यही वजह है कि बरसात के दौरान इन तालाबों में थोड़ा-बहुत पानी आता है। वही सालभर इनमें रहता है।
अधिकतर तालाब सूखे
हर्षोल्लाव, संसोलाव, महानंद सहित अधिकतर तालाब और तलाइयां खाली है। हर्षोल्लाव में बचे पानी पर काई जमी हुई है। यही स्थिति संसोलाव तालाब की है। सागर तालाब में चार-पांच फ ुट पानी है। शहर में 16 तालाब और 54 तलाइयां दर्ज है। धरणीधर तालाब में पानी रहने के दौरान लोगों की खूब रौनक देखने को मिलती है।
गोठों और गंठों का दौर
92 वर्षीय घेटड़ महाराज ओझा बताते है कि पहले सावन में बारिश के दौरान तालाब और तलाइयां पानी से लबालब हो जाती थी। सुबह से शाम तक पानी में गंठे लगाने का दौर चलता था। तालाबों के किनारे गोठो के आयोजन होते ही रहते थे। मेले सा माहौल रहता था। तालाब के पानी में मनोरंजन पूर्ण खेल चलते रहते थे।
ये हैं मुख्य तालाब
शहर में रियासतकाल के संसोलाल तालाब, हर्षोल्लाव तालाब, फू लनाथ तालाब, घड़सीसर तालाब, नृसिंह सागर तालाब, ब्रह्मसागर तालाब, देवीकुंड सागर तालाब, शिवबाड़ी तालाब, नाथ सागर आदि तालाब है।
तीन गांवों की प्यास बुझाते थे
सागर गांव के 65 वर्षीय दीनाराम ने बताया कि कई वर्षों पहले देवीकुंड सागर तालाब में साफ पानी था। इसके पानी से तीन गांव अपनी प्यास बुझाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब बहुत कम पानी है लेकिन, वो भी गंदा है। जिसका उपयोग नहीं कर सकते है।
जलस्रोत किसी भी शहर के फेफ ड़े
&पारंपरिक जलस्त्रोतों की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है। जितनी पहले थी। बल्कि आज उनका महत्व ज्यादा है। आधुनिक जीवन की जटिलताओं से उपजे विडंबना बोध के लिए पारम्परिक जलस्रोत उपचार केंद्र है। पारंपरिक जलस्त्रोत किसी भी समाज के फेफ ड़े होते हैं। तालाब हमारे लिए आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र हैं। इनकी रक्षा और संरक्षण समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए।
-ब्रजरतन जोशी, जल और समाज पुस्तक के लेखक
तालाबों की स्थिति
-धरणीधर
करीब 40 फि ट गहरा
अभी 5 से 6 फीट पानी
उपयोग पेड-पौधों में पानी देने के लिए
-संसोलाव
करीब 15 फीट गहरा
नाम मात्र पानी
जीव-जंतु और पशु-पक्षी पीते है
-हर्षोलाव
करीब 28 फीट गहरा
करीब 1 से 2 फीट पानी
जीव-जंतु पीते है
-महानंद तलाई
करीब 20 फीट गहरा
सूखा पड़ा है
झाडिय़ां उगी हुई है।
-देवीकुंड सागर
करीब 15 फीट गहरा
4 से 5 फि ट पानी
वन्यजीव और बेसहरा पशु पीते है
-शिवबाड़ी तालाब
करीब 20 फीट गहरा
1 से 2 फीट पानी
जीव-जंतु और पशु-पक्षी बुझाते है प्यास