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आज से स्पेस टूरिज्म शुरू:एलन मस्क की कंपनी ने रचा इतिहास, 4 आम लोगों को रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजा; ये 575 किमी ऊपर पृथ्वी की कक्षा में 3 दिन गुजारेंगे

आज से स्पेस टूरिज्म शुरू:एलन मस्क की कंपनी ने रचा इतिहास, 4 आम लोगों को रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजा; ये 575 किमी ऊपर पृथ्वी की कक्षा में 3 दिन गुजारेंगे

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फ्लोरिडा अमेरिकी कारोबारी एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने आज इतिहास रच दिया। उसने भारतीय समयानुसार सुबह 5:33 बजे पहली बार 4 आम लोगों को अंतरिक्ष में भेजा। नासा के फ्लोरिडा स्थित कैनेडी स्पेस रिसर्च सेंटर से फॉल्कन-9 रॉकेट की लॉन्चिंग हुई। इसके करीब 12 मिनट बाद ड्रैगन कैप्सूल रॉकेट से अलग हो गया। यह कैप्सूल 357 मील यानी करीब 575 किलोमीटर की ऊंचाई पर पृथ्वी की कक्षा में तीन दिन चक्कर लगाएगा। 2009 के बाद पहली बार इंसान इतनी ऊंचाई पर पहुंचा है। मई 2009 में वैज्ञानिक हबल टेलिस्कोप की रिपेयरिंग के लिए 541 किलोमीटर की ऊंचाई पर गए थे। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पर अंतरिक्ष यात्रियों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन यह 408 किलोमीटर की ऊंचाई पर है। इस मिशन को इंस्पिरेशन 4 नाम दिया गया है। मिशन का मकसद चैरिटीइस मिशन का मकसद अमेरिका के टैनेसी स्थित सेंट जूड चिल्ड्रन रिसर्च हॉस्पिटल के लिए फंडि...
बच्चे को खोने के बाद जानवर भी टूट जाते हैं:बच्चे की मौत के बाद दुखी बंदरिया उसे कलेजे से लगाकर महीनों भटकती रहती है, इस गम से उबरने में महीनों लग जाते हैं

बच्चे को खोने के बाद जानवर भी टूट जाते हैं:बच्चे की मौत के बाद दुखी बंदरिया उसे कलेजे से लगाकर महीनों भटकती रहती है, इस गम से उबरने में महीनों लग जाते हैं

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किसी अपने को खाने के बाद इंसान ही नहीं जानवरों को भी दुख से उबरने में समय लगता है। बच्चे की मौत होने पर बंदरिया को इस दु:ख से उबरने में महीनों का समय लगता है। दुखी होने के कारण वह मृत बच्चे को कलेजे से लगातार महीनों भटकती रहती है। यह बात यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की रिसर्च में सामने आई है। बंदर अपने बच्चों की मौत पर कैसे दुख से उबरते हैं, इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने इनकी 50 प्रजातियों पर तैयार की गईं 409 रिपोर्ट्स का अध्ययन किया। अलग-अलग प्रजाति की मादा बंदर इतने दिन दुखी रहती है हालिया स्टडी के लिए यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं ने 1915 से लेकर 2020 तक के बंदरों, ऐप्स, बुशबेबीज और लेमूर का उनके मृत बच्चों के प्रति किए जाने वाले व्यवहार का अध्ययन किया। 1915 में हुई एक स्टडी में सायकोलॉजिस्ट रॉबर्ट यर्क्स ने लिखा है, बंदरों की एक प्रजाति रीसस मकाक्यू अपने म़ृत बच्चे क...
फ्रांस के शोधकर्ताओं का दावा:झुर्रियां रोकने वाला बोटॉक्स इंजेक्शन कोविड भी रोक सकता है, यह इंजेक्शन उस केमिकल को रोकता है जो कोरोना को संक्रमण फैलाने में मदद करता है

फ्रांस के शोधकर्ताओं का दावा:झुर्रियां रोकने वाला बोटॉक्स इंजेक्शन कोविड भी रोक सकता है, यह इंजेक्शन उस केमिकल को रोकता है जो कोरोना को संक्रमण फैलाने में मदद करता है

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झुर्रियों को रोकने वाला बोटॉक्स इंजेक्शन कोविड होने से रोक सकता है। यह दावा फ्रांस के शोधकर्ताओं ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है। शोधकर्ताओं का कहना है, पिछले साल जुलाई में बोटॉक्स का इंजेक्शन लेने वाले करीब 200 मरीजों पर रिसर्च की गई। रिसर्च में सामने आया कि मात्र 2 लोगों ही कोरोना के लक्षण दिखे। रिसर्च करने वाली फ्रांस के मॉन्टिपेलियर यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के वैज्ञानिकों का कहना है, बोटॉक्स इंजेक्शन कोरोना से बचाने में मदद कर सकता है। इस पर और स्टडी की जा रही है। बोटॉक्स कैसे कोरोना को रोकता है?शोधकर्ताओं का कहना है, एसिटिलकोलीन केमिकल के कारण मांसपेशियां सिकुड़ती हैं और झुर्रियां दिखती हैं। बोटॉक्स इंजेक्शन इसी केमिकल को बढ़ने से रोकता है और मांसपेशियों को रिलैक्स करता है। रिसर्च में दावा किया गया है कि कोरोनावायरस इसी एसिटिलकोलीन केमिकल के साथ जुड़कर कोशिकाओं को संक्रमित करता...
प्रोटीन को न पचा पाने की बीमारी:8 साल की लिली का जीवन सिर्फ फलों और सब्जियों के सहारे, जन्मजात दुर्लभ बीमारी के कारण प्रोटीन लेने की मनाही; यह ब्रेन डैमेज कर सकता है

प्रोटीन को न पचा पाने की बीमारी:8 साल की लिली का जीवन सिर्फ फलों और सब्जियों के सहारे, जन्मजात दुर्लभ बीमारी के कारण प्रोटीन लेने की मनाही; यह ब्रेन डैमेज कर सकता है

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अक्सर आहार विशेषज्ञ डाइट में प्रोटीन लेने की सलाह जरूर देते हैं क्योंकि यह शरीर की ग्रोथ के लिए जरूरी है। यूके में रहने वाली 8 साल की लिली-एन वूलिस में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। इन्हें प्रोटीन से दूरी बनाने की सलाह दी गई है। लिली पिछले 8 सालों से सिर्फ फल और सब्जियों के सहारे जी रही हैं। इनके खानपान से मीट, नट्स और डेयरी प्रोडक्टस गायब हैं। इसकी वजह है फेनिलकीटोनूरिया नाम की जन्मजात बीमारी। क्या है फेनिलकीटोनूरियाफेनिलकीटोनूरिया एक दुर्लभ बीमारी है जिसमें शरीर प्रोटीन को पचा नहीं पाता। यह बीमारी माता-पिता में मिले जीन्स में गड़बड़ी होने पर होती है। प्रोटीन की मात्रा अधिक लेने पर ब्रेन तक डैमेज हो सकता है। इन्हें दिनभर में सिर्फ 4 ग्राम प्रोटीन लेने की सलाह दी गई है। लिली की 43 वर्षीय मां कार्मेन विल्की कहती हैं, बेटी डाइट में उतनी ही चीजें ले पाती है जो उसे जिंदा रख सके। ...
लैंसेट की रिसर्च:डेल्टा वैरिएंट्स से बचने के लिए भी बूस्टर डोज की जरूरी नहीं, इस पर वैक्सीन 95% असरदार, नए वैरिएंट्स को रोकने के लिए वैक्सीन लगवाना जरूरी

लैंसेट की रिसर्च:डेल्टा वैरिएंट्स से बचने के लिए भी बूस्टर डोज की जरूरी नहीं, इस पर वैक्सीन 95% असरदार, नए वैरिएंट्स को रोकने के लिए वैक्सीन लगवाना जरूरी

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डेल्टा वैरिएंट्स या कोविड से बचने के लिए क्या बूस्टर डोज की जरूरत है? इस सवाल का जवाब अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने अपनी हालिया रिसर्च में दिया। वैज्ञानिकों का कहना है, कोरोना की वैक्सीन डेल्टा वैरिएंट पर भी इतनी असरदार है कि लोगों को बूस्टर डोज लेने की जरूरत नहीं है। लैंसेट जर्नल में पब्लिश इस रिसर्च में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के वैज्ञानिक शामिल हैं। वैक्सीन का डोज या बूस्टर क्या है जरूरी?शोधकर्ताओं का कहना है, अब तक की गई रिसर्च कहती है, कोरोना के हर वैरिएंट पर वैक्सीन असरदार है। कोरोना के अल्फा और डेल्टा जैसे वैरिएंट्स से जूझने वाले मरीजों पर वैक्सीन 95 फीसदी तक असरदार है। शोधकर्ता और WHO की वैज्ञानिक डॉ. एना मारिया का कहना है, अब तक सामने आए रिसर्च के परिणाम बताते हैं कि वैक्सीन से उन मरीजों की जान बचाई जा सकती है जो कोरो...
ग्रीन हाउस गैस रोकने के लिए प्रयोग:गायों को इंसानों की तरह टॉयलेट का इस्तेमाल करना सिखाया, जर्मन वैज्ञानिकों दावा; इससे ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को कंट्रोल कर सकेंगे

ग्रीन हाउस गैस रोकने के लिए प्रयोग:गायों को इंसानों की तरह टॉयलेट का इस्तेमाल करना सिखाया, जर्मन वैज्ञानिकों दावा; इससे ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को कंट्रोल कर सकेंगे

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गाय भी इंसान की तरह टॉयलेट का इस्तेमाल कर सकती है। जर्मनी के वैज्ञानिकों ने गायों को इस तरह ट्रेनिंग दी है कि ये इनके लिए खासतौर पर बनाए गए टॉयलेट 'मूलू' में जाकर ही यूरिन रिलीज करती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है, गायों के ऐसा करने पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम किया जा सकेगा। गायों का इस तरह टॉयलेट में जाकर यूरिन रिलीज करना पर्यावरण के लिए फायदेमंद साबित होगा। यह स्टडी जर्मनी के रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर फार्म एनिमल बायोलॉजी ने की है। ऐसे रोकते हैं ग्रीनहाउस गैसकरंट बायोलॉजी में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक, खुले में जानवरों के मलत्याग को रोककर आमोनिया को बढ़ने से रोका जा सकता है। जो मिट्टी की उर्वरता पर बुरा असर डालती है। सूक्ष्मजीवों की मदद से आमोनिया नाइट्रस ऑक्साइड में तब्दील हो सकती है। जो कार्बन-डाई ऑक्साइड और मेथेन के बाद तीसरी सबसे प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है। ग्रीनहाउस गैसों म...
अमेरिकी वैज्ञानिकों ने विकसित की नई तरह की ऐप:खांसने की आवाज सुनकर ऐप बताएगा इंसान किस बीमारी से जूझ रहा है, दावा; घर बैठे डॉक्टर से भी ज्यादा सटीक जानकारी देगा

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने विकसित की नई तरह की ऐप:खांसने की आवाज सुनकर ऐप बताएगा इंसान किस बीमारी से जूझ रहा है, दावा; घर बैठे डॉक्टर से भी ज्यादा सटीक जानकारी देगा

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अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ऐसी ऐप तैयार की है जो इंसान की खांसने की आवाज सुनकर बताएगा कि वो किस बीमारी से जूझ रहा है। इसे अमेरिका की कम्पनी हाइफी इंक ने विकसित किया है। ऐप सटीक नतीजे बात सके, इसके लिए इसमें अलग-अलग तरह की बीमारियों में आने वाली खांसी की लाखों आवाजें शामिल की गईं ये आवाजें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से बताती हैं कि मरीज को क्या परेशानी हो सकती है। भविष्य में अस्थमा, निमोनिया या कोरोना जैसी बीमारी होने पर पता चल सकेगा कि इंसान कितनी गंभीर स्थिति में है। ऐप पर ऐसे मिलेंगे सटीक नतीजेऐप को तैयार करने वाली कम्पनी के चीफ मेडिकल ऑफिसर और टीबी एक्सपर्ट डॉ. पीटर स्माल का कहना है, अलग-अलग बीमारियों में खांसने की आवाज भी बदल जाती है। जैसे, कोई अस्थमा से जूझ रह है तो उसकी सांस और खांसी में एक तरह की घरघराहट होती है। वहीं, निमोनिया के मरीजों में फेफड़ों से अलग तरह की आवाज आती है। ...
कैंसर का नया ब्लड टेस्ट ‘गेलेरी’:लक्षण दिखने से पहले 50 से अधिक तरह के कैंसर की जानकारी देने वाले टेस्ट का ट्रायल शुरू, ट्यूमर किस हिस्से में है यह भी बताएगा; जानिए इसके बारे में

कैंसर का नया ब्लड टेस्ट ‘गेलेरी’:लक्षण दिखने से पहले 50 से अधिक तरह के कैंसर की जानकारी देने वाले टेस्ट का ट्रायल शुरू, ट्यूमर किस हिस्से में है यह भी बताएगा; जानिए इसके बारे में

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अब लक्षण दिखने से पहले ही एक ब्लड टेस्ट से 50 से अधिक तरह के कैंसर का पता चल सकेगा। ब्रिटेन की स्वास्थ्य एजेंसी नेशनल हेल्थ सर्विस ने सोमवार से इस टेस्ट के लिए ट्रायल की शुरुआत की। इस जांच का नाम गेलेरी टेस्ट रखा गया है। इस टेस्ट को हेल्थकेयर कंपनी ग्रेल ने विकसित किया है। यह जांच कितनी कारगर इसे समझने के लिए इंग्लैंड के 8 क्षेत्रों में 1,40,000 लोगों पर ट्रायल शुरू किया गया है। यह अपनी तरह का पहला ऐसा ट्रायल है। यह ट्रायल नेशनल हेल्थ सर्विस कैंसर रिसर्च यूके और किंग्स कॉलेज लंदन के साथ मिलकर किया जा रहा है। शरीर किस हिस्से में है कैंसर, पता चलेगाग्रेल यूरोप के प्रेसिडेंट सर हरपाल कुमार कहते हैं, गेलेरी टेस्ट कैंसर की जानकारी देने के साथ कैंसर शरीर के किस हिस्से में है, यह भी पता चलता है। यह खतरनाक कैंसर का भी पता लगाता है और इस टेस्ट की रिपोर्ट गलत आने की आशंका कम है। हम नेशनल हेल्थ...
अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी CDC की रिपोर्ट:वैक्सीन न लगवाने वालों में कोविड से मौत का खतरा 10 गुना तक ज्यादा, टीके के असर को जांचने वाली इन 3 रिसर्च रिपोर्ट से समझें उनका असर

अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी CDC की रिपोर्ट:वैक्सीन न लगवाने वालों में कोविड से मौत का खतरा 10 गुना तक ज्यादा, टीके के असर को जांचने वाली इन 3 रिसर्च रिपोर्ट से समझें उनका असर

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जिन लोगों ने कोरोना की वैक्सीन नहीं लगवाई है उन्हें कोविड होने पर मौत का खतरा 10 गुना तक ज्यादा है। अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी सीडीसी ने अपनी वीकली रिपोर्ट में यह दावा किया है। सीडीसी ने तीन स्टडीज के जरिए यह जोर दिया है कि कोरोना से होने वाली मौतों को रोकना है तो कोविड की वैक्सीन लगवाना जरूरी है। सीडीसी ने अपनी वीकली रिपोर्ट 'मॉर्बेलिटी एंड मॉर्टेलिटी' में वैक्सीन के असर को बताने वाली तीन अलग-अलग रिसर्च शामिल की हैं, जानिए इनके बारे में... पहली रिसर्च: अमेरिका के 13 राज्यों में 6 लाख लोगों को शामिल कियावर्तमान में मौजूद कोविड की सभी वैक्सीन हॉस्पिटल में भर्ती होने और मौत का खतरा घटाती हैं। डेल्टा के मामले में भी। इसे समझने के लिए सीडीसी ने कोविड के 6 लाख मामलों का अध्ययन किया। इसमें वैक्सीन लेने के बाद 18 साल या इससे अधिक उम्र के हॉस्पिटल में भर्ती होने वाले मरीज और कोरोना के मरने वाल...
लॉन्ग कोविड का एक खतरा यह भी:आईसीयू में भर्ती हुए कोविड के मरीजों में किडनी फेल होने का खतरा अधिक, 90% मरीज समझ नहीं पाते वे बीमारी से जूझ रहे या नहीं

लॉन्ग कोविड का एक खतरा यह भी:आईसीयू में भर्ती हुए कोविड के मरीजों में किडनी फेल होने का खतरा अधिक, 90% मरीज समझ नहीं पाते वे बीमारी से जूझ रहे या नहीं

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कोरोना से रिकवर होने वाले मरीजों में किडनी बुरी तरह डैमेज हो रही हैं और मरीजों को कोई लक्षण नहीं दिखाई दे रहे हैं। यह दावा अमेरिका की वाशिंगटन यूनिवर्सिटी की रिसर्च में किया गया है। रिसर्च कहती है, कोरोना के वो मरीज जो हॉस्पिटल में भर्ती हुए या जिनमें हल्के लक्षण दिखे थे उनमें किडनी डैमेज (एंड स्टेज किडनी डिजीज) होने का खतरा है। 1 सितम्बर को अमेरिकन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी में पब्लिश रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना से रिकवर होने वाले जिन मरीजों को धमनियों से जुड़ी समस्या हुई। हॉस्पिटल में भर्ती होने के बाद उनमें किडनी की बीमारी शुरू हुई। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता जियाद अल-अली कहते हैं, संक्रमण के बाद आईसीयू में भर्ती होने वाले मरीजों में किडनी के फेल होने का खतरा अधिक है। मरीजों के आंकड़ों पर रिसर्च कीसेंट लुइस हेल्थ केयर सिस्टम और वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अमेरिका में फे...