बीकानेर
सरकारी रेट पर फसल बेचने के लिए किसानों को रजिस्ट्रेशन कराने के लिए तो सरकार ने सेल्फ गिरदावरी असेसमेंट करने की छूट तो दी लेकिन फसल बेचते समय मूल गिरदावरी अनिवार्य कर दी है। सवाल यह है कि जब पटवारी और कृषि पर्यवेक्षकों ने गिरदावरी की ही नहीं तो किसान मूल गिरदावरी पेश कैसे करेंगे। सरकार के इस फैसले काे लेकर किसान असमंजस में है।
राहत की बात यह है कि इस वक्त बाजार में फसल की कीमत सरकारी रेट से ज्यादा है। सरकार के इस फैसले काे लेकर हमने कुछ किसानाें से बात की ताे उन्हाेंने कहा कि बाजार में सरसाें पर समर्थन मूल्य से 400 रुपए और गेहूं पर डेढ़ साै रुपए ज्यादा मिल रहे हैं। ऐसे में गिरदावरी रिपाेर्ट के झंझट में ना पड़कर फसल बाजार में व्यापारियाें काे बेचना ज्यादा उचित रहेगा।
56 हजार किसान ही बेच सकते हैं फसल
कृषि विभाग की ओर से संभावित उत्पादन को देखते हुए जिले के 56 हजार 685 किसान अपनी फसल सरकारी खरीद पर बेच सकते हैं। क्योंकि सरकार बिजाई, उत्पादन के हिसाब से पंजीयन सीमा तय है। सरसों में 15 हजार 30 किसान की अधिकतम पंजीयन सीमा तय की गई जबकि चने के लिए 26 हजार 665 किसान पंजीयन कर सकते हैं। गेहूं के तीन अलग-अलग खरीद सेंटर हैं। प्रत्येक सेंटर पर अधिकतम 5000 किसान पंजीकरण करा सकते हैं। यानी कुल 15000 हजार किसान गेहूं सरकारी दरों पर बेच सकते हैं।
किसान काे गिरदावरी में सेल्फ असेसमेंट की छूट दी, मूल गिरदावरी भी मांग ली
कृषि विभाग ने इस साल सिर्फ गेहूं, सरसों और चने का संभावित उत्पादन 5 लाख 61 हजार 563 मीट्रिक टन आंका है। कुल उत्पादन का 25 प्रतिशत हिस्सा ही सरकारी दरों पर खरीदा जा सकता है। यानी सिर्फ तीन फसलों में 1 लाख 46 हजार 693 मीट्रिक टन अनाज की खरीद होनी है क्योंकि कृषि विभाग ने इन तीन फसलों का संभावित उत्पादन पांच लाख 61 हजार 563 मीट्रिक टन आंका है। सरकारी खरीद के लिए मूल गिरदावरी जरूरी है।
जब क्रॉप कटिंग और गिरदावरी का वक्त था तब पटवारी हड़ताल पर थे। ऐसे में सरकार ने शॉर्ट कट अपनाते हुए कृषि पर्यवेक्षकों से पिछले साल की गिरदावरी रिपोर्ट इस साल के लिए हूबहू प्रमाणित करने के लिए कहा लेकिन कृषि पर्यवेक्षकों ने ऐसा करने से मना कर दिया। अब मजबूरी में सरकार ने किसानों को सेल्फ असेसमेंट गिरदावरी से रजिस्ट्रेशन करने की छूट दी लेकिन फसल बेचते वक्त मूल गिरदावरी की रिपाेर्ट अनिवार्य कर दी।
यूं तो एक अप्रैल से खरीद शुरू हो गई लेकिन अभी तक टेंडर प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। छुटि्टयों के बाद टेंडर प्रक्रिया पूरी करके खरीद शुरू कर देंगे। किसान तब तक रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं। फसल बेचान के लिए मूल गिरदावरी रिपोर्ट किसानों को लानी होगी। सेल्फ असेसमेंट से वे रजिस्ट्रेशन के लिए पात्र हैं।
विक्रम बेनीवाल, असिस्टेंट डायरेक्टर, राजफैड
बड़ा सवाल-रजिस्ट्रेशन में सेल्फ असेसमेंट तो बेचने के लिए मूल गिरदावरी की अनिवार्यता क्यों
प्रदेश और देश में तमाम किसान संगठन किसान हितों के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। खुद कांग्रेस के विधायक-मंत्री तक किसानों के हितैषी होने का दावा कर रहे हैं लेकिन प्रदेश की कांग्रेस सरकार में ही किसानों की फसल खरीद के लिए ठोस निर्णय नहीं हो पा रहा है। किसानों का कहना है कि जब मूल गिरदावरी हुई ही नहीं तो फसल बेचते समय मूल गिरदावरी अनिवार्य क्यों की। क्योंकि सेल्फ असेसमेंट से किसान रजिस्ट्रेशन तो करा रहा है लेकिन फसल बेचने के लिए मूल गिरदावरी अनिवार्य की गई है। इसका मतलब कि सरकार किसानों को गुमराह कर रही है। ये नीतिगत निर्णय है इसका समाधान सरकार को निकालना चाहिए।
हैरानी- एक अप्रैल से होनी थी खरीद, अब तक टेंडर नहीं
एक अप्रैल से सरकारी खरीद शुरू होनी थी लेकिन बीकानेर में खरीद के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू नहीं हुई। अब तीन दिन की छुट्टी बीच में अा गई। सोमवार से टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। उसमें दो से तीन दिन और लगेंगे। यानी सात अप्रैल से पहले खरीद शुरू नहीं होगी। इसी वजह से मंडी में अभी तक अनाज की आवक शुरू नहीं हुई है। दूसरी ओर अभी तक ज्यादा रजिस्ट्रेश नहीं हुए हैं। रजिस्ट्रेशन होने के 10 दिन के ग्रेस पीरियड के भीतर किसान अपनी फसल बेचने के लिए आ सकते हैं। एक किसान अधिकतम 25 क्विंटल फसल बेच सकता है। वह भी तब जब उसके पास इतनी फसल पैदावार की गिरदावरी रिपोर्ट हो।
चने की ताजा फसल में नमी का भी किसानों को मिलेगा फायदा : सरकार ने सरसों की सरकारी खरीद 4650 रुपए प्रति क्विंटल तय की है लेकिन सरसों का बाजार भाव इससे 200 से 400 रुपए प्रति क्विंटल ज्यादा है। जाहिर है जब बाजार में किसान को उसकी कीमत ज्यादा मिल रही तो कम दरों में सरकार को अनाज क्यों बेचेगा। कमोबेश यही स्थिति चने की है। चने की सरकारी दर 5100 रुपए प्रति क्विंटल है लेकिन बाजार भाव 4800 से 4900 रुपए प्रति क्विंटल है।
चने की फसल ताजा हाेने से उसमें नमी रहती है। मंडी में ताजा फसल की खरीद नहीं होती। ऐसे में जो प्रति क्विंटल का नुकसान सरकारी रेट पर होगा उतना फायदा नमी के साथ फसल तुलाई में हो जाएगा। गेहूं की सरकारी दरें 1975 रुपए प्रति क्विंटल है और इस वक्त करीब 2100 रुपए प्रति क्विंटल कीमत बाजार में मिल रही है। यही वजह है कि किसान सरकारी दरों पर अपनी फसल बेचने में रुचि नहीं ले रहा।
मूल गिरदावरी में मिस मैच तो रजिस्ट्रेशन निरस्त : यदि किसान को मूल गिरदावरी रिपोर्ट मिल भी गई ताे सेल्फ असेसमेंट से आंकड़े आपस में मैच नहीं हाेंगे। ऐसे में किसान का रजिस्ट्रेशन तुरंत निरस्त कर दिया जाएगा। दरअसल पटवारियों ने अपने हलके में तो गिरदावरी की है लेकिन एक-एक पटवारी के पास एक से दो पटवार क्षेत्रों का अतिरिक्त कार्यभार है जिसकी गिरदावरी वे नहीं कर रहे हैं।