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गवरीदेवी बिना माइक आज भी तेज आवाज में गाती हैं, पौत्री को दे रहे ट्रेनिंग; लॉकडाउन में कोई प्रोग्राम नहीं होने से आर्थिक संकट

पाली

मांड गायकी का जिक्र हो और पाली की मांड गायिका गवरी देवी राव के नाम पर चर्चा न हो ऐसा हो नहीं सकता। मांड गायकी में देश भर में नाम कमाने वाली गवरी देवी अब 83 वर्ष की हो चुकी है। इस उम्र में जहां ज्यादातर लोग कई तरह की बीमारियों की चपेट में आ चुके होते हैं, लेकिन गवरीदेवी पर मानो उम्र हावी नहीं हो रही। आज भी उनकी सुरीली आवाज का जादू कायम है। वे आज भी बिना माइक के अपने सुरीले गले से ऊंचे सुर लगा लेती हैं। विरासत में मिले मांड गायकी के अपने इस हुनर को अब वे आठवीं में पढ़ने वाली अपनी पौत्री गंगा को पारंगत करने में लगी हैं। जो कई मौके पर अपनी दादी के साथ मंच साझा करती नजर आती हैं।

गवरी देवी के नाम से बसी कॉलोनी, जहां गवरीदेवी रहती हैं।

गवरी देवी के नाम से बसी कॉलोनी, जहां गवरीदेवी रहती हैं।

गवरीदेवी का जन्म बाड़मेर जिले के कोरण गांव में हुआ था। उनके माता-पिता भी पेशेवर कलाकार थे। उनसे ही उन्होंने मांड गायिका का हूनर सीखा। मिश्रीलाल राव से शादी के बाद वे उनके साथ देश भर में कई मंचों पर मांड गायन की प्रस्तुति देकर गवरीदेवी ने खूब वाह वाही लूटी। एक समय था जब दूरदर्शन, ऑल इंडिया रेडियो पर उनके नियमित कार्यक्रम आते थे। सरकारी बुक सुजस में वर्ष 2014 में गवरी देवी के नाम पूरा लेख प्रकाशित हुआ था। सर्वोदय नगर से कुछ आगे रेलवे पटरी किनारे गवरीदेवी के नाम से एक कॉलोनी आबाद है। वहीं पर मांड गायिका गवरी देवी वर्तमान में अपने परिवार के साथ रह रही हैं।

लॉकडाउन में झेलना पड़ा आर्थिक संकट

मुलाकात के दौरान उन्होंने बताया कि राजस्थानी लोक गीतों में मांड गायिकी का अपना विशिष्ट स्थान हैं। मांड गायिकी तीन नाम शीर्ष पर रहे हैं। इनमें जोधपुर की गवरीदेवी, बीकानेर की अल्लाह जिल्लाइ बाई के नाम उनका नाम भी शामिल हैं। गवरीदेवी ने बताया कि मांड गायिकी के जरिए उनका घर चलता है। लॉकडाउन के चलते पिछले करीब दो वर्षों में कोई प्रोग्राम नहीं मिल सका। इससे आर्थिक रूप से परेशानियों का सामना करना पड़ा है। अब फिर से बुलावे आने लगे हैं, उसकी तैयारी में जुटे हैं। जिससे घर खर्च चला सकें। मुलाकात के दौरान गवरीदेवी ने अपनी पौत्री के साथ मिलकर मांड गायिक के सजना फूल गुलाबा का…,ओ जी ढोला…,ओ बनसा मोर बोले ओ…, काछबियो कहते जल रो जीव ढोलाजी अब सू पधारो…, आई आई सावणिया री तीज जैसे लोक गीत सुनाएं। जिसे सूनकर मौके पर मौजूद लोग भी मंत्रमुग्ध हो गए।

पौत्री गंगा के साथ मांड गीत की प्रस्तुति देती गवरीदेवी।

पौत्री गंगा के साथ मांड गीत की प्रस्तुति देती गवरीदेवी।

पौत्री को दूंगी संगीत की तालिब, ताकि जिंदा रख सकें मांड गायिकी

गवरीदेवी का कहना है कि वर्तमान में मांड गायिकी सूनने वाले कद्रदान कम हैं। पौत्री गंगा को मांड गायिकी के काफी कुछ हुनर सीखा दिया हैं। गंगा अब हारमोनियम सीख रही है। मेरी इच्छा है कि पढ़ाई के साथ गंगा संगीत की भी शिक्षा कॉलेज की पढ़ाई के साथ ले। इससे उसे इसका ज्ञान हो सके कि वर्तमान समय में मांड गायिकी को किस रूप में लोगों के सामने पेश करें जिससे वह उन्हें पसंद आ सके।

पति के साथ मांड गीत की प्रस्तुति देती गवरीदेवी राव।

पति के साथ मांड गीत की प्रस्तुति देती गवरीदेवी राव।

राजस्थान की मांड गायन शैली, जो रजवाड़ों में गाई जाती थी

10वीं-11वीं शताब्दी में जैसलमेर क्षेत्र के माण्ड क्षेत्र कहलाता था। यहां विकसित गायन शैली मांड गायन शैली कहलाई। यह एक शृंगार प्रधान शैली गायन शैली है। इसका इस्तेमाल राजस्थानी लोक गीतों में किया जाता है। जो ठुमरी और गजल के जैसी ही हैं। मांड राजस्थान की गायन शैलियों में सर्वाधिक लोकप्रिय शैली हैं। पाली की गवरीदेवी भैरवी युक्त मांड गायिकी के लिए फेमस है। बीकानेर की अल्ला जिल्हा बाई ने केसरिया बालम आवो नीं पधारो म्हारे देश पहली बार गाया था। जो आज भी हर किसी की जुबां पर हैं। पुराने में यह राजा-रजवाड़ों में गाई जाती थी।

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