जयपुर (वार्ता). उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने किसी भी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं बताते हुए कहा है कि कानून के शिकंजे से कोई नहीं बच सकता लेकिन भारत की प्रगति से कुछ वर्गों को कुंठा है और प्रबुद्ध समाज की जिम्मेदारी है कि विदेशी विश्विद्यालयों से चलाए जा रहे भारत विरोधी अभियान का मुंहतोड़ जवाब दें।
श्री धनखड़ शुक्रवार को जयपुर के मालवीय नेशनल इंस्टीटयूट आॅफ टेक्नोलॉजी में शिक्षकों और विद्यार्थियों से संवाद कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है, कानून के शिकंजे से कोई नहीं बच सकता और कानून के सामने यह समानता ही कुछ अभिजात्य लोगों को रास नहीं आती, जब उन्हें कानूनी नोटिस मिलता है तो वे सड़कों पर आ जाते हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसे लोग एकत्र होकर, अपनी अभिजात्यता बचाने की आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन कानून का शिकंजा अवश्य कसेगा। उन्होंने कहा वो ऐसी राजनीति पर टिप्पणी नहीं कर रहे, बल्कि वह इसके सामाजिक परिणामों को लेकर ङ्क्षचतित हैं जब विरोध के नाम पर सड़कों पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है। यह असंतोष और अराजकता सामाजिक समस्या है। उन्होंने कहा कि जो लोग पद ग्रहण करते समय संविधान की शपथ लेते हैं, वही लोग संवैधानिक संस्थाओं की सार्थकता, सक्षमता पर प्रश्न उठाते हैं, उनकी आलोचना करते हैं। प्रबुद्ध समाज को ऐसे लोगों को जवाब देना चाहिए।
श्री घनखड़ ने भारत विरोधी अभियान चलाने वाले विदेशी संस्थानों को भारतीय उद्योगपतियों द्वारा आर्थिक सहायता दिए जाने पर विरोध जताया। उन्होंने कहा ”हम भारतीय एकलव्य हैं कोई सिखाए न सिखाए, हम हर नई विद्या को स्वत: ही सीख लेते हैं। ग्रामीण भारत में इंटरनेट के बढ़ते प्रयोग की चर्चा में कहा कि भारत में प्रति व्यक्ति इंटरनेट डाटा प्रयोग का आंकड़ा, चीन और अमेरिका के सम्मिलित आंकड़े से ज्यादा है।
श्री धनखड़ ने कहा कि कुछ लोग भारत की उपलब्धियों का उत्सव मनाने की जगह, कुंठा से ग्रस्त हो जाते हैं। इस प्रसंग में उन्होंने कतिपय विदेशी संस्थानों में भारतीय मूल के ही कुछ लोगों द्वारा चलाए जा रहे भारत विरोधी अभियान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा जो लोग भारत के लोकतंत्र को जीवंत नहीं समझते उन्हें जानना चाहिए कि भारत ही विश्व का एकमात्र देश है जहां गांव और तहसील के स्तर पर भी संविधान द्वारा निर्देशित लोकतांत्रिक व्यवस्था सुनिश्चित की गई है।
उन्होंने ऐसी भारत विरोधी संस्थाओं को कुछ भारतीय उद्योग और कंपनियों द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान किए जाने पर विरोध व्यक्त करते हुए कहा कि बेहतर हो यदि यही आर्थिक सहायता भारतीय संस्थानों को उपलब्ध कराई जाय। उन्होंने शिक्षक समाज और विद्यार्थियों से अपेक्षा की कि वे ऐसे भारत-विरोधी अभियान का मुंहतोड़ जवाब दें।
उन्होंने कहा कि युवाओं से इस प्रकार के विचार विमर्श सदैव प्रेरणास्पद होते हैं और उज्जवल भविष्य के प्रति आशान्वित करते हैं। उन्होंने भारतीय युवाओं की प्रतिभा पर विश्वास जताते हुए कहा कि भारतीय युवा प्रतिभाओं को खुद को नहीं बल्कि भारत के प्रति दुनिया के नजरिए को बदलना है।
उन्होंने कहा कि अधिकांश युवा आईएएस, आईपीएस या सेना के अधिकारी, इंजीनियङ्क्षरग पृष्ठभूमि के होते हैं। आपको इससे भी अधिक वेतन वाले अवसर मिल सकते हैं लेकिन सरकारी सेवा में समाज और राष्ट्र की सेवा का संतोष मिलता है।
उन्होंने युवा विद्यार्थियों को सलाह दी कि वे प्रतिस्पर्धा और तनाव को खुद से दूर रखें। मस्तिष्क नए आइडियाज का महज भंडार बन कर न रह जाए। कोई नया आइडिया आए तो उसे लागू करें और लागू करने में असफलता से डरे नहीं। असफलता का भय समाप्त होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आपकी प्रतिस्पर्धा स्वयं आपसे है, किसी और को अपनी प्रतिभा और क्षमता को मापने का अधिकार न दें। इस संदर्भ में उन्होंने हाल के वर्षों में भारत की सफलताओं का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा आज के भारत में हर किसी की प्रतिभा का यथासंभव उपयोग करने के पर्याप्त अवसर हैं।
उपराष्ट्रपति ने केन्द्र सरकार द्वारा शुरू की गई उज्जवला योजना जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं तथा 11 करोड़ किसानों के खाते में सीधे, बिना बिचौलिए के डीबीटी के माध्यम से 2.25 लाख करोड़ रुपए पहुंचाए जाने की चर्चा करते हुए कहा कि ऐसा नेतृत्व मिलना राष्ट्र का सौभाग्य है।
उन्होंने कहा कि आज भारत में हर किसी को समान अवसर उपलब्ध हैं, सबको समान धरातल प्राप्त है। उन्होंने कहा कि वो दिन गए जब कुछ संभ्रांत परिवारों के संतानों को भी सफलता का सौभाग्य प्राप्त होता था। आज हर नए आइडिया को प्रोत्साहित किया जाता है, उन्हें लागू करने के असीम अवसर उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि हमारे स्टार्ट अप और यूनिकॉर्न कंपनियां युवाओं द्वारा चलाई जा रही हैं, बल्कि नए आइडियाज और उनपर आधारित नए स्टार्ट अप स्थापित उद्योग घरानों को कड़ी प्रतिस्पर्धा दे रहे हैं।
उपराष्ट्रपति ने एमएनआईटी शिक्षकों को संबोधित करते हुए सैनिक स्कूल, चित्तौडगढ़ के अपने शिक्षकों को याद किया और अपने जीवन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। खुद को शिक्षा का परिणाम बताते हुए उपराष्ट्रपति ने अपनी हाल की केरल यात्रा का जिक्र किया, जहां वे अपनी सैनिक स्कूल की शिक्षिका से मिलने उनके घर गए।
समाज में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि एक समाज के रूप में हमें शिक्षकों को वह सम्मान देना ही चाहिए जिसके वे अधिकारी हैं। समाज गुरु के प्रति अपना ऋण चुकाए। उन्होंने कहा कि गुरु का सम्मान किसी भी सरकारी प्रोटोकॉल से कहीं ऊपर है। उन्होंने कहा कि शिक्षा संस्थानों में इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकल्प तो हो सकता है लेकिन अच्छे शिक्षक का कोई विकल्प नहीं होता। इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने शिक्षक के रूप में डा सर्वपल्ली राधाकृष्णन तथा डा ए पी जे अब्दुल कलाम को याद किया।