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दिल की सेहत को लक्षणों से समझें:पैर में सूजन, थकान और सांस लेने में दिक्कत को नजरअंदाज न करें क्योंकि पिछले 20 साल में सबसे ज्यादा मौतें हदय रोगों से हुईं

दिल की सेहत को लक्षणों से समझें:पैर में सूजन, थकान और सांस लेने में दिक्कत को नजरअंदाज न करें क्योंकि पिछले 20 साल में सबसे ज्यादा मौतें हदय रोगों से हुईं

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, पिछले 20 सालों में दुनिया में होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण हृदय से जुड़े रोग हैं। जब हृदय की मांसपेशियां रक्त को पर्याप्त मात्रा में पम्प नहीं कर पाती हैं तब हृदय रोगों की शुरआत होती है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। जैसे कि रक्त वाहिकाओं का सिकुड़ना, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट का धीरे-धीरे कमजोर हो जाना या फिर हार्ट का कठोर हो जाना। ऐसा होने पर उसमें न तो पर्याप्त रक्त भर पाता है और न ही वह पम्प कर पाता है। हार्ट फेल्योर सोसायटी ऑफ अमेरिका ने हदय रोगों से जुड़े संकेतों को समझने के लिए फॉर्मूला FACES बनाया है। यहां F= Fatigue यानी थकान, A= Activity Limitaion यानी शारीरिक गतिविधि में कमी, C= Congestion यानी खून का जमाव, E=Edema or Ankle Swelling यानी पैर में सूजन और S= Shortness of breath का अर्थ सांस लेने में दिक्कत से है। हार्वर्ड इंस्टीट्यू...
कुपोषण और कोरोना का कनेक्शन:कुपोषण का सामना कर चुके बच्चों व वयस्कों को कोविड हुआ तो मौत होने और हालत बिगड़ने का खतरा ज्यादा, जानिए ऐसा क्यों है

कुपोषण और कोरोना का कनेक्शन:कुपोषण का सामना कर चुके बच्चों व वयस्कों को कोविड हुआ तो मौत होने और हालत बिगड़ने का खतरा ज्यादा, जानिए ऐसा क्यों है

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नई रिसर्च कहती है, कुपोषण कोरोना के रिस्क को बढ़ाता है। ऐसे बच्चे और वयस्क जो जीवन में कभी कुपोषण से परेशान हो चुके हैं उनमें संक्रमण हुआ तो मौत का खतरा ज्यादा है। इसमें संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है और वेंटिलेटर की जरूरत पड़ सकती है। यह दावा कैलिफोर्निया चिल्ड्रेंस हॉस्पिटल ऑफ ऑरेंज कंट्री के शोधकर्ताओं ने रिसर्च में किया है। कुपोषण और कोरोना के बीच कनेक्शन को समझिएशोधकर्ताओं का कहना है, कुपोषण रोगों से लड़ने वाले इम्यून सिस्टम के काम करने की क्षमता पर बुरा असर डालता है। इसलिए जब वायरस शरीर को संक्रमित करता है तो हालत नाजुक हो सकती है। रिसर्च कहती है कि कुपोषण का असर शरीर पर लम्बे समय तक रहता है इसलिए इससे इम्यून सिस्टम भी नहीं बच पाता। जीवन में एक बार भी कुपोषण से जूझने 5 साल से कम उम्र के बच्चों और 18 से 78 साल के वयस्क लोगों में कोरोना के गंभीर संक्रमण का खतरा ज्यादा है। शोधकर्ताओ...
खर्राटे और टीवी देखने के बीच कनेक्शन:एक दिन में 4 घंटे से अधिक टीवी देखते हैं तो खर्राटे आने का खतरा 78 फीसदी तक बढ़ता है, हार्वर्ड के वैज्ञानिकों की रिसर्च

खर्राटे और टीवी देखने के बीच कनेक्शन:एक दिन में 4 घंटे से अधिक टीवी देखते हैं तो खर्राटे आने का खतरा 78 फीसदी तक बढ़ता है, हार्वर्ड के वैज्ञानिकों की रिसर्च

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दिनभर में 4 घंटे से अधिक टीवी देखने की आदत है तो अलर्ट हो जाएं। ऐसे लोगों में खर्राटे आने का खतरा 78 फीसदी तक बढ़ जाता है। यह दावा हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोधकर्ताओं ने अपनी हालिया रिसर्च में किया गया है। शोधकर्ताओं ने 10 से 18 साल के ऐसे 1,38,000 बच्चों पर रिसर्च की। उनकी सेहत कैसी है और वो कितना चलते-फिरते हैं, इस पर भी नजर रखी गई। रिसर्च में सामने आया कि एक ही जगह पर बैठे रहने की आदत से ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया हो सकता है। इस वजह से खर्राटे शुरू होने का खतरा 78 फीसदी तक बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं ने सलाह दी है कि ऐसे लोग जो ऑफिस में दिनभर बैठे रहते हैं, उन्हें भी इसकी भरपाई अधिक एक्सरसाइज करके करनी चाहिए। क्यों खतरनाक है स्लीप एप्निया स्लीप एप्निया ऐसी स्थिति है, जब कोई भी एक सांस नली रात में पूरी तरह से ब्लॉक हो जाती है। ऐसा होने पर सामान्य तरीके से सांस लेना मुश्किल हो जात...
बढ़ती उम्र में हड्डियों की सेहत इसलिए जानना जरूरी:बुजुर्ग महिलाओं में कमजोर होती हड्डियों के कारण सोचने-समझने की क्षमता भी घटती है, जानिए बोन्स को कैसे मजबूत बनाएं

बढ़ती उम्र में हड्डियों की सेहत इसलिए जानना जरूरी:बुजुर्ग महिलाओं में कमजोर होती हड्डियों के कारण सोचने-समझने की क्षमता भी घटती है, जानिए बोन्स को कैसे मजबूत बनाएं

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बढ़ती उम्र में महिलाओं में सोचने-समझने की क्षमता घटने की एक वजह वैज्ञानिकों ने बताई है। वैज्ञानिकों का कहना है, हड्डियों को होने वाले नुकसान और फ्रैक्चर के बढ़ते खतरे के कारण ऐसा हो सकता है। गारवां इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च की स्टडी कहती है, 65 साल और इससे अधिक उम्र के लोगों में सोचने-समझने की क्षमता घटना और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ना, दो बड़े खतरे हैं। ये दोनों ही साइलेंट डिजीज हैं, यानी ये शरीर को इतने धीरे-धीरे जकड़ती है कि इंसान को पता नहीं चल पाता। हड्डियों की सेहत जांचना जरूरी16 साल तक चली रिसर्च कहती है कि बुजुर्गों में सोचने-समझने की क्षमता घटना और फ्रैक्चर होने का खतरा लम्बे समय तक बना रहता है। इसे समझ न पाने के कारण लोग इसका इलाज भी नहीं करा पाते। शोधकर्ता जैकलीन सेंटर के मुताबिक, बढ़ती उम्र में हड्डियों की सेहत से इंसान की सोचने-समझने की क्षमता को मॉनिटर किया जा सकता है। इस...
साउथ कोरियाई वैज्ञानिकों का प्रोटोटाइप:सांसों की दुर्गंध पता लगाने वाली डिवाइस, इस पर फूंकें और ऐप बताएगा दुर्गंध की समस्या है या नहीं; जानिए ऐसा होता क्यों है

साउथ कोरियाई वैज्ञानिकों का प्रोटोटाइप:सांसों की दुर्गंध पता लगाने वाली डिवाइस, इस पर फूंकें और ऐप बताएगा दुर्गंध की समस्या है या नहीं; जानिए ऐसा होता क्यों है

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अब एक डिवाइस के मदद से यह पता लगाया जा सकेगा कि सांसों में दुर्गंध की समस्या है या नहीं। साउथ कोरिया के वैज्ञानिकों ने अंगूठे के आकार की ऐसी प्रोटोटाइप डिवाइस तैयार की है जो सांस से दुर्गंध आने पर तुरंत अलर्ट करती है। वैज्ञानिकों का कहना है, सांसों में दुर्गंध आना इस बात का इशारा है कि कई तरह की ओरल प्रॉब्लम हो सकती हैं। इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दुर्गंध का ऐसे पता लगाती है डिवाइसवैज्ञानिकों का कहना है, मुंह और सांस में गंध के लिए हाइड्रोजन सल्फाइड गैस जिम्मेदार होती है। जो इंसान में बनती है। दुर्गंध का पता लगाने के लिए इंसान को डिवाइस में फूंकना पड़ता है। इस दौरान सांसों के जरिए डिवाइस तक हाइड्रोजन सल्फाइड गैस पहुंचती है। डिवाइस इस गैस को पहचानकर इससे जुड़े ऐप पर नतीजे भेजती है। दुर्गंध की समस्या को हेलीटोसिस कहते हैंइसे तैयार करने वाले सैमगंस इलेक्ट्रॉनिक्स और कोरिया एडवा...
साउथ कोरियाई वैज्ञानिकों का प्रोटोटाइप:सांसों की दुर्गंध पता लगाने वाली डिवाइस, इस पर फूंकें और ऐप बताएगा दुर्गंध की समस्या है या नहीं; जानिए ऐसा होता क्यों है

साउथ कोरियाई वैज्ञानिकों का प्रोटोटाइप:सांसों की दुर्गंध पता लगाने वाली डिवाइस, इस पर फूंकें और ऐप बताएगा दुर्गंध की समस्या है या नहीं; जानिए ऐसा होता क्यों है

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अब एक डिवाइस के मदद से यह पता लगाया जा सकेगा कि सांसों में दुर्गंध की समस्या है या नहीं। साउथ कोरिया के वैज्ञानिकों ने अंगूठे के आकार की ऐसी प्रोटोटाइप डिवाइस तैयार की है जो सांस से दुर्गंध आने पर तुरंत अलर्ट करती है। वैज्ञानिकों का कहना है, सांसों में दुर्गंध आना इस बात का इशारा है कि कई तरह की ओरल प्रॉब्लम हो सकती हैं। इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दुर्गंध का ऐसे पता लगाती है डिवाइसवैज्ञानिकों का कहना है, मुंह और सांस में गंध के लिए हाइड्रोजन सल्फाइड गैस जिम्मेदार होती है। जो इंसान में बनती है। दुर्गंध का पता लगाने के लिए इंसान को डिवाइस में फूंकना पड़ता है। इस दौरान सांसों के जरिए डिवाइस तक हाइड्रोजन सल्फाइड गैस पहुंचती है। डिवाइस इस गैस को पहचानकर इससे जुड़े ऐप पर नतीजे भेजती है। दुर्गंध की समस्या को हेलीटोसिस कहते हैंइसे तैयार करने वाले सैमगंस इलेक्ट्रॉनिक्स और कोरिया एडवा...
22 हजार फीट ऊंचाई पर मिले वायरस:तिब्बत के ग्लेशियर पर 15 हजार साल पुरानी बर्फ में 28 ऐसे नए वायरस मिले जिससे वैज्ञानिक भी अंजान; बोले, ये बुरी स्थिति में जिंदा रह सकते हैं

22 हजार फीट ऊंचाई पर मिले वायरस:तिब्बत के ग्लेशियर पर 15 हजार साल पुरानी बर्फ में 28 ऐसे नए वायरस मिले जिससे वैज्ञानिक भी अंजान; बोले, ये बुरी स्थिति में जिंदा रह सकते हैं

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तिब्बत के ग्लेशियर में 15 हजार साल पुरानी बर्फ में 33 वायरस मिले हैं। इनमें से 28 ऐसे नए वायरस हैं जिनके बारे में वैज्ञानिकों के पास भी जानकारी नहीं है। रिसर्च करने वाली अमेरिका की स्टेट ओहियो यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है, जिस बर्फ में वायरस मिले हैं वो 15 हजार साल पहले बनी थी। यह बर्फ पश्चिम कुनलुन शान के गुलिया आइस कैप से ली गई थी, जो तिब्बती पठार में हैं। इन वायरस की जांच करने के बाद वैज्ञानिकों ने बताया है कि ये मिट्टी या पौधे में पाए जाते हैं। वायरस की खोज करने वाली टीम का कहना है, वैज्ञानिकों की मदद से यह जानने की कोशिश की जाएगी कि ये वायरस इतनी शताब्दियों तक कैसे जिंदा रहे। ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के रिसर्चर झी-पिंग झॉन्ग का कहना है, यह रिसर्च माइक्रोबायोलॉजिस्ट और पुराजलवायु विशेषज्ञों ने मिलकर की है। ऐसे बर्फ में पहुंचे वायरस रिसर्चर झॉन्ग का कहना है, गुलिया आ...
एवैस्कुलर नेक्रोसिस की केस स्टडी:कोरोना को हराने के बाद कूल्हे-घुटने के जोड़ों में दर्द के कारण 22 वर्षीय महिला का चलना हुआ मुश्किल, निमोनिया में लिए गए स्टेरॉयड के कारण ऐसा हुआ

एवैस्कुलर नेक्रोसिस की केस स्टडी:कोरोना को हराने के बाद कूल्हे-घुटने के जोड़ों में दर्द के कारण 22 वर्षीय महिला का चलना हुआ मुश्किल, निमोनिया में लिए गए स्टेरॉयड के कारण ऐसा हुआ

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महाराष्ट्र में अब तक एवैस्कुलर नेक्रोसिस के कई मामले सामने आ चुके हैं। इसमे एक मामला ऐसा भी आया है जिसमें कोरोना से ठीक होने के बाद 22 साल की मरीज को एवैस्कुलर नेक्रोसिस से जूझ रही था। इलाज करने वाले एचसीएमसीटी मणिपाल हॉस्पिटल का कहना है, मरीज जब यहां लाई गई तो हालत काफी खराब हो चुकी थी। उसके घुटने और कूल्हे के 2-2 जोड़ों में एवैस्कुलर नेक्रोसिस हो चुका था। चारों जोड़ों में दिक्कत होने के कारण वह चल फिर नहीं सकती थी। क्या है एवैस्कुलर नेक्रोसिस (AVN)यह ऐसी स्थिति जब खून की सप्लाई बंद होने से हड्डियों के उतक डेड होने शुरू हो जाते हैं। इसकी वजह स्टेरायड हैं, जो कोविड के कारण हुए निमोनिया के इलाज के दौरान लिए जाते हैँ। कई रिसर्च में दावा किया गया है कि ऐसी स्थिति में एवैस्कुलर नेक्रोसिस का खतरा बढ़ जाता है। एवैस्कुलर नेक्रोसिस होने के बाद जोड़ों में दर्द शुरू होने के कारण मरीज चलफिर नही...
पेनकिलर्स का विकल्प तैयार करने की कोशिश:वैज्ञानिकों ने दर्द दूर करने वाला हेडसेट बनाया, इसे सिर में पहनने के बाद मरीज ऐप के जरिए दर्द कंट्रोल कर सकेगा; ट्रायल में हुई पुष्टि

पेनकिलर्स का विकल्प तैयार करने की कोशिश:वैज्ञानिकों ने दर्द दूर करने वाला हेडसेट बनाया, इसे सिर में पहनने के बाद मरीज ऐप के जरिए दर्द कंट्रोल कर सकेगा; ट्रायल में हुई पुष्टि

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वैज्ञानिकों ने दर्द को घटाने वाला हेडसेट तैयार किया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इसे 8 हफ्तों तक पहनने के बाद नींद, मूड और क्वालिटी ऑफ लाइफ पहले से बेहतर हुई है। बेचैनी और डिप्रेशन में भी कमी आई है। रिसर्च कहती है, दर्द को घटाने के लिए फिजियोथैरेपी और पेनकिलर्स का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन यह हर मरीज के लिए असरदार नहीं साबित होतीं। कुछ मामलों में साइड इफेक्ट और कुछ मामलों में इसकी आदत भी हो जाती है। ऐसे काम करता है हेडसेट, 3 पॉइंट में समझें रिसर्चर्स कहते हैं, एक छोटे ट्रायल में यह सामने आया है कि इस डिवाइस को सिर में पहनने के बाद दर्द में कमी आती है। दरअसल, यह हेडसेट मस्तिष्क की ब्रेनवेव्स को पढ़ता है। फिर ब्रेन को दर्द से निपटने के लिए तैयार करता है। इस तरह लक्षण में कमी आती है।यह हेडसेट इलेक्ट्रो-एनसिफेलोग्राम (ईईजी) तकनीक की मदद से काम करता है। हेडसेट में लगे 8 इलेक्ट्रोड स...
कब तक रहती हैं एंटीबॉडीज:कोरोना का संक्रमण होने के 9 महीने बाद भी शरीर में रहती हैं एंटीबॉडीज, लक्षण और बिना लक्षण वाले मरीजों में इसका एक जैसा स्तर रहा

कब तक रहती हैं एंटीबॉडीज:कोरोना का संक्रमण होने के 9 महीने बाद भी शरीर में रहती हैं एंटीबॉडीज, लक्षण और बिना लक्षण वाले मरीजों में इसका एक जैसा स्तर रहा

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कोरोना का एक बार संक्रमण होने के बाद एंटीबॉडीज शरीर में कितने दिनों तक रहती हैं, यह सवाल हमेशा से चर्चा में रहा है। हालिया रिसर्च में वैज्ञानिकों ने इसका जवाब दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है, संक्रमण के 9 महीने बाद तक शरीर में एंटीबॉडी का लेवल हाई रहता है। चाहें मरीज में संक्रमण के बाद लक्षण दिखे हों या मरीज एसिम्प्टोमैटिक रहा हो। यह दावा इटली की पडुआ यूनिवर्सिटी और लंदन के इम्पीरियल कॉलेज मिलकर की है। 98.8 फीसदी मरीजों में मिली एंटीबॉडीजपिछले साल फरवरी और मार्च में इटली शहर में 3 हजार कोरोना पीड़ितों के डाटा की एनालिसिस की गई। इनमें से 85 फीसदी मरीजों की जांच की गई। मई और नवम्बर 2020 में एक बार फिर मरीजों में जांच करके एंटीबॉडीज का स्तर देखा गया। जांच में सामने आया कि जो फरवरी और मार्च में संक्रमित हुए थे उनमें से 98.8 फीसदी मरीजों में नवम्बर में भी एंटीबॉडीज पाई गईं। लक्षण और बिना ...