हनुमानगढ़ (सीमा सन्देश न्यूज)। त्याग और बलिदान का प्रतीक ईद-उल-अजहा यानि बकरीद का पर्व जिले में बुधवार को अकीदत व एहतराम से मनाया गया। पिछले साल की भांति कोरोना काल के चलते प्रशासन के दिशा-निदेर्शों की पालना में जामा मस्जिद व ईदगाह में इस साल भी सामूहिक नमाज अदा नहीं की गई। यहां चार से पांच लोगों की मौजूदगी में नमाज अदा कर रस्म निभाई गई। ऐसे में मुस्लिम समाज के नागरिकों ने घरों में ही सामाजिक दूरी की पालना के साथ नमाज अदा कर कोरोना से मुक्ति और अमन चैन की दुआ की। कोरोना काल के बावजूद खासतौर से बच्चों में पर्व का उत्साह देखते ही बन रहा था। सभी ने गले मिलकर घरों में एक-दूसरे को पर्व की बधाई दी। वहीं सोशल नेटवर्क पर पर्व की बधाई देने का सिलसिला भी पूरा दिन चला। साथ ही कुबार्नी के लिए खास इस दिन पर बकरों सहित अन्य जानवरों की कुबार्नी दी गई। दिनभर दावत का सिलसिला घरों में जारी रहा। बकरीद के पर्व पर मुस्लिम मोहल्लों में रौनक बढ़ गई। सुबह से ही लोग नए कपड़े पहन एक-दूसरे से मिलते व मुबारकबाद देते नजर आए। घर-घर में कुबार्नी के साथ मिलने वालों के आने-जाने का सिलसिला बना रहा।
इसलिए मनाई जाती है बकरीद
इस्लाम में बकरीद के त्योहार का बड़ा महत्व है। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक ईद-उल-अजहा 12वें महीने की 10 तारीख को मनाया जाता है। इसी महीने में हज यात्रा भी की जाती है। ईद-उल-फितर की तरह ईद-उल-अजहा पर भी लोग मस्जिदों में नमाज अदा करते हैं। इस ईद पर कुबार्नी देने की खास परंपरा है। इस दिन पैगंबर हजरत इब्राहिम की याद में बकरे या बड़े जानवर की कुबार्नी दी जाती है। मान्यता है कि हजरत इब्राहिम को कई मन्नतों बाद एक औलाद पैदा हुई जिसका नाम उन्होंने इस्माइल रखा। एक रात ख्वाब में हजरत इब्राहिम से अल्लाह ने उनकी सबसे सबसे प्यारी चीज की कुबार्नी मांग ली। अल्लाह के हुक्म पर वह अपने बेटे की कुबार्नी देने को तैयार हो गए। बेटे की कुबार्नी देने के वक्त हजरत इब्राहिम ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। कुबार्नी देने के बाद जब हजरत इब्राहिम ने अपने आंखों से पट्टी हटाई तो देखा कि उनका बेटा जिंदा था और बेटे की जगह अल्लाह ने एक दुंबे (एक जानवर) को कुर्बान कर दिया था। यहीं से इस्लाम में इस रवायत की शुरूआत हुई।