बीकानेर
बीकानेर की रहने वाली 3 साल की मैत्रिका ने पहली बार मुंह से खाना खाया। इस बच्ची के जन्म से ही आहार नाल में छेद था। खाना सीधे पेट में न पहुंचकर शरीर के दूसरे हिस्सों में पहुंचता था। इसे ट्रेकियो इसोफेसियल फिस्चुला रोग कहा जाता है। अब चार ऑपरेशन के बाद यह दिक्कत दूर हो गई है। अभी तक बच्ची को राइस ट्यूब से लिक्विड डाइट दी जाती थी।

मैत्रिका के चेहरे पर यह मुस्कान बता रही है कि वह पूरी तरह ठीक है। तीन साल बाद अब मैत्रिका बिना राइस ट्यूब के भोजन कर रही है।
राइस ट्यूब ही था सहारा
बच्ची की आहार नली को जन्म के दूसरे दिन ही ऑपरेशन से जोड़ने की कोशिश की गई, लेकिन उसमें एक छेद रह गया। इससे बच्ची को दिया जाने वाला खाना शरीर के दूसरे हिस्सों में जाने लगा। उसे निमोनिया हो गया। इसके बाद दूसरा ऑपरेशन किया गया और आहार नाल को पेट से जोड़ा गया। नाक में राइस ट्यूब भी लगाई गई। इसी से उसे लिक्विड डाइट दी जाती थी।
करीब छह महीने पहले भी भास्कर के रिपोर्टर मैत्रिका से मिले थे। वह आइस्क्रीम खाने की जिद कर रही थी। पिता आनंद ने समझाया तो मान गई। उनका कहना था कि आइस्क्रीम खाई तो राइस ट्यूब बदलनी होगी। इससे मैत्रिका को असहनीय दर्द होता। यह ट्यूब हर 10-15 दिन में बदली जाती थी।

मां मोनिका ऐसे करवाती थीं भोजन। हर 10-15 दिन में राइस पाइप को बदलना होता था। इससे बच्ची को काफी तकलीफ होती थी।
क्या है बीमारी
दरअसल, यह जन्मजात रोग है, इसे ट्रेकियो इसोफेसियल फिस्टुला रोग कहा गया है। यह फूड पाइप व विंड पाइप के बीच हुआ गलत कनेक्शन है। जन्म से पहले ही शरीर में ये रोग हो जाता है। भोजन पेट में पहुंचने के बजाय इधर-उधर चला जाता है। कई तरह के इंफेक्शन हो सकते हैं और निमोनिया नियमित रूप से बना रहता है। इतना ही नहीं कुछ भी खाते ही बच्चा उल्टी कर देता है। पानी तक भी शरीर में नहीं जाता। समय पर ध्यान नहीं देने पर इस रोग के साथ ही किडनी, हार्ट आदि पर भी असर हो सकता है।

मैत्रिका को जन्म के बाद पहली बार मां ने दूध पिलाया तो उसे उल्टी हो गई थी। इसके बाद नाक से पेट तक राइस ट्यूब डाला गया। इसी से उसे लिक्विड डाइट दी जाती थी।
इस बीमारी में 30-40% बच्चों की जान चली जाती है
बीकानेर के पीबीएम अस्पताल के सीनियर पीडियेट्रिक सर्जन डॉ. गिरीश प्रभाकर ने बताया कि इस बीमारी में बच्चे को भोजन करने में दिक्कत होती है। मैत्रिका को हुई ये बीमारी असामान्य है। हजारों जीवित बच्चों में किसी एक को होती है। 30-40% बच्चों की जान चली जाती है। जन्म के साथ ही बच्चे अगर मां का दूध पीकर उल्टी करते हैं तो पेरेंट्स को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। मैत्रिका के पिता आनंद का कहना है कि डॉक्टर्स की मेहनत से ही मैत्रिका ठीक हो पाई है।