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बच्चों को गर्म सरियों से जला रहे भोपे:बीमारी ठीक करने के लिए पेट पर दाग दिया जाता है गर्म सरिया, गांव वालों से पूछा तो शर्ट ऊपर कर बताए घाव; अंधविश्वास में अब तक 6 की मौत

भीलवाड़ा

राजस्थान में बीमारी दूर करने के नाम पर अंधविश्वास का खेल जारी है। यहां इलाज के नाम भोपे मासूमों को डाम का दर्द दे रहे हैं। भीलवाड़ा जिले के कई ऐसे गांवों के मासूम हैं जो इन भोपों के अंधविश्वास का शिकार हो रहे हैं।

हाल ही में भीलवाड़ा में ऐसे दो मामले सामने आए थे, जिनमें बच्चों की बीमारी ठीक करने के नाम पर उनके शरीर पर गर्म सरिये से दागा गया था। तबीयत बिगड़ने पर अस्पताल ले जाया गया और यहां चंद घंटों में ही उनकी मौत हो गई। इस पर भास्कर टीम ने पड़ताल की तो चौंकाने जानकारी सामने आई। भीलवाड़ा जिले के मांडल और करेड़ा समेत कई ऐसे गांव हैं जहां भोपे डेढ़ साल की उम्र में ही मासूमों को डाम का दर्द दे रहे हैं।

भास्कर टीम ने इन क्षेत्र के गांव के लोगों से बात की और डाम के बारे में पूछा तो हर कोई अपना शर्ट ऊपर कर पेट पर लगे पुराने घाव दिखाने लगा। लोगों का कहना था कि हमारे गांव में यह परंपरा है। यहां के लोगों ने बताया कि पीढ़ियों से यह रिवाज है। मैंने मेरे पिता और दादा ने भी डाम लगवाया था।

भीलवाड़ा जिले के कई ऐसे गांव हैं, जहां बचपन में ही डाम लगा दिया जाता है। यहां के युवाओं पर इस दर्द के निशान आज भी मौजूद हैं।

भीलवाड़ा जिले के कई ऐसे गांव हैं, जहां बचपन में ही डाम लगा दिया जाता है। यहां के युवाओं पर इस दर्द के निशान आज भी मौजूद हैं।

इन गांवों में डाम लगाने के 50 से ज्यादा ठिकाने

डाम को लेकर अभी भी इन लोगों में अंधविश्वास बरकरार है। यहां अलग-अलग भोपों के नाम से कई लोगों ने मासूमों को डाम लगाने के 50 से ज्यादा ठिकाने खोल रखे हैं। जहां लोग अपने मासूम बच्चों के बीमार होने पर उसे उपचार के लिए लेकर जाते हैं। सबसे बड़ी बात है कि प्रशासन के सामने मासूमों को डाम लगने की घटना के बाद हरकत तो होती है, लेकिन इन भोपों के ठिकानों को आज तक कभी भी नेस्तनाबूद नहीं किया गया।

2 साल में 20 से ज्यादा मासूमों को दागा

जानकारी है कि मांडल व उसके आसपास के गांवों व भीलवाड़ा के अन्य गांवों से मासूमों को डाम लगाने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। 2 साल में भीलवाड़ा में करीब 20 से ज्यादा मासूम बच्चों को बीमारी दूर करने के नाम पर लोहे के सरिये से दागने का मामला सामने आया है। इनमें तो 6 बच्चे ऐसे थे जो इसका दर्द सहन नहीं कर पाए और उनकी मौत हो गई।

हाल ही में दो मासूम लीला और गीता का मामला आया था सामने, एक की हो गई थी मौत

भीलवाड़ा में पिछले 15 दिनों की बात करें तो दो मासूम बच्चियों ने इस डाम का दर्द सहा है। भीलवाड़ा के एमबी अस्पताल में पहले 5 माह की लीला को लाया गया। लीला की मां ने भोपे के कहने पर उसकी बीमारी दूर करने के लिए पेट पर गर्म सरिेये से डाम लगाया गया था। अस्पताल में डॉक्टर लीला की जान को नहीं बचा पाए थे, लेकिन 2 वर्ष की गीता अभी भी इस दर्द को सहन कर रही है।

यह दो मासूम। जिनकी डाम लगने के बाद तबीयत बिगड़ गई और अस्पताल लाया गया। लीला की तो मौत हो गई जबकि गीता अब भी डाम का दर्द झेल रही है।

मेरी तीन पीढ़ी लगा रही है

आसींद के कालूराम ने बताया कि मेरी तबीयत बचपन में खराब रहती थी। मेरे मां-बाप ने उपचार के नाम पर मुझे भी डाम लगाएं। आज भी मेरे पेट पर डाम का निशान है। मेरे दो लड़के हैं जिनमें से एक तबीयत अक्सर खराब रहती थी। उस समय मेरे माता-पिता जिंदा थे मेरे बड़े बेटे को भी डाम लगाया गया था। मेरा बेटा भी बाप बन चुका है। हमारे यहां पर डाम लगाने की प्रथा सामान्य है।

मुझे लगा, मेरे बेटे को भी लगा डाम

मांडल के रेवता राम का कहना था कि मेरी उम्र 76 साल हो चुकी है। मुझे फेफड़ों की बीमारी बताई जा रही थी। बचपन में मुझे सांस लेने की परेशानी थी। मेरे मां-बाप ने गांव में ही रहने वाले भोपे से मुझे डाम लगवाया था। आज भी उस डाम के निशान मेरे सीने पर हैं। इसके बाद मेरे बेटे को भी सांस लेने में समस्या होती थी। मेरे बेटे को भी डाम लगाया गया। उसके निशान आज भी हैं। हमारे गांव में आज भी बीमार होने पर डाम लगाते हैं।

डाम के बाद बुखार और बीपी कम होने से मौत

डॉक्टरों ने बताया कि निमोनिया या पेट की आंतरिक बीमारियों के चलते बच्चों को डाम लगाया जाता है। इस डाम के लगाने के बाद परिजन 4 से 5 दिन तक उसके ठीक होने का इंतजार करता। लेकिन इस बीच इस बीमारी से मासूम और भी ज्यादा घायल हो जाते हैं। इसके असहनीय दर्द से बच्चों को बुखार और सांस लेने में दिक्कत आती है। उनकी बीपी पूरी तरह से घट जाती है। इसी वजह से इन बच्चों की मौत हो जाती है।

मैंने ऐसे 100 से ज्यादा मामले देखे

डाम जैसी कुप्रथा ने समाज में मासूम बच्चों को स्थिति को काफी खराब कर रखा है। मेरी ड्यूटी राजसमंद ओर उदयपुर भीलवाड़ा में काफी रही है। इन सभी क्षेत्रों में ग्रामीण अशिक्षा हैं। वहां लोग अपने बच्चों को हॉस्पिटल ले जाने की बजाय भोपे के पास ले जाना ज्यादा उचित समझते हैं। मैंने अभी तक 100 से ज्यादा मासूम बच्चों को डाम से दागा हुआ देखा है। इनमें से कई बच्चे आज जीवित नहीं हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण अशिक्षा, अंधविश्वास और गरीबी है।

डॉ. कुलदीप सिंह सोलंकी, शिशु रोग विशेषज्ञ, भीलवाड़ा

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