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लोनावाला-खंडाला से कम नहीं जगमेरू पहाड़:यहां 2500 फीट ऊपर पहाड़ों से टकराकर बरसते हैं बादल, ड्रोन कैमरे से कैद किया नजारा आप भी देखें

बांसवाड़ा

बादलों की आगोश में समाया यह नजारा राजस्थान की जगमेरू पहाड़ का है। अरावली पर्वतमालाओं से घिरे दक्षिणी राजस्थान का बांसवाड़ा बारिश में स्वर्ग से कम मनमोहक नहीं है। बारिश के साथ ही यहां के जगमेरू पहाड़ की प्राकृतिक खूबसूरती भी जबर्दस्त हो गई है। करीब 25 सौ फीट ऊंचा यह पहाड़ इन दिनों महाराष्ट्र के लोनावाला-खंडाला पर्यटक स्थल को टक्कर देने में लगा है। बीते तीन दिन में करीब 40 घंटे हुई बरसात के बाद जगमेरू के प्राकृतिक नजारे देखने लायक हो गए हैं।

पहाड़ों से टकराकर बादल यहां बरस रहे हैं। ऊंचाई वाले पहाड़ के पठारी हिस्से में रियासतकाल में बना बांध भी प्राकृतिक झरनों से भरने लगा है। पठार के ऊपर से खाई नुमा दिखने वाले पहाड़ के दोनों ओर पानी भरे तालाबों ने कागज में उकेरी गई सिनरी का रूप ले लिया है। इस पहाड़ी का रिश्ता प्राकृतिक सुंदरता से ही नहीं, बल्कि रियासत काल से भी गहरा नाता है।

झोपड़ी के अस्थाई ढांचे के बीच से झांकते बादल।

झोपड़ी के अस्थाई ढांचे के बीच से झांकते बादल।

जगमेरू का अपना इतिहास

बांसवाड़ा के इस जगमेरू का रियासतकाल से नाता है। राजपूताना कहे जाने वाले राजस्थान में रियासत काल में अधिकांश किले पहाड़ों के पठारी हिस्से में बनाए जाते थे ताकि ऊंचाई पर सुविधाओं के साथ आबादी को सुरक्षा भी मिल सके।

इन्हीं आदतों के चलते बड़े भाई को डूंगरपुर की सत्ता सौंपकर बांसवाड़ा बसाने निकले महारावल जगमाल सिंह ने करीब 499 साल पहले इस जगमेरू को उनकी राजधानी बनाई थी। इस जगह पर इससे जुड़े प्रमाण भी मिलते हैं।

जगमाल सिंह ने यहां पठारी इलाके में एक बांध भी बनवाया था। ये कई प्राकृतिक नालों का संगम है। बाद में तकनीकी कारणों के चलते महारावल जगमाल सिंह ने इस स्थान को छोड़कर समाई माता की पहाड़ी पर दिन गुजारे थे। वहीं 1530 में किले की स्थापना कर बांसवाड़ा शहर को बसाया था। पहले इन जगहों पर परमार वंश का कब्जा था। जगमाल सिंह की ओर से की गई खोज के कारण इस स्थान का नाम जगमेरू पड़ा है।

बारिश के दौरान ऐसा होता है नजारा।

बारिश के दौरान ऐसा होता है नजारा।

यहां से दिखता है माही बांध

एशिया में दूसरे नंबर के अर्दन डैम (मिट्‌टी की पाल) के तौर पर पहचान रखने वाले माही-बांध से भी जगमेरू की ऊंचाई अधिक है। यही वजह है कि पहाड़ पर स्थान विशेष से माही बांध साफ दिखाई देता है। इस स्थान से बांध की सड़क से दूरी करीब 40 किलोमीटर पड़ती है, लेकिन पहाड़ की सीध के हिसाब से बांध की दूरी करीब 15 किलोमीटर है। इसके बाद भी माही बांध के खुलने वाले गेटाें का पानी इस ऊंचाई से साफ दिखाई देता है। धूप में इस बांध को देखना आसान होता है, जो अभी धुंध और बादलों के चलते कभी-कभार ही दिखता है।

हवा के झोंकों के बीच बादलों के हटते ही ऐसी बनती है रास्ते की तस्वीर।

हवा के झोंकों के बीच बादलों के हटते ही ऐसी बनती है रास्ते की तस्वीर।

चलना मगर, संभलकर

बांसवाड़ा शहर से इस पर्यटन स्थल (जगमेरू) की दूरी 14 किलोमीटर है। शहर से माहीडेम रोड पर निकलते समय करीब दो किलोमीटर आगे एक रास्ता निचला घंटाला की ओर मुड़ता है। संकरे ग्रामीण मार्ग पर निचला घंटाला को पार करते ही माही की नहर मिलती है।

वहां से बाएं मुड़कर नहर के किनारे होते हुए एक बार नहर को क्रॉस करना होता है। आगे जाकर गांव में बनी पीएमजीएसवाई सड़क के सहारे कई प्राकृतिक बरसाती नालों को पार करते हुए इस ऊंचाई वाले पहाड़ पर पहुंच सकते हैं।

पहाड़ी हिस्से में संकरी सड़क पर कई जोखिम भरे मोड़ हैं, जहां चौपहिया सवार चालकों को विशेष सावधानी रखने की जरूरत होती है। बाइक सवार को पहाड़ी हिस्से से सड़क पर पानी के साथ बहकर आने वाले कंकरीले पत्थरों से बचना होता है।

जगमेरू के नीचे सड़क किनारे बकरी चराने बैठे स्थानीय बच्चे।

जगमेरू के नीचे सड़क किनारे बकरी चराने बैठे स्थानीय बच्चे।

मंदिर और सरकारी भवन

इस ऊंचाई पर पक्के निर्माण के नाम एक पंचायत भवन दिखता है, जबकि ऊंचाई पर एक हनुमान मंदिर है। इसकी छत के नीचे कुछ लोग नारियल और प्रसादी जैसी सामग्री बेचते हैं। पहाड़ के पठारी हिस्से में भुट्‌टे बेचने वाले लोग बैठते हैं। मौसम के साथ ताजे सेंके गए भुट्‌टे बड़ा आनंद देते हैं। पहाड़ी हिस्से से नीचे की ओर झोपड़ीनुमा अस्थायी दुकानों में कुछ पैक्ड आइटम भी मिलते हैं। आने वाले पर्यटकों के लिए बेहतर होगा कि वह शहर से आते समय खाने-पीने जैसे अन्य सामान भी साथ लेकर आएं।

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