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जस्या….. थारो कांई होसी रै!

  • डेढ साल से घर बैठने से बच्चे पढ़ाई में पिछड़े
  • छोटी कक्षाओं के बच्चों पर ज्यादा असर, प्रमोट होकर अगली कक्षाओं में आ गए, पिछला भूले

बीकानेर. आठ वर्षीय जस्सू उर्फ जसविंदर (बदला नाम) ने पिछले करीब डेढ़ साल ने स्कूल का मुंह तक नहीं देखा। न हिंदी आती है और न ही अंग्रेजी। साधारण जोड़-बाकी तो दूर की बात है। ए फॉर एप्पल जरूर जानता है, लेकिन एप्पल की स्पैलिंग पूछो तो चुप्पी साध लेता है। हां, साइकिल चलाने और पतंगबाजी में महारथ हासिल कर चुका है। ऑनलाइन एज्युकेशन का फायदा यह हुआ है कि पलक झपकते ही उसकी अंगुलियां यू ट्यूब, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम पर तेजी से थिरकने लगती है। स्मार्टफोन के दर्जनों मॉडल उसे याद है। पुराने स्मार्ट फोन को अपग्रेड करना घरवालों से उसकी नई मांग है।

जस्सू तो यहां उदाहरण मात्र है। कोरोना ने घर-घर में जस्सू तैयार कर दिए हैं। मां-बाप यह कह कर माथा पीट रहे हैं …. कि जस्या थारो कांई होसी? जबकि शिक्षक यह सोचने मात्र से ही सिहर उठते हैं कि तीसरी- चौथी कक्षा के जिन बच्चों को अक्षरज्ञान तक नहीं हैं, उन्हें अगली क्लास का भारी-भरकम पाठ्यक्रम कैसे पढ़ाएंगे। जो बच्चे लिखना-पढऩा ही भूल गए, उन्हें हिस्ट्री, ज्योग्राफी, इंग्लिश और मैथ्स, साइंस के लम्बे चौड़े पाठ कैसे पढ़ाए पाएंगे?

कक्षा शिक्षण का विकल्प नहीं ऑनलाइन शिक्षा

शिक्षाविद् बताते हैं कि ऑनलाइन शिक्षा, स्कूल के कक्षा शिक्षण का विकल्प नहीं हो सकती। स्कूलों में गुरु-शिष्य के बीच जिस तरह से संवाद और शंका का समाधान होता है। सवाल-जवाब होते है। शिक्षक के प्रति डर होता है। उससे कई बातें बच्चों के मन-मस्तिष्क में जगह बनाती है, जो जीवनभर उनके काम आती है। इसके अलावा ऑनलाइन शिक्षा के लिए यह बेहद जरूरी है कि बच्चे के मां-बाप पढ़े लिखे हो। वे बच्चे पर पूरी तरह से नजर रखे। जबकि भारतीय परिपेक्ष्य में तीस से चालीस फीसदी मां-बाप कम पढ़े लिखे या महज साक्षर होते हैं।

पिछला समावेश कर सिलेबस बने

ऐसा लगता है शिक्षा, सरकार की प्राथमिकता नहीं है। होना तो यह चाहिए था कि सरकार को स्कूल बन्द करने के बजाय, शिक्षकों को प्राथमिकता के आधार पर वेक्सीन लगाई जाती, ताकि स्कूल जल्द खुल पाते। बच्चों के स्कूल नहीं जाने से बच्चों की ग्रामर, वोकेबलरी, राइटिंग आदि पर बुरा असर पड़ा है। जो उसके भविष्य के लिए घातक सिद्ध होंगे। सरकार को चाहिए कि कोरोना के बाद अब सिलेबस को पिछले सालों के पाठ्यक्रम में मिलाकर नया तैयार करे जिससे बच्चों को नए सिरे से तैयार किया जा सके।

  • पीएस वोहरा, नेशनल एजुकेशन पॉलिसी जिला कोर्डिनेटर

पाठ्य्रक्रम से लेकर क्लास रूम बदले

यह सच है कि लम्बे समय से बच्चों के स्कूल नहीं आने से बच्चे बुरी तरह से पिछड़ गए हैं। जबकि उन्हें अगली कक्षाओं में भेज दिया गया। लिहाजा हम अपना खुद का सिलेबस तैयार कर रहे हैं। जिसमें पिछली कक्षाओं के सिलेबस का भी समावेश होगा। वैसे कोरोना के बाद पूरी तरह से शिक्षण व्यवस्था में बदलाव होने आवश्यक हैं। पाठ्यक्रम से लेकर क्लास रूम में बैठाने के तौर तरीके बदलने होंगे, यहां तक कि बच्चों को रोस्टर बना कर बुलाना होगा। हालांंकि सरकार की अभी कोई एसओपी सामने नहीं आई है।

  • विपिन पोपली, निजी शिक्षण संस्थान संचालक

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