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लाइफस्टाइल

बढ़ती उम्र में हड्डियों की सेहत इसलिए जानना जरूरी:बुजुर्ग महिलाओं में कमजोर होती हड्डियों के कारण सोचने-समझने की क्षमता भी घटती है, जानिए बोन्स को कैसे मजबूत बनाएं

बढ़ती उम्र में हड्डियों की सेहत इसलिए जानना जरूरी:बुजुर्ग महिलाओं में कमजोर होती हड्डियों के कारण सोचने-समझने की क्षमता भी घटती है, जानिए बोन्स को कैसे मजबूत बनाएं

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बढ़ती उम्र में महिलाओं में सोचने-समझने की क्षमता घटने की एक वजह वैज्ञानिकों ने बताई है। वैज्ञानिकों का कहना है, हड्डियों को होने वाले नुकसान और फ्रैक्चर के बढ़ते खतरे के कारण ऐसा हो सकता है। गारवां इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च की स्टडी कहती है, 65 साल और इससे अधिक उम्र के लोगों में सोचने-समझने की क्षमता घटना और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ना, दो बड़े खतरे हैं। ये दोनों ही साइलेंट डिजीज हैं, यानी ये शरीर को इतने धीरे-धीरे जकड़ती है कि इंसान को पता नहीं चल पाता। हड्डियों की सेहत जांचना जरूरी16 साल तक चली रिसर्च कहती है कि बुजुर्गों में सोचने-समझने की क्षमता घटना और फ्रैक्चर होने का खतरा लम्बे समय तक बना रहता है। इसे समझ न पाने के कारण लोग इसका इलाज भी नहीं करा पाते। शोधकर्ता जैकलीन सेंटर के मुताबिक, बढ़ती उम्र में हड्डियों की सेहत से इंसान की सोचने-समझने की क्षमता को मॉनिटर किया जा सकता है। इस...
साउथ कोरियाई वैज्ञानिकों का प्रोटोटाइप:सांसों की दुर्गंध पता लगाने वाली डिवाइस, इस पर फूंकें और ऐप बताएगा दुर्गंध की समस्या है या नहीं; जानिए ऐसा होता क्यों है

साउथ कोरियाई वैज्ञानिकों का प्रोटोटाइप:सांसों की दुर्गंध पता लगाने वाली डिवाइस, इस पर फूंकें और ऐप बताएगा दुर्गंध की समस्या है या नहीं; जानिए ऐसा होता क्यों है

यात्रा, लाइफस्टाइल, साइंस
अब एक डिवाइस के मदद से यह पता लगाया जा सकेगा कि सांसों में दुर्गंध की समस्या है या नहीं। साउथ कोरिया के वैज्ञानिकों ने अंगूठे के आकार की ऐसी प्रोटोटाइप डिवाइस तैयार की है जो सांस से दुर्गंध आने पर तुरंत अलर्ट करती है। वैज्ञानिकों का कहना है, सांसों में दुर्गंध आना इस बात का इशारा है कि कई तरह की ओरल प्रॉब्लम हो सकती हैं। इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दुर्गंध का ऐसे पता लगाती है डिवाइसवैज्ञानिकों का कहना है, मुंह और सांस में गंध के लिए हाइड्रोजन सल्फाइड गैस जिम्मेदार होती है। जो इंसान में बनती है। दुर्गंध का पता लगाने के लिए इंसान को डिवाइस में फूंकना पड़ता है। इस दौरान सांसों के जरिए डिवाइस तक हाइड्रोजन सल्फाइड गैस पहुंचती है। डिवाइस इस गैस को पहचानकर इससे जुड़े ऐप पर नतीजे भेजती है। दुर्गंध की समस्या को हेलीटोसिस कहते हैंइसे तैयार करने वाले सैमगंस इलेक्ट्रॉनिक्स और कोरिया एडवा...
साउथ कोरियाई वैज्ञानिकों का प्रोटोटाइप:सांसों की दुर्गंध पता लगाने वाली डिवाइस, इस पर फूंकें और ऐप बताएगा दुर्गंध की समस्या है या नहीं; जानिए ऐसा होता क्यों है

साउथ कोरियाई वैज्ञानिकों का प्रोटोटाइप:सांसों की दुर्गंध पता लगाने वाली डिवाइस, इस पर फूंकें और ऐप बताएगा दुर्गंध की समस्या है या नहीं; जानिए ऐसा होता क्यों है

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अब एक डिवाइस के मदद से यह पता लगाया जा सकेगा कि सांसों में दुर्गंध की समस्या है या नहीं। साउथ कोरिया के वैज्ञानिकों ने अंगूठे के आकार की ऐसी प्रोटोटाइप डिवाइस तैयार की है जो सांस से दुर्गंध आने पर तुरंत अलर्ट करती है। वैज्ञानिकों का कहना है, सांसों में दुर्गंध आना इस बात का इशारा है कि कई तरह की ओरल प्रॉब्लम हो सकती हैं। इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दुर्गंध का ऐसे पता लगाती है डिवाइसवैज्ञानिकों का कहना है, मुंह और सांस में गंध के लिए हाइड्रोजन सल्फाइड गैस जिम्मेदार होती है। जो इंसान में बनती है। दुर्गंध का पता लगाने के लिए इंसान को डिवाइस में फूंकना पड़ता है। इस दौरान सांसों के जरिए डिवाइस तक हाइड्रोजन सल्फाइड गैस पहुंचती है। डिवाइस इस गैस को पहचानकर इससे जुड़े ऐप पर नतीजे भेजती है। दुर्गंध की समस्या को हेलीटोसिस कहते हैंइसे तैयार करने वाले सैमगंस इलेक्ट्रॉनिक्स और कोरिया एडवा...
22 हजार फीट ऊंचाई पर मिले वायरस:तिब्बत के ग्लेशियर पर 15 हजार साल पुरानी बर्फ में 28 ऐसे नए वायरस मिले जिससे वैज्ञानिक भी अंजान; बोले, ये बुरी स्थिति में जिंदा रह सकते हैं

22 हजार फीट ऊंचाई पर मिले वायरस:तिब्बत के ग्लेशियर पर 15 हजार साल पुरानी बर्फ में 28 ऐसे नए वायरस मिले जिससे वैज्ञानिक भी अंजान; बोले, ये बुरी स्थिति में जिंदा रह सकते हैं

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तिब्बत के ग्लेशियर में 15 हजार साल पुरानी बर्फ में 33 वायरस मिले हैं। इनमें से 28 ऐसे नए वायरस हैं जिनके बारे में वैज्ञानिकों के पास भी जानकारी नहीं है। रिसर्च करने वाली अमेरिका की स्टेट ओहियो यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है, जिस बर्फ में वायरस मिले हैं वो 15 हजार साल पहले बनी थी। यह बर्फ पश्चिम कुनलुन शान के गुलिया आइस कैप से ली गई थी, जो तिब्बती पठार में हैं। इन वायरस की जांच करने के बाद वैज्ञानिकों ने बताया है कि ये मिट्टी या पौधे में पाए जाते हैं। वायरस की खोज करने वाली टीम का कहना है, वैज्ञानिकों की मदद से यह जानने की कोशिश की जाएगी कि ये वायरस इतनी शताब्दियों तक कैसे जिंदा रहे। ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के रिसर्चर झी-पिंग झॉन्ग का कहना है, यह रिसर्च माइक्रोबायोलॉजिस्ट और पुराजलवायु विशेषज्ञों ने मिलकर की है। ऐसे बर्फ में पहुंचे वायरस रिसर्चर झॉन्ग का कहना है, गुलिया आ...
एवैस्कुलर नेक्रोसिस की केस स्टडी:कोरोना को हराने के बाद कूल्हे-घुटने के जोड़ों में दर्द के कारण 22 वर्षीय महिला का चलना हुआ मुश्किल, निमोनिया में लिए गए स्टेरॉयड के कारण ऐसा हुआ

एवैस्कुलर नेक्रोसिस की केस स्टडी:कोरोना को हराने के बाद कूल्हे-घुटने के जोड़ों में दर्द के कारण 22 वर्षीय महिला का चलना हुआ मुश्किल, निमोनिया में लिए गए स्टेरॉयड के कारण ऐसा हुआ

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महाराष्ट्र में अब तक एवैस्कुलर नेक्रोसिस के कई मामले सामने आ चुके हैं। इसमे एक मामला ऐसा भी आया है जिसमें कोरोना से ठीक होने के बाद 22 साल की मरीज को एवैस्कुलर नेक्रोसिस से जूझ रही था। इलाज करने वाले एचसीएमसीटी मणिपाल हॉस्पिटल का कहना है, मरीज जब यहां लाई गई तो हालत काफी खराब हो चुकी थी। उसके घुटने और कूल्हे के 2-2 जोड़ों में एवैस्कुलर नेक्रोसिस हो चुका था। चारों जोड़ों में दिक्कत होने के कारण वह चल फिर नहीं सकती थी। क्या है एवैस्कुलर नेक्रोसिस (AVN)यह ऐसी स्थिति जब खून की सप्लाई बंद होने से हड्डियों के उतक डेड होने शुरू हो जाते हैं। इसकी वजह स्टेरायड हैं, जो कोविड के कारण हुए निमोनिया के इलाज के दौरान लिए जाते हैँ। कई रिसर्च में दावा किया गया है कि ऐसी स्थिति में एवैस्कुलर नेक्रोसिस का खतरा बढ़ जाता है। एवैस्कुलर नेक्रोसिस होने के बाद जोड़ों में दर्द शुरू होने के कारण मरीज चलफिर नही...
पेनकिलर्स का विकल्प तैयार करने की कोशिश:वैज्ञानिकों ने दर्द दूर करने वाला हेडसेट बनाया, इसे सिर में पहनने के बाद मरीज ऐप के जरिए दर्द कंट्रोल कर सकेगा; ट्रायल में हुई पुष्टि

पेनकिलर्स का विकल्प तैयार करने की कोशिश:वैज्ञानिकों ने दर्द दूर करने वाला हेडसेट बनाया, इसे सिर में पहनने के बाद मरीज ऐप के जरिए दर्द कंट्रोल कर सकेगा; ट्रायल में हुई पुष्टि

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वैज्ञानिकों ने दर्द को घटाने वाला हेडसेट तैयार किया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इसे 8 हफ्तों तक पहनने के बाद नींद, मूड और क्वालिटी ऑफ लाइफ पहले से बेहतर हुई है। बेचैनी और डिप्रेशन में भी कमी आई है। रिसर्च कहती है, दर्द को घटाने के लिए फिजियोथैरेपी और पेनकिलर्स का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन यह हर मरीज के लिए असरदार नहीं साबित होतीं। कुछ मामलों में साइड इफेक्ट और कुछ मामलों में इसकी आदत भी हो जाती है। ऐसे काम करता है हेडसेट, 3 पॉइंट में समझें रिसर्चर्स कहते हैं, एक छोटे ट्रायल में यह सामने आया है कि इस डिवाइस को सिर में पहनने के बाद दर्द में कमी आती है। दरअसल, यह हेडसेट मस्तिष्क की ब्रेनवेव्स को पढ़ता है। फिर ब्रेन को दर्द से निपटने के लिए तैयार करता है। इस तरह लक्षण में कमी आती है।यह हेडसेट इलेक्ट्रो-एनसिफेलोग्राम (ईईजी) तकनीक की मदद से काम करता है। हेडसेट में लगे 8 इलेक्ट्रोड स...
कब तक रहती हैं एंटीबॉडीज:कोरोना का संक्रमण होने के 9 महीने बाद भी शरीर में रहती हैं एंटीबॉडीज, लक्षण और बिना लक्षण वाले मरीजों में इसका एक जैसा स्तर रहा

कब तक रहती हैं एंटीबॉडीज:कोरोना का संक्रमण होने के 9 महीने बाद भी शरीर में रहती हैं एंटीबॉडीज, लक्षण और बिना लक्षण वाले मरीजों में इसका एक जैसा स्तर रहा

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कोरोना का एक बार संक्रमण होने के बाद एंटीबॉडीज शरीर में कितने दिनों तक रहती हैं, यह सवाल हमेशा से चर्चा में रहा है। हालिया रिसर्च में वैज्ञानिकों ने इसका जवाब दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है, संक्रमण के 9 महीने बाद तक शरीर में एंटीबॉडी का लेवल हाई रहता है। चाहें मरीज में संक्रमण के बाद लक्षण दिखे हों या मरीज एसिम्प्टोमैटिक रहा हो। यह दावा इटली की पडुआ यूनिवर्सिटी और लंदन के इम्पीरियल कॉलेज मिलकर की है। 98.8 फीसदी मरीजों में मिली एंटीबॉडीजपिछले साल फरवरी और मार्च में इटली शहर में 3 हजार कोरोना पीड़ितों के डाटा की एनालिसिस की गई। इनमें से 85 फीसदी मरीजों की जांच की गई। मई और नवम्बर 2020 में एक बार फिर मरीजों में जांच करके एंटीबॉडीज का स्तर देखा गया। जांच में सामने आया कि जो फरवरी और मार्च में संक्रमित हुए थे उनमें से 98.8 फीसदी मरीजों में नवम्बर में भी एंटीबॉडीज पाई गईं। लक्षण और बिना ...
स्पेस वेडिंग का सपना होगा सच:अमेरिकी कंपनी ने बनाया स्पेस बैलून, एक लाख फीट ऊंचाई पर शादी कर सकेंगे; 93 लाख रुपए में होगी एक ट्रिप

स्पेस वेडिंग का सपना होगा सच:अमेरिकी कंपनी ने बनाया स्पेस बैलून, एक लाख फीट ऊंचाई पर शादी कर सकेंगे; 93 लाख रुपए में होगी एक ट्रिप

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अब स्पेस वेडिंग का सपना भी सच हो सकेगा। स्पेस बैलून में बैठकर 1 लाख फीट की ऊंचाई पर शादी की जा सकेगी। फ्लोरिडा की कंपनी स्पेस पर्सपेक्टिव ने खास तरह का स्पेस बैलून तैयार किया है। इसका आकार एक फुटबॉल स्टेडियम के बराबर है। एक बार स्पेस बैलून से सफर करने के लिए 93 लाख रुपए देने होंगे। यह यात्रा 2024 से यात्रा की जा सकेगी। बैलून को 30 किलोमीटर ऊंचाई तक पहुंचने में 2 घंटे लगते हैं। वापसी के दौरान इसे पानी में उतारा जाएगा। एक साथ 8 लोगों को ले जाएगाकंपनी का दावा है, कई लोगों ने इस सफर के लिए बुकिंग भी करा दी है। वहीं, कुछ लोगों ने वेडिंग के लिए इसे चुना है। स्पेस बैलून एक बार में 8 लोगों को लेकर जाएगा। यह सफर 6 घंटों का होगा। इसके लिए एडवांस बुकिंग जून के अंतिम सप्ताह से शुरू की जा चुकी है। कंपनी के मुताबिक, कॉर्पोरेट इवेंट और बर्थडे जैसे सेलिब्रेशन के लिए भी इसे बुक किया जा सकता है। ...
4500 किलो का स्टील ब्रिज:एम्सटर्डम में बना दुनिया का पहला 3डी प्रिंटेड स्टीज ब्रिज, इसे 4 रोबोट्स ने मिलकर तैयार किया; जानिए क्या है यह तकनीक

4500 किलो का स्टील ब्रिज:एम्सटर्डम में बना दुनिया का पहला 3डी प्रिंटेड स्टीज ब्रिज, इसे 4 रोबोट्स ने मिलकर तैयार किया; जानिए क्या है यह तकनीक

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नीदरलैंड्स की राजधानी एम्सटर्डम में दुनिया का पहला 3डी प्रिंटेड स्टील ब्रिज बनाया गया है। इसकी डिजाइन से लेकर तैयार करने तक का काम रोबोट ने किया है। इसे 4500 किलो स्टील से तैयार किया गया है और एम्सटर्डम की सबसे पुरानी नहर पर लगाया गया है। ब्रिज को तैयार करने वाली नीदरलैंड्स की कम्पनी MX3D का कहना है, 15 जुलाई को इसका उद्घाटन किया गया था और 18 जुलाई से इसे आम लोगों के लिए खोल दिया गया। जानिए क्या है 3डी प्रिंटिंग तकनीक और यह ब्रिज क्यों खास है... 4 रोबोट्स ने बनाया 12 मीटर लम्बा ब्रिज12 मीटर लम्बे इस ब्रिज को 4 रोबोट्स ने मिलकर तैयार किया है। इसे तैयार होने में करीब 6 महीने का वक्त लगा है और इसके बाद ब्रिज को नाव की मदद से लाया गया। फिर क्रेन से इसे नहर पर रखकर फिट किया गया। इसे तैयार करने वाली कम्पनी का कहना है, ब्रिज से जुड़ा सभी डाटा कम्प्यूटर में फीड किया जाएगा, ताकि अगली ब...
डायबिटीज के कॉम्प्लिकेशंस घटाने वाली दवा:डिप्रेशन में दी जाने वाली एंटीडिप्रेसेंट दवा डायबिटीज के कारण बढ़ने वाला मौत का खतरा घटा सकती है, ताइवान के वैज्ञानिकों की रिसर्च

डायबिटीज के कॉम्प्लिकेशंस घटाने वाली दवा:डिप्रेशन में दी जाने वाली एंटीडिप्रेसेंट दवा डायबिटीज के कारण बढ़ने वाला मौत का खतरा घटा सकती है, ताइवान के वैज्ञानिकों की रिसर्च

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डिप्रेशन को खत्म करने वाली एंटीडिप्रेसेंट दवाएं डायबिटीज के गंभीर होने का खतरा भी कम करती हैं। नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने कहा है कि ऐसे लोग जो डायबिटीज और डिप्रेशन से जूझ रहे हैं उनमें ये दवाएं हालत बिगड़ने से बचा सकती हैं। ये दवाएं डायबिटीज के कारण बढ़ने वाले मौत के खतरे को कम कर सकती हैं। यह दावा ताइवान के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में किया है। डायबिटीज के मरीजों में डिप्रेशन का खतरा एंडोक्राइन सोसायटी के जर्नल क्लीनिकल एंडोक्राइनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में पब्लिश रिसर्च कहती है, डायबिटीज के मरीजों में डिप्रेशन होने का खतरा रहता है। इस वजह से मरीजों में डायबिटीज के कॉम्प्लीकेशन बढ़ने की आशंका भी बनी रहती है। जैसे- किडनी की बीमारी, स्ट्रोक, आंख और पैरों से जुड़ी समस्या का खतरा बना रहता है। डायबिटीज के मरीजों में डिप्रेशन होने पर ये एक्सरसाइज से दूरी बनाने लगते हैं। शरीर के वजन म...