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भाजपा और उसके सहयोगी एनडीए के नेताओं का विरोध तेज करने का आह्वान, जिला स्तर पर मोर्चे गठित करने का फैसला

सिंधू बार्डर मंच पर संयुक्त किसान मोर्चा के ह्यराष्ट्रीय कन्वेंशनह्ण में अनेक पारित प्रस्ताव
5 सितंबर को मुजफ्फरनगर में महारैली और 25 सितंबर को भारत बंद का ऐलान
श्रीगंगानगर।
किसान आंदोलन के तहत है नई दिल्ली के सिंधु बॉर्डर पर संयुक्त किसान मोर्चा की दो दिवसीय राष्ट्रीय कन्वेंशन आयोजित की गई। इस कन्वेंशन ने कॉर्पारेट पक्षधर कृषि कानूनों के प्रभाव, नया बिजली बिल 2021 और एनसीआर व पड़ोसी क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता आयोग अधिनियम के प्रभावों पर तथा सभी कृषि उपजों का स्वामीनाथन आयोग के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की, कानूनी गारंटी की मांगों को हल करने में सरकार की विफलता पर और किसानों, कृषि मजदूरों समेत अन्य मेहनतकश वर्गों के निरंतर बढ़ते गुस्से पर चर्चा की और विचार कर प्रस्ताव पारित किए गए। सर्वसम्मति से तय किया कि पूरे देश में अपने आंदोलन को तेज किया जाए। सभी किसानों और मेहनतकश लोगों को गोलबंद करते हुए 25 सितंबर को देश में एक दिवसीय भारत बंद करने की अपील की जाए।ह्ण
कन्वेंशन में सभी किसान और सहायक संगठनों से 5 सितम्बर को मुज़फरनगर (उत्तर प्रदेश) में संयुक्त किसान मोर्चा की होने वाली रैली में भारी भागीदारी करा उसे सफल बनाने की अपील की गई। इस मिशन को उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में जमीनी स्तर पर हर गांव में ले जाने का आग्रह किया गया है। हर राज्य व जिले में संयुक्त किसान मोर्चों का निर्माण कर सहायक संगठनों के साथ राज्यों और जिलों में सम्मेलन,रैलियों का आयोजन करके, टोल प्लाजा में बिना टोल के निकासी को लागू कराकर और भाजपा और उसके सहयोगी एनडीए-नेताओं सांसदों,विधायकों द्वारा किसानों की देश हित में उठाई गयी मांगों को स्वीकार करने से इनकार करने के लिए,उनके विरोध में पूरे देश में आंदोलन को तेज करने का आह्वान करता है।
पारित किए गए एक प्रस्ताव में कहा गया- यह सदन समझता है कि, अनुबंध खेती अधिनियम भारत सरकार को भारतीय किसानों को बड़े कॉरपोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ अनुचित और असमान अनुबंधों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करेगा, जो केवल कंपनियों के लिए वाणिज्यिक मूल्य की फसलें उगाने के लिए हैं। किसानों को खाद्य फसलें उगाने की स्वतंत्रता से वंचित करेगा। उन्हें अनुबंधित कंपनियों द्वारा बेचे जाने वाली महंगी लागत और मशीनीकृत कृषि सेवाओं को खरीदने के लिए मजबूर करेगा। भूमि और अन्य संपत्ति गिरवी रखकर लागत के भुगतान के लिए और किसानों को ऋण संस्थानों के साथ अलग-अलग समझौते करने के लिए मजबूर करेगा।उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा, क्योंकि फसल की भुगतान की गई वास्तविक कीमत का निर्धारण, फसलों की परख के बाद किया जाएगा। अनुबंध की शर्तों की निगरानी के लिए अनुबंध के अनुसार बिचैलियों की एक श्रृंखला स्थापित करेगा और कंपनिया आवंटन के अनुसार पूरे जिलों या उसके भागों में किसानों से अपनी आवश्यकता के अनुसार फसल की पैदावार कराएंगी।
इसी प्रकार एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया है कि मंडी बाईपास कानून के अनुसार निजी खाद्य कारपोरेशनों के लिए, शक्तिशाली बिचैलिए कृषि सहकारी समितियां, किसान उत्पादक संगठन इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म स्थापित करेंगे और वे फसलों का सबसे कम प्रचलित ऑन लाइन दर की पेशकश करेंगे। यह सरकार द्वारा घोषित एमएसपी पर किसी भी खरीद से इनकार करेगे।ये कारपोरेशन खाद्य फसलों को खरीदने और जमा करने के लिए स्वतंत्र होंगे। सरकार व्यापार के इन ह्यवैकल्पिकह्ण माध्यमों को बढ़ावा देगी-जिसका अर्थ है कि वह सरकारी मंडियों और एमएसपी दरों पर खरीद का समर्थन नहीं करेंगी कि ये निजी मंडियां अपना शुल्क स्वयं तय व वसूल करेंगी।साथ ही निष्पक्ष व्यापार के नियम और दिशा-निर्देश भी तय करेंगी कि इन्हीं नियमों के आधार पर सभी कानूनी विवादों को निपटाया जाएगा कि मंडियों और व्यापार के नियंत्रण के माध्यम से ये कारपोरेट, लागत और सेवाओं की उच्च दरों और फसलों के लिए कम दरों के लिए बेंचमार्क स्थापित करेंगे। ये फसलों की खरीद, भंडारण, परिवहन, प्रसंस्करण और पैक किये खाद्य पदार्थों के विपणन की, पूरी खाद्य श्रृंखला को नियंत्रित करेंगे।
कन्वेंशन में हैरानी व्यक्त की गई कि आवश्यक वस्तु संशोधन कानून में आवश्यक वस्तुओं की सूची से भोजन को हटा दिया गया है।अनाज, दलहन और तिलहन की कीमत हर साल 1-5 गुना और सब्जियों और फलों की कीमत 2 गुना बढ़ाने की स्वतंत्रता दे दी है। सरकारी खरीद नहीं होने से, राशन में खाद्यान्न की आपूर्ति बंद हो जाएगी, जिसका विश्व व्यापार संगठन की शर्तों के अनुसार पहले से ही अमल करने की तैयारी है।यह बहुराष्ट्रीय और भारतीय खाद्य कारपोरेट को भोजन के असीमित भंडारण और कालाबाजारी की अनुमति देता है।

कन्वेंशन में नए बिजली कानून पर चर्चा की कि जो कृषि और ग्रामीण परिवारों के लिए सब्सिडी वाली ऊर्जा आपूर्ति को समाप्त करता है। बिजली दरों को दोगुना से अधिक करने की धमकी देता है और घरेलू व्यवसायों से वाणिज्यिक दरें वसूलने की अनुमति देता है। राजधानी दिल्ली के एनसीआर व निकटवर्ती क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता आयोग कानून के प्रावधानों के तहत किसानों पर भारी जुर्माना लगाने, उन्हें जेल भेजकर दण्डित करने को खारिज करते हुए कहा कि पराली जलाने से प्रदूषण फैलाने के नाम पर किया गया है, जबकि एनसीआर की वायु गुणवत्ता में इसकी कोई भूमिका अगर है भी तो बहुत ही छोटी है।

सभी कृषि उत्पादों के लिए सी-2 + 50 फीसदी पर एमएसपी पर खरीद की कानूनी गारंटी के मुद्दे पर विचार किया गया। समझा गया कि यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार को लागत और सेवाओं की कीमतों को कम करना चाहिए।किसानों से बैठकर उत्पादन की लागत का सही मूल्यांकन करना चाहिए।सभी फसलों के लिए सी-2 + 50 फीसदी का एमएसपी घोषित करना चाहिये। निर्यात-आयात और अन्य नीतियों को इस तरह विनियमित करना चाहिये ताकि किसानों को यह मूल्य मिलना सुनिश्चित किया जा सके, और घोषित मूल्य से नीचे बिकने वाली सभी फसलों की खरीद की एमएसपी पर खरीद की व्यवस्था करनी चाहिये।

विचार विमर्श कर रेखांकित किया गया- किसानों ने सरकार को मांगों का पक्ष दिखाने के लिए एक विशाल, लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलन का निर्माण किया है पर कॉरपोरेट मुनाफे के हितों की सेवा करने की अपनी अंधी प्रतिबद्धता में सरकार ने तर्क को देखने से इनकार कर दिया है। इन कानूनों में बदलाव करने के सरकार के सभी प्रस्तावों से कृषि उत्पादन, प्रक्रियाओं और बाजारों पर कॉर्पारेट के अधिग्रहण की किसानों की आशंका का कोई जवाब या राहत नहीं मिलती है। ना ही उनकी भूमि और आजीविका के नुकसान को राहत मिलती है और ना ही देश के पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता को होने वाले नुकसान को।
किसान आरएसएस-बीजेपी के गंभीर उकसावे के बावजूद, अपने विरोध में बेहद शांतिपूर्ण रहे हैं और सरकार निराधार और झूठे आरोप लगा रही है।देशभक्त किसानों को कठोर कानूनों के तहत झूठा फंसा रही है।इस ऐतिहासिक आंदोलन ने सभी धर्मों, जातियों और क्षेत्रों के लोगों को एकजुट किया है। बड़े कारपोरेट के शोषण के खिलाफ, सभी उत्पीड़ित वर्गों की भारी भागीदारी को प्रेरित किया है और इसने भारत के लोगों को इस कारपोरेट समर्थक सरकार के फासीवादी हमले के खिलाफ संघर्ष में एकजुट और दृढ़ रहने के लिए प्रेरित किया है।इन सभी सबकों को आकर्षित करते हुए यह कन्वेंशन में आह्वान किया गया कि 5 सितम्बर मुजफरनगर रैली सफल बनाया जाए। 25 सितंबर को इस आंदोलन के पहले भारत बंद की वर्षगांठ और दिल्ली की सीमाओं पर शांतिपूर्ण विरोध धरने के 10 महीने पूरा हाने पर एक विशाल अखिल भारतीय बंद का आयोजन करें।

औद्योगिक मजदूरों व ट्रेड यूनियनों पर सत्र

किसानों के इस सम्मेलन ने खेद के साथ नोट किया है कि केंद्र सरकार ने अपनी कॉर्पारेट समर्थक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पक्षधर नीतियों के अमल में इस अवधि में समाज के अन्य कामकाजी वर्गों पर कई हमले किए हैं। इसने 4 श्रम कोड अधिनियमित किए हैं जो औद्योगिक श्रमिकों के अधिकारों को कमजोर करते हैं।इसने पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और उर्वरकों की कीमतों में भारी वृद्धि की है। यह राशन में गल्ला ना देकर, इसे नकद हस्तांतरण योजना में बदलने के लिए आगे बढ़ रहा है। हम इन सभी सवालों पर लोगों के संघर्षों का समर्थन करते हैं।

खेत मजदूरों, ग्रामीण गरीबों और आदिवासी समस्याओं पर सत्र

कन्वेंशन ने खेद के साथ नोट किया है कि भारत सरकार आदिवासियों का जबरन विस्थापन कर, वन और खनिज संपदा को कॉर्पारेट लूट के लिए सौंप रही है।वन अधिकार अधिनियम 2006 को लागू नहीं कर रही है। यह मनरेगा को कानून के अनुसार लागू करने में विफल रही है और वह न्यूनतम मजदूरी से काफी कम भुगतान करती है। यह गांवों का जबरन अधिग्रहण कर रही है।एलएआरआर 2013 को लागू नहीं कर रही है और ग्रामीण गरीबों के भूमि प्राप्त करने के अधिकार देने से पीछे हटी है। हम इन सभी सवालों पर लोगों के संघर्षों का समर्थन करते हैं।

महिला संघर्षों, युवा व छात्रों तथा अन्य तबकों पर सत्र

महिला संघर्षों, युवा व छात्रों तथा अन्य तबकों पर इस कन्वेंशन ने खेद के साथ नोट किया है कि भारत सरकार विभिन्न उपायों द्वारा सभी छोटे व्यवसायों के धंधे में कॉर्पारेट अधिग्रहण को प्रोत्साहित कर रही है।इसने महिलाओं पर बढ़ते हमलों, उनके लोकतांत्रिक अधिकारों और स्वतंत्रता पर हमलों को बढ़ाया है।समाज में प्रतिगामी मनुवादी ताकतों को प्रोत्साहित किया है और यह वंचितों के प्रति अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से पीछे हट रही है। स्वास्थ्य और शिक्षा के निजीकरण को प्रोत्साहित कर इसे गरीबों की पहुंच से दूर कर रही है। हम इन सभी सवालों पर लोगों के संघर्षों का समर्थन करते हैं।

सांप्रदायिकता पर संकल्प

कन्वेंशन सर्वसम्मति से आरएसएस-भाजपा की अल्पसंख्यकों पर हमला करने और सत्ता में बने रहने के लिए सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की सांप्रदायिक योजना की निंदा की गई । लोगों की समस्याओं को हल करने में बुरी तरह विफल होने और कॉर्पोरेट हितों की सेवा में समर्पित रूप से शामिल होने के कारण, यह देश के सांप्रदायिक सद्भाव और लोकतांत्रिक ताने-बाने को खराब करने के लिए बेताब प्रयास कर रहा है। आरएसएस-भाजपा द्वारा किया गया यह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हमारे संविधान की प्रस्तावना का गंभीर उल्लंघन है जो धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक है। इन जनविरोधी, साम्प्रदायिक ताकतों के साम्प्रदायिक मंसूबों से एकजुट होकर लड़ने का संकल्प लिया गया ।

निजीकरण पर संकल्प

आरएसएस-बीजेपी सरकार के कॉरपोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए कई सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी संपत्तियों का निजीकरण करने के प्रयास की कड़ी निंदा करते हुए विरोध जताया गया। इनमें रेलवे, बिजली क्षेत्र, प्राकृतिक गैस संसाधन, दूरसंचार परियोजनाएं, खाद्य भंडारण, बीमा, बैंक और अन्य मूल्यवान संपत्तियां हैं। ये भारत के लोगों की संपत्ति हैं ।उनके प्रयासों और उनके पैसे से बनाई गई हैं। इससे बेरोजगारी में भारी वृद्धि होगी। आरएसएस-भाजपा लोगों पर हमले करते हुए कॉरपोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सेवा के पथ पर अग्रसर है। यह कन्वेंशन भारत के प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्ति के इस कारपोरेटीकरण के खिलाफ सभी संघर्षों का समर्थन करने का वचन देता है।

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