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लॉन्ग कोविड की जांच:ब्लड टेस्ट से पता चल सकेगा कोरोना से रिकवरी के बाद मरीज को लॉन्ग कोविड होगा या नहीं, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की रिसर्च

लॉन्ग कोविड की जांच:ब्लड टेस्ट से पता चल सकेगा कोरोना से रिकवरी के बाद मरीज को लॉन्ग कोविड होगा या नहीं, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की रिसर्च

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कोरोना को मात देने वाले मरीजों को लॉन्ग कोविड होगा या नहीं, एक ब्लड टेस्ट के जरिए यह पता लगाया जा सकेगा। कोरोना से संक्रमित हुए दो तिहाई मरीजों में किसी न किसी रूप में लॉन्ग कोविड के लक्षण दिखते हैं। कुछ मामलों में मरीज कई महीनों तक बिस्तर से नहीं उठ पाता। इसे समझने के लिए इंग्लैंड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने लॉन्ग कोविड के मरीजों पर रिसर्च की है। ब्लड टेस्ट के जरिए कैसे लॉन्ग कोविड का पता लगाते हैं, इसके लक्षण क्या हैं और क्यों होता है लॉन्ग कोविड, जानिए इन सवालों के जवाब.... ब्लड टेस्ट से आखिर क्या पता लगाते हैं?रिसर्च के दौरान शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि संक्रमण के बाद ब्लड में एक खास तरह के प्रोटीन मॉलिक्यूल का निर्माण होता, इसे सायटोकाइंस कहते हैं। इसी से पता चलता है कि मरीज लॉन्ग कोविड से परेशान होगा या नहीं। आसान भाषा में समझें तो सायटोकाइंस कई महीनों तक मरीज के शरीर में स...
आयरलैंड के वैज्ञानिकों का दावा:खून के थक्के जमना हो सकती है लॉन्ग कोविड की वजह, शरीर में थकान महसूस होने पर इसकी जांच कराएं

आयरलैंड के वैज्ञानिकों का दावा:खून के थक्के जमना हो सकती है लॉन्ग कोविड की वजह, शरीर में थकान महसूस होने पर इसकी जांच कराएं

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मरीजों में लॉन्ग कोविड की बड़ी वजह खून के थक्के जमना है। यह दावा आयरलैंड के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में किया है। वैज्ञानिकों का कहना है, शरीर में थकान और फिजिकल फिटनेस में बदलाव होने पर मरीजों को जांच कराने की जरूरत है कि कहीं उनमें खून के थक्के तो नहीं जम रहे। रिसर्च करने वाली आयरलैंड की RCSI यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल एंड हेल्थ साइंस के शोधकर्ताओं का कहना है, हमने लॉन्ग कोविड से जूझ रहे 50 लोगों पर स्टडी की। रिसर्च करने का लक्ष्य यह पता लगाना था कि कहीं इसकी वजह ब्लड क्लॉटिंग तो नहीं। परिणाम के तौर पर सामने आया कि स्वस्थ लोगों के मुकाबले लॉन्ग कोविड के मरीजों में थक्कों के लिए जिम्मेदार क्लॉटिंग मार्कर बढ़े हुए थे। जो मरीज कोरोना के संक्रमण के बाद हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे उनमें ये क्लॉटिंग मार्कर और अधिक बढ़े हुए थे। क्या है लॉन्ग कोविड ? लॉन्ग कोविड की कोई मेडिकल परिभाषा नहीं...
आयरलैंड के वैज्ञानिकों का दावा:खून के थक्के जमना हो सकती है लॉन्ग कोविड की वजह, शरीर में थकान महसूस होने पर इसकी जांच कराएं

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मरीजों में लॉन्ग कोविड की बड़ी वजह खून के थक्के जमना है। यह दावा आयरलैंड के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में किया है। वैज्ञानिकों का कहना है, शरीर में थकान और फिजिकल फिटनेस में बदलाव होने पर मरीजों को जांच कराने की जरूरत है कि कहीं उनमें खून के थक्के तो नहीं जम रहे। रिसर्च करने वाली आयरलैंड की RCSI यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल एंड हेल्थ साइंस के शोधकर्ताओं का कहना है, हमने लॉन्ग कोविड से जूझ रहे 50 लोगों पर स्टडी की। रिसर्च करने का लक्ष्य यह पता लगाना था कि कहीं इसकी वजह ब्लड क्लॉटिंग तो नहीं। परिणाम के तौर पर सामने आया कि स्वस्थ लोगों के मुकाबले लॉन्ग कोविड के मरीजों में थक्कों के लिए जिम्मेदार क्लॉटिंग मार्कर बढ़े हुए थे। जो मरीज कोरोना के संक्रमण के बाद हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे उनमें ये क्लॉटिंग मार्कर और अधिक बढ़े हुए थे। क्या है लॉन्ग कोविड ? लॉन्ग कोविड की कोई मेडिकल परिभाषा नहीं...
हृदय रोगों का खतरा घटाता विटामिन-के:धमनियों में कैल्शियम, फैट और कोलेस्ट्रॉल जमने से रोकता है विटामिन-के, हॉस्पिटल में भर्ती होने का रिस्क 21% तक कम कर देता है

हृदय रोगों का खतरा घटाता विटामिन-के:धमनियों में कैल्शियम, फैट और कोलेस्ट्रॉल जमने से रोकता है विटामिन-के, हॉस्पिटल में भर्ती होने का रिस्क 21% तक कम कर देता है

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धमनियों में कोलेस्ट्रॉल और फैट जमने से रोकना है तो खानपान में विटामिन-के की मात्रा बढ़ाएं। वैज्ञानिकों का कहना है, विटामिन-के हार्ट से जुड़ी बीमारी एथेरोस्केरियोसिस का खतरा कम करता है। धमनियों में फैट और कोलेस्ट्रॉल जमने के कारण एथेरोस्केरियोसिस की स्थिति बनती है। ऐसा होने पर धमनियों के ब्लॉक होने या डैमेज होने का खतरा बढ़ता है। यह दावा 'द जर्नल ऑफ अमेरिकल मेडिकल एसोसिएशन' में वैज्ञानिकों ने किया है। विटामिन-के और हार्ट के बीच क्या कनेक्शन है, इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने रिसर्च की। शोधकर्ताओं ने 23 साल तक 50 हजार लोगों के हेल्थ डाटा की जांच की। रिसर्च में सामने आया कि विटामिन-के हृदय रोग एथेरोस्केरियोसिस के रिस्क को कम करता है। कौन सा विटामिन-के कितना खतरा घटाता है शोधकर्ताओं के मुताबिक, विटामिन-के दो तरह के होते हैं। पहला- विटामिन-के1, यह हरी सब्जियों और वेजिटेबल ऑयल से मिलता...
पेरेंट्स को अलर्ट करने वाली रिसर्च:टीनएजर्स के मुकाबले 3 साल से कम उम्र के बच्चे से घरवालों को संक्रमित होने का खतरा 1.4 गुना ज्यादा, कनाडा के शोधकर्ताओं का दावा

पेरेंट्स को अलर्ट करने वाली रिसर्च:टीनएजर्स के मुकाबले 3 साल से कम उम्र के बच्चे से घरवालों को संक्रमित होने का खतरा 1.4 गुना ज्यादा, कनाडा के शोधकर्ताओं का दावा

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3 साल से कम उम्र का बच्चा अगर संक्रमित होता है तो घर के बड़े लोगों में संक्रमण फैलने का खतरा ज्यादा है। यह दावा कनाडा की स्वास्थ्य एजेंसी पब्लिक हेल्थ के रिसर्चर्स ने किया है। रिसर्च कहती है कि 14 से 17 साल की उम्र वाले टीनएजर्स के मुकाबले 3 साल से कम उम्र के बच्चों से घरवालों को संक्रमित होने का खतरा 1.4 गुना ज्यादा है। कम उम्र के बच्चों से 20 से 40 साल की उम्र के लोगों में संक्रमण फैलने का खतरा अधिक रहता है। वहीं, बड़े बच्चों से 40 से 60 साल की उम्र वालों में संक्रमण फैलने की आशंका ज्यादा रहती है। वैज्ञानिकों ने कोरोना से संक्रमित अलग-अलग उम्र के कुल 6,200 बच्चों पर स्टडी की। इनमें किस-किस उम्र के बच्चे शामिल थे, संक्रमण का खतरा कितना था और बचाव कैसे करें, जानिए वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में क्या कहा... सबसे पहले बात, रिसर्च आखिर शुरू कैसे हुई बच्चों से बड़ों में संक्रमण का ...
NOAA की रिपोर्ट:142 सालों में पहली बार इस साल जुलाई इतिहास का सबसे गर्म महीना रहा, कनाडा में तापमान 49.6 डिग्री पहुंचा; जानिए क्यों बढ़ रही है गर्मी

NOAA की रिपोर्ट:142 सालों में पहली बार इस साल जुलाई इतिहास का सबसे गर्म महीना रहा, कनाडा में तापमान 49.6 डिग्री पहुंचा; जानिए क्यों बढ़ रही है गर्मी

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जुलाई 2021 इतिहास का सबसे गर्म महीना रहा है। पिछले 142 सालों से एक-एक दिन का तापमान रिकॉर्ड किया जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि जुलाई के महीने में कभी इतनी गर्मी नहीं पड़ी। यह दावा अमेरिकी एजेंसी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में किया है। 2016 से भी 0.01 डिसे. ज्यादाएजेंसी का कहना है, दुनियाभर में जुलाई को गर्मी के लिए जाना जाता है, लेकिन इस साल जुलाई इतिहास का सबसे गर्म महीना साबित हुआ है। एजेंसी के एडमिनिस्ट्रेटर रिक स्पिनराड का कहना है, जुलाई 2016 के मुकाबले इस साल जुलाई का तापमान 0.01 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था। इसका एक उदाहरण है, कनाडा। इसी साल जुलाई में कनाडा में तापमान 49.6 डिग्री पहुंचा। सैकड़ों लोगों की मौत हुई और लोग गर्मी से बेहाल नजर आए। साल-दर-साल गर्मी क्यों रिकॉर्ड बना रही है, अब इसे भी समझिए जलवायु परिवर्तन पर काम करने वाली...
वैक्सीन बनाने का नया तरीका मॉलिक्युलर फार्मिंग:पौधे से बनाई कोविड-19 की वैक्सीन CoVLP; वैज्ञानिकों का दावा- इस तकनीक से तैयार टीके की कीमत बेहद कम होगी

वैक्सीन बनाने का नया तरीका मॉलिक्युलर फार्मिंग:पौधे से बनाई कोविड-19 की वैक्सीन CoVLP; वैज्ञानिकों का दावा- इस तकनीक से तैयार टीके की कीमत बेहद कम होगी

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सस्ते दाम पर वैक्सीन उपलब्ध कराने के लिए वैज्ञानिक 'मॉलिक्युलर फार्मिंग' का तरीका अपना रहे हैं। इस तकनीक का इस्तेमाल करके कोविड वैक्सीन तैयार की गई है। इसे CoVLP नाम दिया गया है। इसके अलावा एक फ्लू वैक्सीन भी बनाई गई है। वैज्ञानिकों का दावा है, इस तकनीक से तैयार वैक्सीन की कीमत काफी कम होगी और इसे अलग-अलग लोगों को उनकी जरूरत के मुताबिक लगाया जा सकता है। जानी मानी ब्रिटिश फार्मा कंपनी ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन और बायोटेक कम्पनी मेडिकागो ने मिलकर इसे तैयार किया है। इतने फायदे का दावा करने वाली मॉलिक्यूलर फार्मिंग क्या है, इसके फायदे क्या हैं और इसके जरिए कैसे बनाई गई कोविड वैक्सीन CoVLP, जानिए इन सवालों के जवाब.. सबसे पहले जानिए, क्या है मॉलिक्युलर फार्मिंगइस तकनीक से वैक्सीन बनाने के लिए सबसे पहले वैज्ञानिक लैब में वायरस के जेनेटिक मैटेरियल को तैयार करते हैं, फिर उसे एक पौधे में इंजेक्ट...
एक मरीज में 5 किडनियां:चेन्नई में 41 साल के एक शख्स का तीसरी बार हुआ किडनी ट्रांसप्लांट, हाई ब्लड प्रेशर के कारण दो बार फेल हुई किडनी, जानिए क्या है पूरा मामला

एक मरीज में 5 किडनियां:चेन्नई में 41 साल के एक शख्स का तीसरी बार हुआ किडनी ट्रांसप्लांट, हाई ब्लड प्रेशर के कारण दो बार फेल हुई किडनी, जानिए क्या है पूरा मामला

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चेन्नई में 41 साल के शख्स का तीसरी बार किडनी ट्रांसप्लांट किया गया है। हाई ब्लड प्रेशर और किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे इस शख्स की ट्रांसप्लांट सर्जरी चेन्नई के मद्रास मेडिकल मिशन हॉस्पिटल में की गई। हाल में हुई सर्जरी के बाद मरीज के शरीर में अब कुल 5 किडनियां हो गई हैं। डॉक्टर्स का कहना है, इस बार सर्जरी काफी चुनौतियों भरी रही क्योंकि मरीज हाई ब्लड प्रेशर का मरीज है और पिछली किडनियों को हटाए बिना नई किडनी ट्रांसप्लांट की गई है। मरीज में अलग-अलग तीन किडनियां क्यों ट्रांसप्लांट करनी पड़ीं, सर्जरी कितनी मुश्किल रही और पहले से शरीर में ट्रांसप्लांट हो चुकी किडनियां क्यों नहीं हटाई गईं, जानिए इन सवालों के जवाब... 14 साल की उम्र में हुआ पहला ट्रांसप्लांटमरीज का पहला किडनी ट्रांसप्लांट 1994 में हुआ, तब उसकी उम्र मात्र 14 साल थी। 2005 में दोबारा किडनी ट्रांसप्लांट किया गया। इस बार नई किड...
100 साल जीने का राज:आंतों में मौजूद एक खास कीटाणु है 100 साल से ज्यादा उम्र की वजह, यह संक्रमण का खतरा घटाकर बढ़ती उम्र के असर को कम करता है

100 साल जीने का राज:आंतों में मौजूद एक खास कीटाणु है 100 साल से ज्यादा उम्र की वजह, यह संक्रमण का खतरा घटाकर बढ़ती उम्र के असर को कम करता है

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जापानी वैज्ञानिकों ने 100 साल और इससे अधिक जीने वालों के बारे में एक सीक्रेट बताया है। उनका कहना है, इतनी लम्बी उम्र होने की एक वजह आंतों में मौजूद खास तरह का बैक्टीरिया है। यह बैक्टीरिया सेकंडरी बाइल एसिड का निर्माण करता है, जो संक्रमण से लड़ने में मदद करता है, आंतों को स्वस्थ रखता है और बढ़ती उम्र के असर को घटाने में मदद करता है। यह दावा टोक्यो की कियो यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के वैज्ञानिकों ने किया है। आंतों के बैक्टीरिया कैसे स्वस्थ रखते हैं, इसे समझेंआंतों में खास तरह के बैक्टीरिया पाए जाते हैं। इसे गट बैक्टीरिया या गट माइक्रोबियोम भी कहते हैं। जब भी हम खाना खाते हैं तो ये बैक्टीरिया उसे तोड़ते हैं। इससे खाना आसानी से पचता है और खाने में मौजूद पोषक तत्व शरीर में मिल जाते हैं। ये बुरे बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकने की कोशिश करते हैं। जब आंतों में गट बैक्टीरिया की संख्या घटती है...
साइबेरियन ‘स्पार्टा’ की तस्वीरें:28 हजार साल पहले बर्फ में दफन हुआ शावक मिला, इसे दांत, स्किन और मूंछ अब तक बरकरार; इस खोज से वैज्ञानिक भी हैरान

साइबेरियन ‘स्पार्टा’ की तस्वीरें:28 हजार साल पहले बर्फ में दफन हुआ शावक मिला, इसे दांत, स्किन और मूंछ अब तक बरकरार; इस खोज से वैज्ञानिक भी हैरान

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दुनिया की सबसे सर्द जगहों में शामिल साइबेरिया में वैज्ञानिकों को 28 हजार साल पुराना शावक (मादा) मिला है। शावक के शरीर के ज्यादातर हिस्से सुरक्षित मिले हैं। वैज्ञानिकों का कहना है, शावक का शव अभी भी सुनहरे बालों से ढका हुआ है। इसके दांत, स्किन और मूंछ भी बकरार हैं। इसकी खोज कैसे हुई, यह कितना सुरक्षित रहा और इसकी उम्र का कैसे पता चला, जानिए इन सवालों के जवाब खोज: बर्फ की उस लेयर में मिला जहां तापमान 0 डिग्री से कम रहता हैयह शावक स्वीडन के सेंटर फॉर पैलियोजेनेटिक्स के वैज्ञानिकों को साइबेरिया में मिला है। वैज्ञानिकों ने इसका नाम स्पार्टा रखा है। यह बर्फ की उस पर्माफ्रॉस्ट लेयर में पाया गया है, जहां का तापमान जीरो डिग्री से भी कम रहता है। यहां पर विलुप्त हो चुका एक शावक मिल चुका है। वैज्ञानिकों का दावा है, यह शेरों की विलुप्त हो चुकी एक प्रजाति का शावक है। इस प्रजाति का एक और शावक मिल च...