बीकानेर
रेगिस्तान के तपते धोरों के बीच भारतीय सेना इन दिनों अपने शौर्य का प्रदर्शन कर रही है। लेह और लद्दाख में जिन तोपों के साथ भारतीय जवानों ने चीनी सेना को नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया था, उन्हीं तोपों की गूंज पाकिस्तान बॉर्डर से महज 60 किलोमीटर दूर एक बार फिर सुनाई दे रही है। भारतीय सेना रेगिस्तान में युद्धाभ्यास कर रही है।
T-90 और T-72 तोप हो या फिर BMP-2, हर कोई रेगिस्तान के तपते धोरों पर फर्राटे से दौड़ रहे हैं। कहीं मैदानी एरिया है तो कहीं पहाड़ जैसे दिखने वाले मिट्टी के धोरे हैं। इसके बाद भी टैंक की गति कम नहीं होती। भारतीय सेना की सप्त शक्ति कमान पिछले एक महीने से महाजन फील्ड फायरिंग रेंज (MFFR) में अभ्यास कर रही है। मंगलवार को तोप के साथ ही आसमान से दुश्मनों के ठिकानों पर अचूक निशाने साधे गए।

बीएमपी 2 में अंदर बहुत कम जगह के बाद भी जवान आसानी से हमले करते हैं।
भारतीय तकनीक से विकसित बीएमपी 2
पिछले एक महीने से भारतीय सेना जिस तोप से सर्वाधिक प्रभावित है और उसकी ट्रेनिंग लेकर रोमांचित है, उसमें बीएमपी 2 सबसे आगे है। भारत और अमेरिका के बीच हुए युद्धाभ्यास में भी बीएमपी 2 ने यहां दहाड़ लगाई थी। BMP-2M पैदल सेना से लड़ने वाला तोप है, जिसे स्वदेशी भी कहा जाता है। ये BMP-2 IFV का उन्नत संस्करण है। ये भारतीय सशस्त्र बलों के लिए बेहतर गतिशीलता और अग्नि शक्ति प्रदान करता है।
T-90 और T-72 ने दिखाया दम
इस दौरान T-90 और T-72 ने भी दमखम दिखाया। ऊंचे पहाड़ी एरिया में इन्हें चलाना ज्यादा आसान है। अब पहाड़ी के बाद मरु स्थलीय क्षेत्र में इनका परीक्षण किया जा रहा है। भारत-पाक बॉर्डर से महज साठ किलोमीटर दूर महाजन में मंगलवार को ये तोप गरजे। सीमा पर भी आवाज सुनाई दी। इन दोनों तोपों के शामिल होने से भारतीय सेना में डिजिटाइजेशन के नए युग की शुरूआत हो गई है। T-72 सोवियत/रूसी मुख्य युद्ध टैंकों का हिस्सा है, जिसका उत्पादन सबसे पहले 1972 में हुआ था। लगभग 25 हजार T-72 टैंक बनाए गए हैं। इसके नवीनीकरण ने कई को दशकों तक सेवा में बने रहने में सक्षम बनाया है। प्रारंभिक T-72 संस्करणों को दूसरी पीढ़ी के मुख्य युद्धक टैंक के रूप में माना जाता है।

रेत के समंदर में कतार में खड़े तोपों ने गरजना शुरू किया तो पूरे क्षेत्र में धरती जैसे हिलने लगी।
लेह-लद्दाख के पहाड़ों से धोरों तक पहुंची K9 तोप
कुछ महीने पहले भारत और चीन के बीच तनाव के दौरान जिन तोपों का मुंह चीनी सीमा की तरफ मोड़ दिया गया था, उनमें K- 9 भी एक है। इसकी मारक क्षमता करीब 40 किलोमीटर है। ऐसे में सीमा पार तक तबाही मचाने में महज कुछ सेकंड का फासला ही रह जाता है। चीनी सेना काे भारत की इस सैन्य शक्ति का अहसास था, इसीलिए जमीनी लड़ाई लड़ने से बचा रहा। T-90 एक 125 मिमी 2A46 स्मूथबोर मेन गन, 1A45T फायर-कंट्रोल सिस्टम, एक उन्नत इंजन और गनर की थर्मल दृष्टि का उपयोग करता है। T-90 से भारतीय सेना रेगिस्तान में युद्धाभ्यास कर रही है।

भारतीय सेना के जवान युद्ध में फायरिंग की तैयारी कर रहे हैं।
आसमान से बरसे गोले
दूसरे दिन भारतीय सेना ने अभ्यास के दौरान आसमान से दुश्मन के सांकेतिक ठिकानों को खत्म करने वाली फायरिंग भी की। भारतीय सेना के हेलिकॉप्टर जब अभ्यास के बीच आसमान में दिखाई दिए तो अहसास नहीं था कि इतनी खतरनाक एंट्री होगी। इन हेलिकॉप्टर के माध्यम से फायरिंग रेंज में बनाए गए दुश्मन के ठिकानों को कुछ सेकंड में ही खत्म कर दिया गया।