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आंखों से दिमाग का तालमेल समझाएगा मिनी ब्रेन:जर्मनी के वैज्ञानिकों ने स्टेम सेल्स से लैब में विकसित किया कृत्रिम ह्यूमन ब्रेन, इसमें आंखें भी विकसित हुईं; जानिए क्यों है यह खास

आंखों से दिमाग का तालमेल समझाएगा मिनी ब्रेन:जर्मनी के वैज्ञानिकों ने स्टेम सेल्स से लैब में विकसित किया कृत्रिम ह्यूमन ब्रेन, इसमें आंखें भी विकसित हुईं; जानिए क्यों है यह खास

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जर्मनी के वैज्ञानिकों ने लैब में एक कृत्रिम मानव मस्तिष्क तैयार किया है। इस मिनी ब्रेन में आंखें भी हैं। हालांकि आंखें पूरी तरह विकसित नहीं हैं। इस मिनी ब्रेन को इंसान की स्टेम कोशिकाओं से विकसित किया गया है। इसे जर्मनी के इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन जेनेटिक्स के शोधकर्ताओं ने तैयार किया है। वैज्ञानिकों का कहना है, मिनी ब्रेन में आंखें ऐसे विकसित हुई हैं जैसे 5 हफ्ते के भ्रूण की होती हैं। भविष्य में इससे कई नई बातें सामने आ सकेंगी जो कई बीमारियों के इलाज में मदद करेंगी। क्यों खास है यह मिनी ब्रेन, जानिए इसकी 3 बड़ी बातें मिनी ब्रेन 3 मिमी. चौड़ा है। इसमें मौजूद आंखों में कॉर्निया, लेंस और रेटिना है, इसकी मदद से यह रोशनी को देख पाता है। ये आंखें न्यूरॉन और नर्व कोशिकाओं की मदद से यह ब्रेन से कम्युनिकेट भी कर सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है, लैब में तैयार यह रेटिना भविष्य में उन लोगों क...
20 सेकंड तक हाथ धोने की नया तरीका:हाथों की सतह से बैक्टीरिया-वायरस हटाने के लिए अधिक एनर्जी और दबाव जरूरी, जो हाथों को तेजी से मलने और पानी की तेज धार से बनता है

20 सेकंड तक हाथ धोने की नया तरीका:हाथों की सतह से बैक्टीरिया-वायरस हटाने के लिए अधिक एनर्जी और दबाव जरूरी, जो हाथों को तेजी से मलने और पानी की तेज धार से बनता है

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महामारी की शुरुआत से ही एक्सपर्ट 20 सेकंड तक हाथ धोने की सलाह दे रहे हैं। उनका मानना है कि 20 सेकंड में हाथों के हर हिस्से तक साबुन पहुंचना जरूरी है, ताकि बैक्टीरिया या वायरस हाथ की सतह से छूट सके। हाल में हुई एक रिसर्च में 20 सेकंड हाथ धोने सलाह तो दी गई है लेकिन इसकी वजह अलग है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हाथों से बैक्टीरिया और वायरस का निकलना इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितनी तेजी हाथों को धोते हैं और नल से आने वाले पानी का फ्लो कितना तेज है। वैज्ञानिकों ने इसे अपने मैथमेटिकल मॉडल से समझाया है। हाथों में बैक्टीरिया या वायरस क्यों फंसे रह जाते हैं, हाथ धोने का नया तरीका क्या है और हाथों को न धोने से संक्रमण कितना फैल सकता है, जानिए इन सवालों के जवाब... सबसे पहले जानिए, हाथों में वायरस-बैक्टीरिया अटकते क्यों है?रिसर्च करने वाले यूके के हैमंड कंसल्टिंग ग्रुप के वैज्ञानिक पॉल हैम...
बेली फैट बड़ा खतरा:कमर की चर्बी से डायबिटीज, हृदय रोग और कैंसर का खतरा बढ़ता है, जानिए बेली फैट घटाने के 5 आसान और असरदार तरीके

बेली फैट बड़ा खतरा:कमर की चर्बी से डायबिटीज, हृदय रोग और कैंसर का खतरा बढ़ता है, जानिए बेली फैट घटाने के 5 आसान और असरदार तरीके

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हार्वर्ड मेडिकल हेल्थ के मुताबिक, बेली फैट यानी कमर के आसपास चर्बी जमा होना सेहत के लिए ठीक नहीं है। यह चेतावनी की तरह है। मेडिकल भाषा में इस अनहेल्दी फैट को विसरल फैट कहते हैं। ज्यादा चर्बी से टाइप-2 डायबिटीज़, हृदय रोग, यहां तक कि कैंसर का भी खतरा रहता है। बेली फैट कुछ उपायों से आसानी से कम किया जा सकता है। जानिए 5 तरीके जो कमर की चर्बी को घटाने में मदद करेंगे... 1) कैलोरी मैनेजमेंट: 500 कैलोरी ज्यादा खर्च करेंवजन घटाने के लिए भूखा रखने की जरूरत नहीं है। बस, जितना खाएं, उससे 500 कैलोरी ज्यादा खर्च करें। इसे हेल्दी कैलोरी डेफिसिट कहते हैं। 2) वॉक का नियम: हफ्ते में 3 दिन 50-70 मिनट की वॉकइससे बेली फैट काफी कम होता है। हार्वर्ड इंस्टीट्यूट के मुताबिक, इससे न सिर्फ त्वचा के नीचे का फैट बल्कि एब्डॉमिनल कैविटी में छुपा फैट भी घटता होता है। 3) खाने का फॉर्मूला: 30 फीसदी कैलोरी प्रो...
कोरोना की तेज, सस्ती और सटीक जांच का दावा:पेन्सिल की ग्रेफाइट वाली नोक से हो सकेगी कोरोना की जांच; दावा- लार के सैम्पल से 7 मिनट में 100% सटीक नतीजे बताती है

कोरोना की तेज, सस्ती और सटीक जांच का दावा:पेन्सिल की ग्रेफाइट वाली नोक से हो सकेगी कोरोना की जांच; दावा- लार के सैम्पल से 7 मिनट में 100% सटीक नतीजे बताती है

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अमेरिकी वैज्ञानिकों ने कोरोना की नई जांच विकसित की है। पेंसिल की नोंक में इस्तेमाल होने वाली ग्रेफाइट की मदद से मात्र 6.5 मिनट में कोविड की जांच की जा सकेगी। वैज्ञानिकों का दावा है कि कोरोना की नई जांच सस्ती होने के साथ तेज है और 100 फीसदी तक सटीक नतीजे देती है। कोविड की नई जांच विकसित करने वाली अमेरिका की पेंसिलवेनिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है कि वर्तमान में मौजूद कोरोना की ज्यादातर जांचें महंगी हैं। इसके लिए ट्रेन्ड प्रोफेशनल की जरूरत पड़ती है, लेकिन ग्रेफाइट से होने वाली जांच से इसकी कीमत 100 रुपए तक घटाई जा सकती है। इस जांच का नाम लीड (लो-कॉस्ट इलेक्ट्रोकेमिकल एडवांस्ड डायग्नोस्टिक) टेस्ट रखा गया है। ऐसे करते हैं जांचजांच के लिए ग्रेफाइड की छड़ी को इलेक्ट्रोड की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसे सलाइवा या नाक से लिए सैम्पल और ह्यूमन एंजियोटेंसिन कंवर्टिंग एंजाइम-2 के साथ ...
मांओं को अलर्ट करने वाली रिसर्च:डायबिटीज से जूझने वाली गर्भवती महिलाओं के बच्चों में नजर कमजोर होने का खतरा 39% तक ज्यादा; प्रेग्नेंसी के दौरान ब्लड शुगर कंट्रोल करें

मांओं को अलर्ट करने वाली रिसर्च:डायबिटीज से जूझने वाली गर्भवती महिलाओं के बच्चों में नजर कमजोर होने का खतरा 39% तक ज्यादा; प्रेग्नेंसी के दौरान ब्लड शुगर कंट्रोल करें

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डायबिटीज से जूझने वाली मांओं के बच्चों को भविष्य में 39 फीसदी तक नजर कमजोर होने का खतरा अधिक रहता है। ऐसे बच्चों की समय-समय पर आंखों की जांच करानी जरूरी है। यह दावा अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है। शोधकर्ताओं का कहना है, गर्भवती महिला में डायबिटीज का असर भविष्य में बच्चे में दिख सकता है। रिसर्च कितने बच्चों पर हुई, मां में डायबिटीज होने पर बच्चों में खतरा बढ़ता कैसे है, बच्चों में खतरे को कैसे कम करें, जानिए इन सवालों के जवाब... सबसे पहले जानिए, रिसर्च कैसे हुईअंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने डेनमार्क के 553 बच्चों पर स्टडी की। ये ऐसे बच्चे थे जिनकी मांओं को प्रेग्नेंसी से पहले टाइप-1 या टाइप-2 डायबिटीज थी। या फिर प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज हुई, जिसे वैज्ञानिक भाषा में जेस्टेशनल डायबिटीज कहते हैं। यह रिसर्च पूरी होने के बाद इन 553 बच्चों की तुलन...
इटेलियन शोधकर्ताओं का दावा:चॉकलेट और चीज सीमित मात्रा में लेते हैं तो हार्ट हेल्दी रहता है, हृदय रोगों का खतरा घटता है, जानिए इन्हें कितना खाएं

इटेलियन शोधकर्ताओं का दावा:चॉकलेट और चीज सीमित मात्रा में लेते हैं तो हार्ट हेल्दी रहता है, हृदय रोगों का खतरा घटता है, जानिए इन्हें कितना खाएं

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हार्ट को स्वस्थ रखने के लिए एक्सपर्ट एक्सरसाइज के साथ हेल्दी डाइट लेने की सलाह देते हैं। हालिया रिसर्च में वैज्ञानिकों ने हार्ट को हेल्दी रखने के लिए चॉकलेट, चीज और योगर्ट सीमित मात्रा खाने की सलाह दी है। यह दावा इटली की नेपल्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपनी रिसर्च में किया है। शोधकर्ताओं का कहना है, रोजाना 200 ग्राम डेयरी प्रोडक्ट लेते हैं तो इससे दिल को नुकसान नहीं पहुंचता। अगर आप चीज खाना पसंद करते हैं तो एक तिहाई कप चीज खा सकते हैं। 50 ग्राम चीज खाते हैं तो हार्ट हेल्दी रहता है। शोधकर्ताओं का कहना है, अगर चॉकलेट एक तय मात्रा में लेते हैं तो यह हृदय रोगों का खतरा कम करती है। 20 से 45 ग्राम तक चॉकलेट खाते हैं तो फायदा पहुंचता है। डार्क चॉकलेट में मौजूद फ्लेवेनॉल और एंटीऑक्सीडेंट्स हृदय को स्वस्थ रखते हैं। अब जानिए हार्ट को कैसे स्वस्थ रखें हृदय रोगों से बचाव के वो दो तरीके...
कोरोनाकाल में बच्चों में बढ़ रहा गैजेट्स का इस्तेमाल:रोजाना गैजेट्स पर 8 से 10 घंटे बिता रहे बच्चे, नतीजा; इनकी ब्रेन सेल्स डैमेज हो रहीं; बिहेवियर हिंसक हो रहा और नींद पूरी नहीं हो रही

कोरोनाकाल में बच्चों में बढ़ रहा गैजेट्स का इस्तेमाल:रोजाना गैजेट्स पर 8 से 10 घंटे बिता रहे बच्चे, नतीजा; इनकी ब्रेन सेल्स डैमेज हो रहीं; बिहेवियर हिंसक हो रहा और नींद पूरी नहीं हो रही

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बच्चों में गैजेट का बढ़ता इस्तेमाल उनके दिमाग पर बुरा असर छोड़ रहा है। एक्सपर्ट कहते हैं, कोरोनाकाल में बच्चे एक दिन में करीब 8-10 घंटे गैजेट्स के साथ बिता रहे हैं, नतीजा इनके दिमाग की ब्रेन सेल्स डैमेज हो रही हैं। मोटापा बढ़ रहा है। नींद नहीं पूरी हो रही। इनका बिहेवियर हिंसक हो रहा है। मुम्बई के मसीना हॉस्पिटल के कंसल्टेंट न्यूरोसर्जन डॉ. राज अगरबत्तीवाला कहते हैं, महामारी के कारण पेरेंट्स बच्चों को बाहर निकलने से तो बचा रहे हैं, लेकिन वो बच्चों को मोबाइल और टैबलेट खेलने के लिए दे रहे हैं। नतीजा, बच्चे घंटों उस पर समय बिता रहे हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिसर्च में भी हुई पुष्टिनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने 47 प्री-स्कूल ऐज वाले बच्चों पर रिसर्च की। ये 2 से 5 साल की उम्र वाले ऐसे बच्चे थे जिन्होंने अभी स्कूल जाना शुरू नहीं किया। ये गैजेट्स पर अधिक समय बिताते थे। इनके ब्र...
लॉन्ग कोविड की जांच:ब्लड टेस्ट से पता चल सकेगा कोरोना से रिकवरी के बाद मरीज को लॉन्ग कोविड होगा या नहीं, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की रिसर्च

लॉन्ग कोविड की जांच:ब्लड टेस्ट से पता चल सकेगा कोरोना से रिकवरी के बाद मरीज को लॉन्ग कोविड होगा या नहीं, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की रिसर्च

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कोरोना को मात देने वाले मरीजों को लॉन्ग कोविड होगा या नहीं, एक ब्लड टेस्ट के जरिए यह पता लगाया जा सकेगा। कोरोना से संक्रमित हुए दो तिहाई मरीजों में किसी न किसी रूप में लॉन्ग कोविड के लक्षण दिखते हैं। कुछ मामलों में मरीज कई महीनों तक बिस्तर से नहीं उठ पाता। इसे समझने के लिए इंग्लैंड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने लॉन्ग कोविड के मरीजों पर रिसर्च की है। ब्लड टेस्ट के जरिए कैसे लॉन्ग कोविड का पता लगाते हैं, इसके लक्षण क्या हैं और क्यों होता है लॉन्ग कोविड, जानिए इन सवालों के जवाब.... ब्लड टेस्ट से आखिर क्या पता लगाते हैं?रिसर्च के दौरान शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि संक्रमण के बाद ब्लड में एक खास तरह के प्रोटीन मॉलिक्यूल का निर्माण होता, इसे सायटोकाइंस कहते हैं। इसी से पता चलता है कि मरीज लॉन्ग कोविड से परेशान होगा या नहीं। आसान भाषा में समझें तो सायटोकाइंस कई महीनों तक मरीज के शरीर में स...
आयरलैंड के वैज्ञानिकों का दावा:खून के थक्के जमना हो सकती है लॉन्ग कोविड की वजह, शरीर में थकान महसूस होने पर इसकी जांच कराएं

आयरलैंड के वैज्ञानिकों का दावा:खून के थक्के जमना हो सकती है लॉन्ग कोविड की वजह, शरीर में थकान महसूस होने पर इसकी जांच कराएं

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मरीजों में लॉन्ग कोविड की बड़ी वजह खून के थक्के जमना है। यह दावा आयरलैंड के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में किया है। वैज्ञानिकों का कहना है, शरीर में थकान और फिजिकल फिटनेस में बदलाव होने पर मरीजों को जांच कराने की जरूरत है कि कहीं उनमें खून के थक्के तो नहीं जम रहे। रिसर्च करने वाली आयरलैंड की RCSI यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल एंड हेल्थ साइंस के शोधकर्ताओं का कहना है, हमने लॉन्ग कोविड से जूझ रहे 50 लोगों पर स्टडी की। रिसर्च करने का लक्ष्य यह पता लगाना था कि कहीं इसकी वजह ब्लड क्लॉटिंग तो नहीं। परिणाम के तौर पर सामने आया कि स्वस्थ लोगों के मुकाबले लॉन्ग कोविड के मरीजों में थक्कों के लिए जिम्मेदार क्लॉटिंग मार्कर बढ़े हुए थे। जो मरीज कोरोना के संक्रमण के बाद हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे उनमें ये क्लॉटिंग मार्कर और अधिक बढ़े हुए थे। क्या है लॉन्ग कोविड ? लॉन्ग कोविड की कोई मेडिकल परिभाषा नहीं...
आयरलैंड के वैज्ञानिकों का दावा:खून के थक्के जमना हो सकती है लॉन्ग कोविड की वजह, शरीर में थकान महसूस होने पर इसकी जांच कराएं

आयरलैंड के वैज्ञानिकों का दावा:खून के थक्के जमना हो सकती है लॉन्ग कोविड की वजह, शरीर में थकान महसूस होने पर इसकी जांच कराएं

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मरीजों में लॉन्ग कोविड की बड़ी वजह खून के थक्के जमना है। यह दावा आयरलैंड के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में किया है। वैज्ञानिकों का कहना है, शरीर में थकान और फिजिकल फिटनेस में बदलाव होने पर मरीजों को जांच कराने की जरूरत है कि कहीं उनमें खून के थक्के तो नहीं जम रहे। रिसर्च करने वाली आयरलैंड की RCSI यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल एंड हेल्थ साइंस के शोधकर्ताओं का कहना है, हमने लॉन्ग कोविड से जूझ रहे 50 लोगों पर स्टडी की। रिसर्च करने का लक्ष्य यह पता लगाना था कि कहीं इसकी वजह ब्लड क्लॉटिंग तो नहीं। परिणाम के तौर पर सामने आया कि स्वस्थ लोगों के मुकाबले लॉन्ग कोविड के मरीजों में थक्कों के लिए जिम्मेदार क्लॉटिंग मार्कर बढ़े हुए थे। जो मरीज कोरोना के संक्रमण के बाद हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे उनमें ये क्लॉटिंग मार्कर और अधिक बढ़े हुए थे। क्या है लॉन्ग कोविड ? लॉन्ग कोविड की कोई मेडिकल परिभाषा नहीं...