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70 साल की कोशिशों के बाद मलेरिया मुक्त हुआ चीन, कभी हर साल यहां 3 करोड़ मामले सामने आते थे; जानिए चीन ने मलेरिया पर कैसे काबू पाया

70 साल की कोशिशों के बाद मलेरिया मुक्त हुआ चीन, कभी हर साल यहां 3 करोड़ मामले सामने आते थे; जानिए चीन ने मलेरिया पर कैसे काबू पाया

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70 साल की लगातार कोशिशों के बाद चीन मलेरिया मुक्त हो गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसकी घोषणा की है। 40 के दशक में हर साल चीन में मलेरिया के 3 करोड़ मामले सामने आते थे। चीन वेस्टर्न पेसिफिक रीजन का पहला देश है जहां पिछले 4 साल में मलेरिया का एक भी मामला नहीं मिला है। WHO के महानिदेशक टेड्रोस गैब्रिएसस का कहना है, चीन ने यह सफलता दशकों की कड़ी मेहनत के बाद पाई है। इस घोषणा के साथ चीन उन देशों में शामिल हो गया है जो यह साबित कर चुके हैं कि देश को मलेरिया मुक्त बनाया नामुमकिन नहीं है। वो चीनी रणनीति जिससे मलेरिया पर काबू पायामलेरिया से निपटने के लिए चीन ने 2012 में 1-3-7 की रणनीति लागू की। स्वास्थ्य कर्मियों के लिए टार्गेट तय किए किए। रणनीति के मुताबिक, 1 दिन के अंदर मलेरिया के मामले को रिपोर्ट करना अनिवार्य किया गया। 3 दिन के अंदर इस मामले की पड़ताल करना और इससे होने वाले खतरे...
महामारी में अपनों में दूर हुए डॉक्टर्स बोले; उस मुश्किल दौर में हम डॉक्टर्स होने के साथ मरीज के लिए फैमिली भी थे, कैसे पीछे हटते

महामारी में अपनों में दूर हुए डॉक्टर्स बोले; उस मुश्किल दौर में हम डॉक्टर्स होने के साथ मरीज के लिए फैमिली भी थे, कैसे पीछे हटते

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चुनौती भरा एक-एक लम्हा और पल-पल बढ़ते मौतों के आंकड़े ने सबसे ज्यादा परेशान डॉक्टर्स को किया। मरीजों को बचाने की जद्दोजहद में ये अपनों से दूर हुए। कई रातों तक सो नहीं पाए। इनमें से कई डॉक्टर्स ऐसे भी थे, जिन्होंने अपनों को खोया लेकिन मरीजों का साथ नहीं छोड़ा। आज डॉक्टर्स डे है। यह दिन जाने-माने डॉक्टर बिधान चंद्र रॉय की याद में मनाया जाता है। डॉ. बिधान चंद्र स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री भी रहे।महामारी के इस दौर में अभी भी डॉक्टर्स और आम लोगों के लिए चुनौतियों का दौर खत्म नहीं हुआ है। डॉक्टर्स डे के इस मौके पर जानिए, महामारी ने डॉक्टर्स का जीवन कितना बदला और क्या सबक दिए... कोरोना की दूसरी लहर में मरीजों में नए तरह के मामले ज्यादा दिखे मसीना हॉस्पिटल मुम्बई की कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. सोनम सोलंकी कहती हैं, महामारी का सामना करते हुए एक साल...
तीसरी लहर को रोकने के लिए डेल्टा प्लस से बचाव करना जरूरी, एक्सपर्ट से जानिए कोरोनावायरस से कैसे बना खतरनाक डेल्टा प्लस वैरिएंट

तीसरी लहर को रोकने के लिए डेल्टा प्लस से बचाव करना जरूरी, एक्सपर्ट से जानिए कोरोनावायरस से कैसे बना खतरनाक डेल्टा प्लस वैरिएंट

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देश में कोरोना के नए रूप डेल्टा प्लस के करीब 50 मामले मिल चुके हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में इसके मिलने की पुष्टि भी हो चुकी है। कौन सी वैक्सीन इस वैरिएंट पर अधिक असरदार है, यह जानकारी सामने आना बाकी है, लेकिन हालिया रिसर्च में सामने आया है कि कोवैक्सीन डेल्टा प्लस वैरिएंट पर असरदार है। एक्सपर्ट्स का कहना है, तीसरी लहर को रोकने के लिए डेल्टा प्लस से बचाव करना जरूरी है। मुम्बई के मसीना हॉस्पिटल में संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. तृप्ति गिलाडा से जानिए, डेल्टा प्लस वैरिएंट कैसे बना और यह कितना खतरनाक है... कोरोनावायरस से कैसे बना डेल्टा प्लस वैरिएंट?डॉ. तृप्ति कहती हैं, दूसरे वायरस की तरह कोरोना भी रेप्लिकेट होता है, यानी अपनी संख्या को बढ़ाता है। इस दौरान वायरस में म्यूटेशन होता है। यह वायरस में एक तरह का होने वाला बदलाव है। इस तरह वायरस में हज...
5 हजार साल पहले ‘काली मौत’ महामारी फैलाने वाला बैक्टीरिया प्राचीन शिकारी की खोपड़ी में मिला, जर्मनी के वैज्ञानिकों का दावा

5 हजार साल पहले ‘काली मौत’ महामारी फैलाने वाला बैक्टीरिया प्राचीन शिकारी की खोपड़ी में मिला, जर्मनी के वैज्ञानिकों का दावा

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जर्मनी के वैज्ञानिकों ने 5 हजार साल पुराने उस बैक्टीरिया को खोज लिया है जिसने 14वीं सदी में 'काली मौत' नाम की महामारी फैलाई थी। बैक्टीरिया का नाम यर्सिनिया पेस्टिस है, इसे एक प्राचीन शिकारी की खोपड़ी से खोजा गया है। रिसर्च के दौरान यह साबित भी हो चुका है। अब तक माना जाता था कि 'काली मौत' यानी 'ब्लैक डेथ' प्लेग का बैक्टीरिया एक हजार साल पुराना है, लेकिन नई रिसर्च कहती है कि इसका वंश 7 हजार साल पुराना है। यह दावा जर्मनी की कील यूनिवर्सिटी ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है। मौत के समय शिकारी की उम्र 20 से 30 साल थीकील यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता क्रॉस कियोरा का कहना है, हमें जिस शिकारी की खोपड़ी से यह बैक्टीरिया मिला है, मौत के समय उसकी उम्र करीब 20 से 30 साल थी। खोपड़ी को RV2039 नाम दिया गया है। लाटविया के रिन्नूकाल्न्स इलाके में इस शिकारी को करीब 5 हजार साल पहले दफनाया गया था। वैज्ञानिकों...
5 हजार साल पहले ‘काली मौत’ महामारी फैलाने वाला बैक्टीरिया प्राचीन शिकारी की खोपड़ी में मिला, जर्मनी के वैज्ञानिकों का दावा

5 हजार साल पहले ‘काली मौत’ महामारी फैलाने वाला बैक्टीरिया प्राचीन शिकारी की खोपड़ी में मिला, जर्मनी के वैज्ञानिकों का दावा

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जर्मनी के वैज्ञानिकों ने 5 हजार साल पुराने उस बैक्टीरिया को खोज लिया है जिसने 14वीं सदी में 'काली मौत' नाम की महामारी फैलाई थी। बैक्टीरिया का नाम यर्सिनिया पेस्टिस है, इसे एक प्राचीन शिकारी की खोपड़ी से खोजा गया है। रिसर्च के दौरान यह साबित भी हो चुका है। अब तक माना जाता था कि 'काली मौत' यानी 'ब्लैक डेथ' प्लेग का बैक्टीरिया एक हजार साल पुराना है, लेकिन नई रिसर्च कहती है कि इसका वंश 7 हजार साल पुराना है। यह दावा जर्मनी की कील यूनिवर्सिटी ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है। मौत के समय शिकारी की उम्र 20 से 30 साल थीकील यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता क्रॉस कियोरा का कहना है, हमें जिस शिकारी की खोपड़ी से यह बैक्टीरिया मिला है, मौत के समय उसकी उम्र करीब 20 से 30 साल थी। खोपड़ी को RV2039 नाम दिया गया है। लाटविया के रिन्नूकाल्न्स इलाके में इस शिकारी को करीब 5 हजार साल पहले दफनाया गया था। वैज्ञानिकों...
पहेली और जादुई करतब की ओर ध्यान देने वाले बच्चे अधिक बुद्धिमान हो सकते हैं, चीजों को समझने की जिज्ञासा इनमें सीखने की चाहत बढ़ाती है

पहेली और जादुई करतब की ओर ध्यान देने वाले बच्चे अधिक बुद्धिमान हो सकते हैं, चीजों को समझने की जिज्ञासा इनमें सीखने की चाहत बढ़ाती है

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पहेली और जादुई करतब की ओर आकर्षित होने वाले बच्चे अधिक बुद्धिमान हो सकते हैं। बच्चों में चीजों को समझने की जिज्ञासा उन्हें अधिक समझदार बना सकती है। यह दावा जॉन्स हॉप्किन्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में किया है। वैज्ञानिकों ने 11 माह और इससे अधिक उम्र के 65 बच्चों में जिज्ञासा का स्तर समझने के लिए 3 महीने तक रिसर्च की। ऐसे बच्चों के बुद्धिमान होने की संभावना अधिकवैज्ञानिकों का कहना है, जो बच्चे खास तरह के करतब जैसे पानी में तैरता हुआ खिलौना, दीवार से गुजरती हुई गेंद को ध्यान से देखते हैं उनमें अधिक जिज्ञासा होती है। शोधकर्ता लीजा फीगेनसन कहती है, जादुई करतबों को देखकर बच्चों में पैदा होने वाली जिज्ञासा बताती है कि वो कितना चीजों को समझना चाहते हैं। तीन साल तक चली रिसर्चसायकोलॉजिस्ट जैस्मीन पेरेज कहती हैं, बच्चों में जिज्ञासा का स्तर बताता है कि वह पढ़ाई में कैसा होग...
खून की एक जांच से 50 तरह के कैंसर का समय से पहले पता लगाया जा सकेगा, ट्यूमर की लोकेशन भी जानी जा सकेगी; अमेरिकी कम्पनी ने विकसित किया टेस्ट

खून की एक जांच से 50 तरह के कैंसर का समय से पहले पता लगाया जा सकेगा, ट्यूमर की लोकेशन भी जानी जा सकेगी; अमेरिकी कम्पनी ने विकसित किया टेस्ट

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एक ब्लड टेस्ट से 50 तरह के कैंसर का पता समय से पहले लगाया जा सकता है। काफी हद तक कैंसर की लोकेशन भी जानी जा सकती है। इंग्लैंड की स्वास्थ्य एजेंसी नेशनल हेल्थ सर्विसेज ने इस ब्लड टेस्ट को पायलट स्टडी के तौर पर शुरू किया है। वैज्ञानिकों का कहना है, इस ब्लड टेस्ट का लक्ष्य 50 साल और इससे अधिक उम्र के लोगों में बीमारियों के खतरे को कम करना है। गलत भविष्यवाणी की सम्भावना कमगार्जियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ब्लड टेस्ट की मदद से हेड एंड नेक, ओवेरियन, पेन्क्रियाटिक, इसोफेगल और ब्लड कैंसर का पता समय से पहले लगाया जा सकता है। रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि टेस्ट के आधार पर बीमारियों की भविष्यवाणी होने की बात गलत साबित होने की सम्भावना कम ही होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस टेस्ट की मदद से ब्लड कैंसर जैसे मामलों की 55.1% तक सटीक जानकारी दी जा सकती है। वहीं, बीमारी के गलत साबित होने ...
अब मास्क से होगी कोरोना की जांच, यह सांस में मौजूद कोरोना के कणों का पता लगाकर 90 मिनट में करेगा अलर्ट

अब मास्क से होगी कोरोना की जांच, यह सांस में मौजूद कोरोना के कणों का पता लगाकर 90 मिनट में करेगा अलर्ट

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अब मास्क की मदद से कोरोना की जांच भी की जा सकेगी। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ऐसा मास्क तैयार किया है जिससे पता लगाया सकता है कि इंसान कोविड-19 से संक्रमित है या नहीं। यह मास्क इंसान की सांस से संक्रमण का पता लगाता है। इस मास्क को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने मिलकर तैयार किया है। वैज्ञानिकों का कहना है, हम कई सालों से तकनीक की मदद से इबोला और जीका जैसे वायरस का पता लगाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन पिछले साल महामारी के कारण हमने कोरोना वायरस पता लगाने के लिए लक्ष्य को बदला। ऐसा दिखता है सेंसर मास्क। 90 मिनट में बताता है रिजल्टवैज्ञानिकों के मुताबिक, मास्क में मौजूद डिस्पोजेबल सेंसर जब एक्टिवेट हो जाता है तो सांस में मौजूद कोरोना के कणों का पता लगाता है। कोरोना के कण मिलने पर सेंसर का का रंग बदल जाता है और 90 मिनट में जांच का रिजल्ट...
दुनिया का पहला बिना बैटरी वाला वायरलेस पेसमेकर, ओपन हार्ट सर्जरी और हार्ट अटैक होने पर इसे लगाया तो निकलने की जरूरत नहीं, यह घुल जाएगा

दुनिया का पहला बिना बैटरी वाला वायरलेस पेसमेकर, ओपन हार्ट सर्जरी और हार्ट अटैक होने पर इसे लगाया तो निकलने की जरूरत नहीं, यह घुल जाएगा

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वैज्ञानिकों ने दुनिया का पहला बिना बैटरी वाला वायरलेस पेसमेकर तैयार किया है। खास बात है कि इस इम्प्लांट को शरीर से निकालने की जरूरत नहीं पड़ती, यह अपने आप ही घुल जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह ऐसे टेम्प्रेरी पेसमेकर का बेहतर विकल्प है जिसे लगाने के कुछ समय बाद सर्जरी करके निकाला जाता है। इसलिए लगाया जाता है पेसमेकरवैज्ञानिकों का मानना है कि यह डिवाइस एक दिन टेम्प्रेरी पेसमेकर को रिप्लेस कर देगी। ओपन हार्ट सर्जरी, हार्ट अटैक और ड्रग ओवरडोज के बाद कुछ मरीजों को टेम्प्रेरी पेसमेकर की जरूरत होती है। ओपन हार्ट सर्जरी के दौरान टेम्प्रेरी पेसमेकर को हार्ट की मांसपेशी के साथ सिल दिया जाता है। एक बार हार्ट सामान्य होने के बाद पेसमेकर को निकाल दिया जाता है, लेकिन वर्तमान में तैयार डिवाइस को हटाने की जरूरत नही पड़ेगी। 5 से 7 हफ्ते में घुल जाता हैइस पेसमेकर को तैयार करने वाली नॉर्थवेस्टर...
चावल से तैयार की कॉलरा की वैक्सीन, इसे स्टोर करने के लिए कूलिंग सिस्टम की जरूरत नहीं और न ही सुई का दर्द सहना पड़ेगा

चावल से तैयार की कॉलरा की वैक्सीन, इसे स्टोर करने के लिए कूलिंग सिस्टम की जरूरत नहीं और न ही सुई का दर्द सहना पड़ेगा

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जापान के वैज्ञानिकों ने चावल से कॉलरा (हैजा) की वैक्सीन तैयार की है। वैक्सीन का पहला ह्यूमन ट्रायल सफल रहा है। वैक्सीन तैयार करने वाली टोक्यो और चिबा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का दावा है, ट्रायल के दौरान इसके कोई साइडइफेक्ट नहीं दिखे हैं और बेहतर इम्यून रिस्पॉन्स दिखा है। इस वैक्सीन को म्यूको-राइस-सीटीबी नाम दिया गया है। लैंसेट माइक्रोब जर्नल में ट्रायल के पहले चरण के रिजल्ट पब्लिश किए गए हैं। 3 पॉइंट में समझें वैक्सीन की खासियत स्टोरेज के लिए कूलिंग सिस्टम की जरूरत नहीं: शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस वैक्सीन को रूम टेम्प्रेचर पर भी रखा जा सकता है। इसके कहीं भी भेजने के लिए फ्रिज या कूलिंग सिस्टम की जरूरत नहीं होती।सुई का दर्द नहीं झेलना पड़ेगा: कॉलरा की वैक्सीन के लिए सुई का दर्द झेलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह ओरल वैक्सीन है। इसे लिक्विड के साथ मिलाकर पीया जा सकता है।आंतों की...