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नई HIV वैक्सीन ट्रायल में हुई फेल:जॉनसन एंड जॉनसन की HIV वैक्सीन ट्रायल में संक्रमण रोकने की क्षमता मात्र 25 फीसदी; लेकिन अमेरिका में जारी रहेगा ट्रायल

नई HIV वैक्सीन ट्रायल में हुई फेल:जॉनसन एंड जॉनसन की HIV वैक्सीन ट्रायल में संक्रमण रोकने की क्षमता मात्र 25 फीसदी; लेकिन अमेरिका में जारी रहेगा ट्रायल

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जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी ने अपनी नई HIV वैक्सीन ट्रायल के नतीजे जारी किए। वैक्सीन ट्रायल में फेल साबित हुई है। ट्रायल के दौरान नई वैक्सीन HIV का संक्रमण रोकने में मात्र 25 फीसदी ही असरदार साबित हुई है। ट्रायल रिपोर्ट में यह वैक्सीन भले ही असरदार साबित न हुई हो, लेकिन इससे किसी तरह के साइड इफेक्ट होने की पुष्टि नहीं हुई है। जॉनसन एंड जॉनसन मंगलवार को बयान जारी करके ट्रायल के नतीजों की जानकारी दी। कम्पनी ने HIV वैक्सीन का ट्रायल अफ्रीका में किया था। ट्रायल का नाम 'इमबोकोडो' रखा गया था। इसमें अफ्रीकी देश की 2600 महिलाओं को भी शामिल किया गया था। उम्मीद की जा रही थी कि ट्रायल के नतीजे सकारात्मक आएंगे और इस खतरनाक बीमारी को खत्म किया जा सकेगा। ट्रायल में ऐसा नहीं हो पाया। जॉनसन एंड जॉनसन के मुख्य वैज्ञानिक पॉल स्टॉफेल्स का कहना है, एचआईवी का वायरस काफी अलग और जटिल है। यह सीधेतौर पर मरीज की इम...
अखरोट का दिल से कनेक्शन:रोजाना आधा कप अखरोट हृदय रोग का खतरा घटाता है और 8.5% तक कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम करता है, जानिए यह क्यों है जरूरी

अखरोट का दिल से कनेक्शन:रोजाना आधा कप अखरोट हृदय रोग का खतरा घटाता है और 8.5% तक कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम करता है, जानिए यह क्यों है जरूरी

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रोजाना आधा कप अखरोट खाते हैं तो हृदय रोगों का खतरा घटता है और कोलेस्ट्रॉल 8.5 फीसदी तक कम हो जाता है। यह दावा हॉस्पिटल क्लीनिक डे बार्सिलोना के शोधकर्ताओं ने अपनी रिसर्च में किया है। शोधकर्ता और बार्सिलोना के आहार विशेषज्ञ एमिलियो रोस कहते हैं, पहले हुए कई अध्ययनों में यह साबित हो चुका है कि अखरोट हृदय रोग और स्ट्रोक का खतरा घटाता है। हमने अपनी नई रिसर्च में बैड कोलेस्ट्रॉल के जरिए यह समझाने की कोशिश की है कि इसका हृदय रोगों में क्या रोल है और कैसे असर डालता है। बैड कोलेस्ट्रॉल कैसे नुकसान पहुंचाता है, रिसर्च कैसे हुई, अखरोट कैसे हृदय रोगों से बचाता है और इसके क्या फायदे हैं, जानिए इन सवालों के जवाब 628 लोगों पर ऐसे हुई रिसर्चशोधकर्ताओं का कहना है, अखरोट के फायदों को समझने के लिए 628 लोगों पर दो साल तक रिसर्च की गई। इनकी उम्र 63 से 79 साल के बीच थी। ये सभी बार्सिलोना और कैलिफोर्निया ...
प्रोस्टेट बढ़ने के इलाज का नया विकल्प:स्प्रिंग जैसी डिवाइस से रुक-रुक कर होने वाली यूरिन का इलाज किया जा सकेगा, दावा; ट्रायल में यह डिवाइस सुरक्षित और असरदार साबित हुई

प्रोस्टेट बढ़ने के इलाज का नया विकल्प:स्प्रिंग जैसी डिवाइस से रुक-रुक कर होने वाली यूरिन का इलाज किया जा सकेगा, दावा; ट्रायल में यह डिवाइस सुरक्षित और असरदार साबित हुई

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दुनियाभर में लाखों पुरुष प्रोस्टेट ग्लैंड के बढ़ने की समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसा होने पर पेशाब पूरी तरह से नहीं हो पाती। वैज्ञानिकों ने इसके इलाज के लिए एक स्प्रिंगनुमा डिवाइस तैयार की है। इस इम्प्लांट को प्रभावित हिस्से में लगाकर समस्या को घटा सकते हैं। इस स्प्रिंग इम्प्लांट को विकसित करने वाली अमेरिकी कम्पनी जेनफ्लो के शोधकर्ताओं का दावा है कि शुरुआती ट्रायल में मरीजों में तेज रिकवरी देखी गई है और साइडइफेक्ट भी नहीं सामने आए। क्या होता है प्रोस्टेट का बढ़ना?प्रोस्टेट बढ़ने के मामले 50 साल से अधिक उम्र के लोगों में सामने आते हैं। उम्र के इस पड़ाव पर हर तीसरे पुरुष में प्रोस्टेट बढ़ने से जुड़े लक्षण दिखते हैं। प्रोस्टेट का बढ़ना क्या होता है, अब इसे समझिए। मूत्रमार्ग की नली के जरिए पेशाब बाहर निकलता है, लेकिन इस हिस्से में मौजूद प्रोस्टेट ग्रंथि का आकार बढ़ने पर इस नली से पेशाब पू...
अमेरिकी शोधकर्ताओं का दावा:वैक्सीन लेने वाले उन 90 फीसदी लोगों में भी एंटीबॉडीज बनीं जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर, इनकी एंटीबॉडीज स्वस्थ इंसान जितनी स्ट्रॉन्ग

अमेरिकी शोधकर्ताओं का दावा:वैक्सीन लेने वाले उन 90 फीसदी लोगों में भी एंटीबॉडीज बनीं जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर, इनकी एंटीबॉडीज स्वस्थ इंसान जितनी स्ट्रॉन्ग

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कोरोना की वैक्सीन असरदार है, वैज्ञानिकों का इसका एक और प्रमाण दिया है। अमेरिकी शोधकर्ताओं की हालिया रिसर्च कहती है, वैक्सीन के डोज लगने के बाद 90 फीसदी तक उन लोगों में भी एंटीबॉडीज की संख्या बढ़ीं जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर है। इनमें मौजूद एंटीबॉडीज उतनी ही स्ट्रॉन्ग थीं जितना एक स्वस्थ इंसान में होती हैं। रिसर्च की 3 बड़ी बातें एंटीबॉडी के रिस्पॉन्स को समझने के लिए अमेरिका की वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन ने 133 मरीजों पर रिसर्च की। ये सभी मरीज इंफ्लेमेट्री बॉवेल डिसीज, रूमेटॉयड आर्थराइटिस, ल्यूपस व स्पॉन्डिलोआर्थराइटिस से जूझ रहे हैं और इम्यूनिटी को दबाने वाली इम्यूनोसप्रेसेंट दवाएं ले रहे थे।इनकी तुलना 33 स्वस्थ लोगों से की गई। इनका ब्लड सैम्पल लिया गया। ये ऐसे लोग थे जिन्हें फाइजर और मॉडर्ना वैक्सीन की पहली डोज लेने के 3 हफ्ते बाद दूसरी डोज लगी थी।जांच रिपोर्ट में सामने आय...
कॉफी से दिल का कनेक्शन:रोजाना 3 कप कॉफी हृदय रोगों का खतरा 17% और स्ट्रोक का रिस्क 21% तक कम करती है, नई रिसर्च में वैज्ञानिकों का दावा; जानिए इसे कितना पीएं

कॉफी से दिल का कनेक्शन:रोजाना 3 कप कॉफी हृदय रोगों का खतरा 17% और स्ट्रोक का रिस्क 21% तक कम करती है, नई रिसर्च में वैज्ञानिकों का दावा; जानिए इसे कितना पीएं

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रोजाना 3 कप कॉफी दिल को दुरुस्त रखती है। यह 21 फीसदी तक स्ट्रोक और 17 फीसदी तक खतरनाक हृदय रोगों का खतरा घटाती है। यह दावा बुडापेस्ट की सेमेल्विस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है। कॉफी का सेहत पर क्या असर पड़ता है, इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने बड़े स्तर पर रिसर्च की है। कॉफी कैसे दिल को स्वस्थ रखती है, यह कैसे पता चला और क्या 3 कप से ज्यादा कॉफी पीने पर शरीर को नुकसान पहुंच सकता है, जानिए इन सवालों के जवाब... रिसर्च की 2 बड़ी बातेंरिसर्च प्रोसेस: शोधकर्ताओं ने यूके बायोबैंक में रजिस्टर्ड 4,60,000 लोगों पर रिसर्च की। रिसर्च के दौरान इनकी सेहत और काफी पीने की आदतों का विश्लेषण किया गया। रिसर्च को समझने के लिए इन लोगों को तीन भागों में बांटा गया। पहला ग्रुप: 22 फीसदी लोगों ने कॉफी बिल्कुल भी नहीं पी।दूसरा ग्रुप: 58 फीसदी लोगों ने आधा से 3 क...
रक्त के थक्के पता लगाने का नया तरीका:वैज्ञानिकों ने डाई का इंजेक्शन लगाकर ब्लॉकेज पता लगाने का नया तरीका खोजा, दावा; यह जांच एंजियोग्राम से भी बेहतर और सुरक्षित

रक्त के थक्के पता लगाने का नया तरीका:वैज्ञानिकों ने डाई का इंजेक्शन लगाकर ब्लॉकेज पता लगाने का नया तरीका खोजा, दावा; यह जांच एंजियोग्राम से भी बेहतर और सुरक्षित

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वैज्ञानिकों ने शरीर में रक्त के थक्के पता लगाने के लिए नई जांच विकसित की है। डाई की मदद से देखा जा सकता है कि शरीर के किस हिस्से में रक्त के थक्के जमे हैं। शरीर में रक्त के थक्कों का पता लगना जरूरी है क्योंकि ये हार्ट अटैक का खतरा बढ़ाते हैं। यह रिसर्च करने वाली एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है, नई जांच की मदद से हृदय के बाहर मौजूद ब्लड में ब्लड क्लॉट्स देखे जा सके हैं। ऐसे पता लगाते हैं रक्त के थक्केशोधकर्ताओं का कहना है, शरीर में जहां-जहां ब्लड क्लॉटिंग हुई है उस हिस्से की धमनियों में ब्लॉकेज हो जाता है। ब्लॉकेज होने पर धमनियां डैमेज हो जाती हैं। शोधकर्ताओं ने नई जांच के ट्रायल के लिए 94 मरीजों को चुना। इन मरीजों के हाथ में डाई को इंजेक्ट किया। यह डाई ब्लड में मिलकर पूरे शरीर में फैल जाती है। जहां-जहां धमनियों में डैमेज होता है वहां पर डाई के पहुंचने पर एक तरह का प्रका...
लैंसेट जर्नल की रिसर्च:कोविड के कारण हॉस्पिटल में भर्ती होने वाले 50% मरीजों में सालभर बाद भी एक लक्षण जरूर दिख रहा, चीनी शोधकर्ताओं का दावा

लैंसेट जर्नल की रिसर्च:कोविड के कारण हॉस्पिटल में भर्ती होने वाले 50% मरीजों में सालभर बाद भी एक लक्षण जरूर दिख रहा, चीनी शोधकर्ताओं का दावा

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कोरोना को मात देने के 1 साल बाद भी 50 फीसदी मरीजों में एक न एक लक्षण जरूर दिख रहे हैं। इनमें सांस लेने में दिक्कत और थकान जैसे लक्षण शामिल हैं। ये लक्षण खासतौर पर हॉस्पिटल में भर्ती होने के बाद रिकवर होने वाले मरीजों में दिख रहे हैं। लैंसेट जर्नल में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक, हॉस्पिटल में भर्ती होने वाले कोरोना के मरीज सालभर के बाद कैसा महसूस कर रहे हैं, उनमें कौन से लक्षण दिख रहे हैं। इस पर चीन के नेशनल सेंटर फॉर रेस्पिरेट्री मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने स्टडी की है। 1733 मरीजों पर हुई रिसर्च शोधकर्ताओं ने चीन के वुहान में कोरोना के 1,733 मरीजों पर स्टडी की। ये ऐसे मरीज थे जो संक्रमण के बाद रिकवरी के लिए 6 माह तक हॉस्पिटल में भर्ती रहे थे। इनमें से 1,276 मरीजों का अगले एक साल तक हेल्थ चेकअप किया गया। संक्रमण से लेकर हर छोटी-छोटी बात तक को अगले एक साल तक रिकॉर्ड किया गया। इनमें से एक ...
सूंघने की घटती क्षमता का कनेक्शन सिर्फ कोरोना से नहीं:अल्जाइमर्स और ऑटो इम्यून डिजीज में भी घट जाती है सूंघने की क्षमता, लम्बे समय तक ऐसा रहना ठीक नहीं

सूंघने की घटती क्षमता का कनेक्शन सिर्फ कोरोना से नहीं:अल्जाइमर्स और ऑटो इम्यून डिजीज में भी घट जाती है सूंघने की क्षमता, लम्बे समय तक ऐसा रहना ठीक नहीं

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खुशबू को न महसूस कर पाना यानी सूंघने की क्षमता का घटना कोविड का एक बड़ा लक्षण है। ज्यादातर लोगों को लगता है ऐसा सिर्फ कोविड होने पर होता है, लेकिन ऐसा नहीं है। कई ऐसी बीमारियां हैं, जिसमें सूंघने की क्षमता घट जाती है। सूंघने की घटती क्षमता अल्जाइमर्स, सिजोफ्रेनिया या दूसरी ऑटो इम्यून बीमारी का संकेत हो सकता है। इन बीमारियों में ब्रेन के वो हिस्से सिकुड़ जाता है या प्रभावित हो जाता है जो जो सूंघने के लिए काम करता है। पार्किंन्सन फाउंडेशन के अनुसार, पार्किंन्सन बीमारी से पीड़ित अधिकांश लोगों में सूंघने की कुछ क्षमता घट जाती है। इसे हाइपोस्मिया कहा जाता है। ऐसे में यह गंभीर खतरा हो सकता है। मौत का खतरा 50 फीसदी तक बढ़ जाता है अमेरिकन कॉलेज ऑफ फिजिशियंस के अनुसार, जिन बुजुर्गों में सूंघने की क्षमता कम पाई गई उनमें अगले 10 साल में मृत्यु का खतरा 50% तक अधिक रहा। हालांकि कई बार सामान्य ...
मांओं को अलर्ट करने वाली रिसर्च:प्रेग्नेंसी के 10वे हफ्ते में ही बताया जा सकेगा बच्चे का जन्म समय से पहले होगा या नहीं, एक बैक्टीरियल टेस्ट से मिलेगी जानकारी

मांओं को अलर्ट करने वाली रिसर्च:प्रेग्नेंसी के 10वे हफ्ते में ही बताया जा सकेगा बच्चे का जन्म समय से पहले होगा या नहीं, एक बैक्टीरियल टेस्ट से मिलेगी जानकारी

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प्री-मैच्योर बर्थ से नवजात में मौत का खतरा 50 फीसदी तक बना रहता है। प्री-मैच्योर बर्थ का मतलब है प्रेग्नेंसी के 37वें हफ्ते से पहले बच्चे का जन्म होना। समय से पहले जन्म होने पर बच्चे में कई तरह के खतरे बढ़ते हैं। इसलिए ऐसी डिलीवरी को रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने एक टेस्ट की सलाह दी है। वैज्ञानिकों का कहना है, प्रेग्नेंसी के 10वें हफ्ते में ही खास तरह के बैक्टीरिया और केमिकल की जांच करके यह भविष्यवाणी की जा सकेगी कि नवजात की प्री-मैच्योर बर्थ होगी या नहीं। रिसर्च करने वाले किंग्स कॉलेज लंदन के महिला रोग विशेषज्ञ प्रो. एंड्रयु शेनन का कहना है, प्री-मैच्योर बर्थ की भविष्यवाणी करना बेहद मुश्किल है। मेरी टीम ने मिलकर इसकी भविष्वाणी करने का एक तरीका खोजा है। जो समय रहते महिला को अलर्ट कर सकेगा और खतरा घटा सकेगा। कैसे प्री-मैच्योर बर्थ की भविष्यवाणी की जा सकती है, नवजात की प्री-मैच्योर बर...
कोरोना का एक असर यह भी:66% भारतीयों को ऑनलाइन रहने की पड़ी लत, रोजाना स्क्रीन पर 4 घंटे से अधिक समय बिता रहे; जानिए यह आदत शरीर के लिए कितना है खतरनाक

कोरोना का एक असर यह भी:66% भारतीयों को ऑनलाइन रहने की पड़ी लत, रोजाना स्क्रीन पर 4 घंटे से अधिक समय बिता रहे; जानिए यह आदत शरीर के लिए कितना है खतरनाक

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कोरोनाकाल में 66 फीसदी भारतीयों को ऑनलाइन रहने की लत लग गई है। ये औसतन रोजाना 4.4 घंटे स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं। यह दावा सायबर सिक्योरिटी फर्म नॉर्टन के हालिया सर्वे में किया गया है। सर्वे कहता है, ऑनलाइन क्लासेस और घर पर ऑफिस वर्क करने के अलावा 82 फीसदी लोग ऐसे हैं जो मोबाइल स्क्रीन के सामने समय बिता रहे हैं। कोरोना काल में ऐसे मामले बढ़े हैं। वयस्कों के लिए स्मार्टफोन सबसे कॉमन डिवाइस बन गया है, 84 फीसदी वयस्क इसके साथ काफी समय बिता रहे हैं। ऑनलाइन रहने की आदत कितनी खराब है, यह शरीर पर क्या असर डालती है और इसे कैसे दूर करें, इन सवालों का जवाब जानने से पहले इस सर्वे को समझें... पहले सर्वे की 4 बड़ी बातें जानिए कोरोनाकाल में देश के लोग स्मार्टफोंस के साथ कितना समय बिता रहे हैं, इसे समझने के लिए सायबर सिक्योरिटी फर्म नॉर्टन ने सर्वे किया। इसमें 1 हजार लोग शामिल और सर्वे ऑनलाइन...