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कैंसर का नया ब्लड टेस्ट ‘गेलेरी’:लक्षण दिखने से पहले 50 से अधिक तरह के कैंसर की जानकारी देने वाले टेस्ट का ट्रायल शुरू, ट्यूमर किस हिस्से में है यह भी बताएगा; जानिए इसके बारे में

कैंसर का नया ब्लड टेस्ट ‘गेलेरी’:लक्षण दिखने से पहले 50 से अधिक तरह के कैंसर की जानकारी देने वाले टेस्ट का ट्रायल शुरू, ट्यूमर किस हिस्से में है यह भी बताएगा; जानिए इसके बारे में

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अब लक्षण दिखने से पहले ही एक ब्लड टेस्ट से 50 से अधिक तरह के कैंसर का पता चल सकेगा। ब्रिटेन की स्वास्थ्य एजेंसी नेशनल हेल्थ सर्विस ने सोमवार से इस टेस्ट के लिए ट्रायल की शुरुआत की। इस जांच का नाम गेलेरी टेस्ट रखा गया है। इस टेस्ट को हेल्थकेयर कंपनी ग्रेल ने विकसित किया है। यह जांच कितनी कारगर इसे समझने के लिए इंग्लैंड के 8 क्षेत्रों में 1,40,000 लोगों पर ट्रायल शुरू किया गया है। यह अपनी तरह का पहला ऐसा ट्रायल है। यह ट्रायल नेशनल हेल्थ सर्विस कैंसर रिसर्च यूके और किंग्स कॉलेज लंदन के साथ मिलकर किया जा रहा है। शरीर किस हिस्से में है कैंसर, पता चलेगाग्रेल यूरोप के प्रेसिडेंट सर हरपाल कुमार कहते हैं, गेलेरी टेस्ट कैंसर की जानकारी देने के साथ कैंसर शरीर के किस हिस्से में है, यह भी पता चलता है। यह खतरनाक कैंसर का भी पता लगाता है और इस टेस्ट की रिपोर्ट गलत आने की आशंका कम है। हम नेशनल हेल्थ...
अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी CDC की रिपोर्ट:वैक्सीन न लगवाने वालों में कोविड से मौत का खतरा 10 गुना तक ज्यादा, टीके के असर को जांचने वाली इन 3 रिसर्च रिपोर्ट से समझें उनका असर

अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी CDC की रिपोर्ट:वैक्सीन न लगवाने वालों में कोविड से मौत का खतरा 10 गुना तक ज्यादा, टीके के असर को जांचने वाली इन 3 रिसर्च रिपोर्ट से समझें उनका असर

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जिन लोगों ने कोरोना की वैक्सीन नहीं लगवाई है उन्हें कोविड होने पर मौत का खतरा 10 गुना तक ज्यादा है। अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी सीडीसी ने अपनी वीकली रिपोर्ट में यह दावा किया है। सीडीसी ने तीन स्टडीज के जरिए यह जोर दिया है कि कोरोना से होने वाली मौतों को रोकना है तो कोविड की वैक्सीन लगवाना जरूरी है। सीडीसी ने अपनी वीकली रिपोर्ट 'मॉर्बेलिटी एंड मॉर्टेलिटी' में वैक्सीन के असर को बताने वाली तीन अलग-अलग रिसर्च शामिल की हैं, जानिए इनके बारे में... पहली रिसर्च: अमेरिका के 13 राज्यों में 6 लाख लोगों को शामिल कियावर्तमान में मौजूद कोविड की सभी वैक्सीन हॉस्पिटल में भर्ती होने और मौत का खतरा घटाती हैं। डेल्टा के मामले में भी। इसे समझने के लिए सीडीसी ने कोविड के 6 लाख मामलों का अध्ययन किया। इसमें वैक्सीन लेने के बाद 18 साल या इससे अधिक उम्र के हॉस्पिटल में भर्ती होने वाले मरीज और कोरोना के मरने वाल...
लॉन्ग कोविड का एक खतरा यह भी:आईसीयू में भर्ती हुए कोविड के मरीजों में किडनी फेल होने का खतरा अधिक, 90% मरीज समझ नहीं पाते वे बीमारी से जूझ रहे या नहीं

लॉन्ग कोविड का एक खतरा यह भी:आईसीयू में भर्ती हुए कोविड के मरीजों में किडनी फेल होने का खतरा अधिक, 90% मरीज समझ नहीं पाते वे बीमारी से जूझ रहे या नहीं

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कोरोना से रिकवर होने वाले मरीजों में किडनी बुरी तरह डैमेज हो रही हैं और मरीजों को कोई लक्षण नहीं दिखाई दे रहे हैं। यह दावा अमेरिका की वाशिंगटन यूनिवर्सिटी की रिसर्च में किया गया है। रिसर्च कहती है, कोरोना के वो मरीज जो हॉस्पिटल में भर्ती हुए या जिनमें हल्के लक्षण दिखे थे उनमें किडनी डैमेज (एंड स्टेज किडनी डिजीज) होने का खतरा है। 1 सितम्बर को अमेरिकन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी में पब्लिश रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना से रिकवर होने वाले जिन मरीजों को धमनियों से जुड़ी समस्या हुई। हॉस्पिटल में भर्ती होने के बाद उनमें किडनी की बीमारी शुरू हुई। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता जियाद अल-अली कहते हैं, संक्रमण के बाद आईसीयू में भर्ती होने वाले मरीजों में किडनी के फेल होने का खतरा अधिक है। मरीजों के आंकड़ों पर रिसर्च कीसेंट लुइस हेल्थ केयर सिस्टम और वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अमेरिका में फे...
लॉन्ग कोविड का एक खतरा यह भी:आईसीयू में भर्ती हुए कोविड के मरीजों में किडनी फेल होने का खतरा अधिक, 90% मरीज समझ नहीं पाते वे बीमारी से जूझ रहे या नहीं

लॉन्ग कोविड का एक खतरा यह भी:आईसीयू में भर्ती हुए कोविड के मरीजों में किडनी फेल होने का खतरा अधिक, 90% मरीज समझ नहीं पाते वे बीमारी से जूझ रहे या नहीं

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कोरोना से रिकवर होने वाले मरीजों में किडनी बुरी तरह डैमेज हो रही हैं और मरीजों को कोई लक्षण नहीं दिखाई दे रहे हैं। यह दावा अमेरिका की वाशिंगटन यूनिवर्सिटी की रिसर्च में किया गया है। रिसर्च कहती है, कोरोना के वो मरीज जो हॉस्पिटल में भर्ती हुए या जिनमें हल्के लक्षण दिखे थे उनमें किडनी डैमेज (एंड स्टेज किडनी डिजीज) होने का खतरा है। 1 सितम्बर को अमेरिकन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी में पब्लिश रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना से रिकवर होने वाले जिन मरीजों को धमनियों से जुड़ी समस्या हुई। हॉस्पिटल में भर्ती होने के बाद उनमें किडनी की बीमारी शुरू हुई। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता जियाद अल-अली कहते हैं, संक्रमण के बाद आईसीयू में भर्ती होने वाले मरीजों में किडनी के फेल होने का खतरा अधिक है। मरीजों के आंकड़ों पर रिसर्च कीसेंट लुइस हेल्थ केयर सिस्टम और वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अमेरिका में फे...
मूंगफली और दिल के रोगों का कनेक्शन:एशियाई लोगों में मूंगफली दिल की बीमारियों का खतरा घटाती है, हफ्ते में 5 दिन बिना नमक वाली मूंगफली खाने से रिस्क कम होता है

मूंगफली और दिल के रोगों का कनेक्शन:एशियाई लोगों में मूंगफली दिल की बीमारियों का खतरा घटाती है, हफ्ते में 5 दिन बिना नमक वाली मूंगफली खाने से रिस्क कम होता है

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मूंगफली खाने वाले एशियाई लोगों में दिल की बीमारियों का खतरा कम रहता है। यह दावा जापान की ओसाका यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है। रिसर्च कहती है, जापान में रहने वाले जिन एशियाई महिला और पुरुषों ने रोजाना औसतन 4-5 मूंगफली खाई उनमें इस्केमिक स्ट्रोक और दिल की बीमारियों का खतरा कम हो गया है। स्ट्रोक जर्नल में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक, जो लोग मूंगफली खाते हैं उनमें ऐसी बीमारियों के मामले कितने सामने आते हैं, इसे मॉनिटर किया गया। शोधकर्ता सतोयो केहारा कहती हैं, पहली बार एशियाई लोगों में यह देखा गया है कि जो ज्यादा मूंगफली खाते हैं उनमें इस्केमिक स्ट्रोक का खतरा घटता है। हमारी रिसर्च बताती है, मूंगफली को डाइट में शामिल करना फायदेमंद रहता है। ऐसे हुई रिसर्चलोग कितने समय में कितनी मूंगफली खाते हैं जिससे दिल की बीमारियों का खतरा घट सके, यह पता लगाने के लिए दो चरणों म...
वॉशेबल मास्क कितना बेहतर:धोकर पहने जाने वाले कॉटन के दो लेयर वाले मास्क साल भर बाद भी कोरोना के कणों से बचाते हैं, कोलोराडो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का दावा

वॉशेबल मास्क कितना बेहतर:धोकर पहने जाने वाले कॉटन के दो लेयर वाले मास्क साल भर बाद भी कोरोना के कणों से बचाते हैं, कोलोराडो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का दावा

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ऐसे मास्क जो धुलकर पहने जा सकते हैं वो सालभर बाद भी कोरोना के कणों को इंसान तक पहुंचने से रोकते हैं। कॉटन के बने दो लेयर वाले मास्क को एक साल बाद रिप्लेस करने की जरूरत नहीं है। यह दावा ऐरोसॉल एंड एयर क्वालिटी रिसर्च जर्नल में पब्लिश रिसर्च में किया गया है। रिसर्च के मुताबिक, कॉटन का मास्क अगर चेहरे की नाक और मुंह को अच्छी तरह से कवर कर रहा है तो यह कपड़े के मुकाबले कई गुना अधिक सुरक्षा देता है। इसलिए हुई रिसर्चरिसर्च करने वाली कोलोराडो यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता मेरिना वेंस कहती हैं, महामारी की शुरुआत से अब तक रोजाना करीब 7200 टन मेडिकल वेस्ट निकल रहा है। इसमें डिस्पोजेबल मास्क की संख्या ज्यादा है। यह पर्यावरण के लिए खतरा बन रहे हैं। इस खतरे को कम करने के लिए यह रिसर्च की गई कि धोकर सुखाने के बाद मास्क कितनी सुरक्षा देते हैं। टेस्टिंग के लिए मास्क को एक स्टील की नली पर लगाया गया। इसके ब...
तस्वीरों में ऑस्ट्रेलिया की नकलची चिड़िया:इंसानों की तरह नकल करने वाली चिड़िया ‘लायरबर्ड’, यह बच्चों के रोने की आवाज ऐसे निकालती है कि कोई भी हो जाए हैरान

तस्वीरों में ऑस्ट्रेलिया की नकलची चिड़िया:इंसानों की तरह नकल करने वाली चिड़िया ‘लायरबर्ड’, यह बच्चों के रोने की आवाज ऐसे निकालती है कि कोई भी हो जाए हैरान

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किसी सुनसान जंगल से गुजरते वक्त बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दे तो चौंकना लाजमी है। लेकिन यह काम एक चिड़िया भी कर सकती है। ऑस्ट्रेलिया के सिडनी स्थित तारोंगा जू में एक ऐसी ही चिड़िया देखी गई है जो इंसानों की नकल करती है। यह हूबहू बच्चे की आवाज में रोने की नकल करती है। इसे लायरबर्ड इको कहते हैं। इंसानी आवाज की नकल करने के कारण इसे नकलची चिड़िया भी कहा जाता है। कार के इंजन की आवाज भी निकाल सकती है ऑस्ट्रेलिया के तारोंगा चिड़ियाघर ने लायरबर्ड का एक वीडियो ट्विटर पर शेयर किया है। ऑस्ट्रेलियन म्यूजियम के मुताबिक, लायरबर्ड आवाजों की नकल करने में एक्सपर्ट होती है। यह आसपास लकड़ी काटने वाली मशीन, कार का इंजन, जानवरों की आवाज की भी नकल कर सकती है। प्रजनन से पहले भी निकालते हैं आवाज चिड़ियाघर प्रशासन का कहना है, कभी-कभी ये ऐसी आवाजें निकालती है कि यहां के कर्मचारी घबरा जाते हैं। नेशनल...
गर्म हो रही धरती, बदल रहे जानवर:जलवायु परिवर्तन के असर से बचने के लिए चिड़ियों की चोंच, पंख और स्तनधारियों के कान का आकार बढ़ रहा; जानिए जानवरों में कितना हो रहा बदलाव

गर्म हो रही धरती, बदल रहे जानवर:जलवायु परिवर्तन के असर से बचने के लिए चिड़ियों की चोंच, पंख और स्तनधारियों के कान का आकार बढ़ रहा; जानिए जानवरों में कितना हो रहा बदलाव

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जलवायु परिवर्तन का जैसे-जैसे असर बढ़ रहा है, धरती की गर्मी बढ़ रही है। इसका असर जानवरों पर भी पड़ रहा है। बढ़ते तापमान के असर से निपटने के लिए जानवर और पक्षी अपने अंदर कुछ बदलाव ला रहे हैं। जैसे- चिड़ियों की चोंच बढ़ रही है। स्तनधारियों के कान बड़े हो रहे हैं ताकि ये इन्हें हिलाकर शरीर की अतिरिक्त गर्मी को कम कर सकें। जानवरों के आकार में 10 फीसदी तक बढ़ोतरी हुईजलवायु परिवर्तन का जीवों का क्या असर पड़ रहा है, इस पर रिसर्च करने वाली ऑस्ट्रेलिया की डेकिन यूनिवर्सिटी का कहना है, अब तक हुई रिसर्च में यह साबित हो चुका है कि जलवायु परिवर्तन के कारण जानवर अपना आकार बदल रहे हैं। इनके शरीर के किसी न किसी हिस्से में 10 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। शोधकर्ता सारा रायडिंग कहती हैं, काफी समय से चर्चा की जा रही है कि क्या इंसान जलवायु परिवर्तन से उबर पाएगा, क्या कोई तकनीक इसका समाधान कर सकती है? इसका अस...
वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे आज:दुनियाभर में हर साल 7 लाख से अधिक लोग सुसाइड करते हैं, बड़ी वजह है अल्कोहल और डिप्रेशन; WHO और एक्सपर्ट से जानिए इसे कैसे कंट्रोल करें

वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे आज:दुनियाभर में हर साल 7 लाख से अधिक लोग सुसाइड करते हैं, बड़ी वजह है अल्कोहल और डिप्रेशन; WHO और एक्सपर्ट से जानिए इसे कैसे कंट्रोल करें

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15 से 19 साल युवाओं में मौत का चौथा सबसे बड़ा कारण आत्महत्या है। दुनियाभर में हर साल 7 लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं। इसमें से 77 फीसदी मामले निम्न और मध्यम आय वाले देशों से सामने आते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) कहता है, ज्यादातर लोग कीटनाशक पीकर, फांसी लगाकर और खुद को गोली मारकर सुसाइड करते हैं। ऐसे मामलों को कंट्रोल किया जा सकता है। आज वर्ल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और सीनियर कंसल्टेंट सायकियाट्रिस्ट डॉ. संतोष बांगड़ बता रहे हैं, आत्महत्या के मामलों को कैसे रोका जा सकते हैं... लोग क्यों कर रहे आत्महत्या: शरीर में पुराना दर्द भी इसकी वजहWHO के मुताबिक, आत्महत्या के बड़े कारणों में डिप्रेशन और अल्कोहल का इस्तेमाल करना है। आर्थिक तंगी, रिलेशनिशप का टूटना और बीमारियां की इसकी वजह बन सकती हैं। कैसे रोक सकते हैं आत्महत्या के मामले मुम्बई के ग्लोबल ...
अमेरिकी वैज्ञानिकों ने विकसित की नई तरह की ऐप:छींक की आवाज सुनकर ऐप बताएगा इंसान किस बीमारी से जूझ रहा है, दावा; घर बैठे डॉक्टर से भी ज्यादा सटीक जानकारी देगा

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने विकसित की नई तरह की ऐप:छींक की आवाज सुनकर ऐप बताएगा इंसान किस बीमारी से जूझ रहा है, दावा; घर बैठे डॉक्टर से भी ज्यादा सटीक जानकारी देगा

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अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ऐसी ऐप तैयार की है जो इंसान की छींक की आवाज सुनकर बताएगा कि वो किस बीमारी से जूझ रहा है। इसे अमेरिका की कम्पनी हाइफी इंक ने विकसित किया है। ऐप सटीक नतीजे बात सके, इसके लिए इसमें अलग-अलग तरह की बीमारियों में आने वाली खांसी की लाखों आवाजें शामिल की गईं ये आवाजें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से बताती हैं कि मरीज को क्या परेशानी हो सकती है। भविष्य में अस्थमा, निमोनिया या कोरोना जैसी बीमारी होने पर पता चल सकेगा कि इंसान कितनी गंभीर स्थिति में है। ऐप पर ऐसे मिलेंगे सटीक नतीजेऐप को तैयार करने वाली कम्पनी के चीफ मेडिकल ऑफिसर और टीबी एक्सपर्ट डॉ. पीटर स्माल का कहना है, अलग-अलग बीमारियों में खांसने की आवाज भी बदल जाती है। जैसे, कोई अस्थमा से जूझ रह है तो उसकी सांस और खांसी में एक तरह की घरघराहट होती है। वहीं, निमोनिया के मरीजों में फेफड़ों से अलग तरह की आवाज आती है। ...