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कोरोना में ब्रेस्टफीडिंग और वैक्सीनेशन:संक्रमित मां करा सकती है ब्रेस्टफीडिंग; वैक्सीन लगवाना भी जरूरी, इससे मां-बच्चे की इम्यूनिटी बढ़ेगी

कोरोना में ब्रेस्टफीडिंग और वैक्सीनेशन:संक्रमित मां करा सकती है ब्रेस्टफीडिंग; वैक्सीन लगवाना भी जरूरी, इससे मां-बच्चे की इम्यूनिटी बढ़ेगी

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नई दिल्ली कोरोना से संक्रमित होने वाली महिलाओं को ब्रेस्टफीडिंग करानी चाहिए या नहीं और वैक्सीनेशन के बाद बच्चे को दूध पिलाएं या नहीं? ये सवाल कई महिलाओं के जेहन में है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) कहता है कि ऐसी महिलाएं बच्चों को ब्रेस्टफीडिंग करा सकती हैं, लेकिन कुछ सावधानियां बरतकर। जैसे- आपने आसपास की चीजों को डिसइन्फेक्ट करें, बच्चे को गोद में लेने से पहले हाथों को साबुन-पानी या सैनेटाइजर से साफ करें और मास्क लगाएं। अगर संक्रमण ज्यादा है, तो बच्चे के लिए एक्सप्रेस मिल्क का इस्तेमाल कर सकती हैं। अब बात करते हैं मां के वैक्सीनेशन की। मुम्बई के जसलोक हॉस्पिटल एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट में लेक्टेशन कंसल्टेंट डॉ. मानसी शाह कहती हैं, गर्भवती और ब्रेस्टफीड कराने वाली महिलाएं वैक्सीन लगवा सकती है। इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। वैक्सीन लगवाने से पहले और बाद में ये ब...
सब्जियों के ‘राजा’ से सेहत को खतरा:आलू अधिक खाने से डायबिटीज, मोटापा और हृदय रोगों का खतरा; इसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक, यही बीमारियों की जड़ है

सब्जियों के ‘राजा’ से सेहत को खतरा:आलू अधिक खाने से डायबिटीज, मोटापा और हृदय रोगों का खतरा; इसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक, यही बीमारियों की जड़ है

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सब्जियों का राजा कहे जाने वाले आलू से ब्लड शुगर, हृदय रोग और मोटापा बढ़ने का खतरा है। यह दावा हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिकों ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है। वैज्ञानिकों का कहना है, आलू में कार्बोहाइड्रेट अधिक होने के कारण सेहत को नुकसान पहुंच रहा है। आलू की तरह जमीन के अंदर पैदा होने वाली सब्जियों में कई तरह के पोषक तत्व पाए जाते हैं लेकिन इन सभी में कार्बोहाइड्रेट अधिक होता है। आलू क्यों नुकसान पहुंचाता है, इसे ऐसे समझेंवैज्ञानिकों का कहना है, आलू में कार्बोहाइड्रेट अधिक होता है। यह आसानी से पच जाता है, इस कारण शरीर का ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है और फिर उतनी ही तेजी से घट जाता है। जो खतरनाक है। आलू के नुकसान पहुंचाने की एक वजह और भी है। जमीन में उगने वाली चीजों में कार्बोहाइड्रेट अधिक होने के कारण उनका ग्लाइसीमिक इंडेक्स भी ज्यादा होता है। ग्लाइसीमिक इंडेक्स ज्यादा होने का म...
मानसून में लेप्टोस्पायरोसिस का खतरा:बाढ़ और जलभराव वाले इलाके में फैलता है लेप्टोस्पायरोसिस का बैक्टीरिया, इसके लक्षण भी फ्लू जैसे इसलिए गंदे पानी में न जाएं

मानसून में लेप्टोस्पायरोसिस का खतरा:बाढ़ और जलभराव वाले इलाके में फैलता है लेप्टोस्पायरोसिस का बैक्टीरिया, इसके लक्षण भी फ्लू जैसे इसलिए गंदे पानी में न जाएं

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देश के कई हिस्सों में बारिश हो रही है और बाढ़ जैसे हालात बन रहे हैं। बारिश के मौसम में जलभराव के कारण कई बीमारियां पनपती हैं, इनमें से ही एक है लेप्टोस्पायरोसिस। यह बीमारी लेप्टोस्पायरा नाम के बैक्टीरिया के कारण फैलती है और अधिकतर संक्रमित जानवरों के जरिए इंसान तक पहुंचती है। एक से दूसरे इंसान में संक्रमण फैलने के मामले कम ही सामने आते हैं। संक्रमित जानवर जैसे चूहे के मल, मूत्र या दूषित पानी, खाने और मिट्टी के सम्पर्क में आने पर इंसान संक्रमित हो सकता है। इससे सबसे जयादा मामले मानसून में सामने आते हैं। इसकी वजह है जलभराव और नमी। स्किन और आंखों के जरिए संक्रमित करता है बैक्टीरियामुम्बई के मसीना हॉस्पिटल के चेस्ट फिजीशियन डॉ. सुलेमान लधानी कहते हैं, लेप्टोस्पायरोसिस का बैक्टीरिया स्किन, मुंह, आंखें और नाक के जरिए शरीर में पहुंचता है। इसके मामले ऐसी जगहों पर पाए जाते हैं जहां साफ-स...
मलेरिया रोकने के लिए नया प्रयोग:मलेरिया फैलाने वाली मादा मच्छर को बांझ बनाकर दुनियाभर में इस बीमारी को रोकेंगे वैज्ञानिक, रिसर्च के दौरान 560 दिन में घटी मच्छरों की संख्या

मलेरिया रोकने के लिए नया प्रयोग:मलेरिया फैलाने वाली मादा मच्छर को बांझ बनाकर दुनियाभर में इस बीमारी को रोकेंगे वैज्ञानिक, रिसर्च के दौरान 560 दिन में घटी मच्छरों की संख्या

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दुनियाभर में हर साल मलेरिया के कारण करीब 5 लाख लोग दम तोड़ रहे हैं। इन मौतों को कम करने और मलेरिया के मामले घटाने के लिए वैज्ञानिकों ने नया प्रयोग किया है। वैज्ञानिक मलेरिया फैलाने वाली मादा मच्छर को CRISPR जीन एडिटिंग तकनीक से बांझ (इनफर्टाइल) बना रहे हैं, ताकि मच्छरों की जनसंख्या को कंट्रोल किया जा सके। वैज्ञानिकों का कहना है, यह एक 'गेम चेंजर' तकनीक साबित हो सकती है और इससे जानलेवा बीमारी का अंत किया जा सकता है। इस पर लंदन का इम्पीरियल कॉलेज और लिवरपूल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन मिलकर रिसर्च कर रहा है। वैज्ञानिक पहली बार मादा मच्छरों के जीन में इस तरह के बदलाव कर रहे हैं कि वो प्रजनन लायक न रह सकें। इसके लिए वैज्ञानिकों में मच्छरों की एनाफिलीज गैम्बी प्रजाति को चुना है। यही प्रजाति सब-सहारा अफ्रीका में मलेरिया का संक्रमण फैलाने के लिए जिम्मेदार है। कैसे मादा मच्छरों को बनाते हैं...
इजराइल में चौंकाने वाला मामला:नवजात बच्ची के पेट में मिले एक से ज्यादा भ्रूण, 10 हफ्ते पुराने सभी भ्रूण में हड्डियां और हार्ट विकसित हो चुके थे; सर्जरी करके हटाया

इजराइल में चौंकाने वाला मामला:नवजात बच्ची के पेट में मिले एक से ज्यादा भ्रूण, 10 हफ्ते पुराने सभी भ्रूण में हड्डियां और हार्ट विकसित हो चुके थे; सर्जरी करके हटाया

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इजराइल के अशदोद में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां एक बच्ची के जन्म लेने के बाद उसके पेट में एक से अधिक भ्रूण मिले हैं। मां के गर्भ में वो इन भ्रूण को पाल रही थी। नवजात बच्ची की सर्जरी करके उसमें से भ्रूण हटा दिए गए हैं। डॉक्टर्स का कहना है कि 5 लाख नवजात में कोई एक ऐसा मामला सामने आता है। पेट में भ्रूण होने की बात, ऐसे पता चलीबच्ची का जन्म जुलाई के शुरुआती हफ्ते में अशदोद के अस्सुता मेडिकल सेंटर में हुआ था। डॉक्टरों ने बताया कि, प्रेग्नेंसी के अंतिम हफ्तों में मां का अल्ट्रासाउंड करने के दौरान नवजात बच्ची का पेट दूसरे बच्चों के मुकाबले बड़ा दिखा था। नवजात के जन्म के बाद डॉक्टर्स ने उसका अल्ट्रासाउंट और एक्स-रे किया। जांच रिपोर्ट में उसके पेट में एक से अधिक भ्रूण होने की पुष्टि हुई। सर्जरी करके नवजात से भ्रूण हटाए गएअस्सुता मेडिकल सेंटर में नियोनेटोलॉजी के डायरेक्टर ओमर ग्ल...
इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिसर्च:बाजरे से घटा सकते हैं 15% तक ब्लड शुगर, यह स्वस्थ लोगों में भी टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कम करता है

इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिसर्च:बाजरे से घटा सकते हैं 15% तक ब्लड शुगर, यह स्वस्थ लोगों में भी टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कम करता है

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बाजरा टाइप-2 डायबिटीज का खतरा घटाता है और शरीर में ब्लड शुगर का स्तर पर भी कंट्रोल करने में मदद करता है। ऐसे लोग जो स्वस्थ हैं और बाजरे को खानपान में शामिल करते हैं उनमें इस बीमारी की आशंका कम हो जाती है। यह दावा इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी एसिड ट्रॉपिक (ICRISAT) ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है। 'फ्रंटियर्स इन न्यूट्रिशन' जर्नल में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक, बाजारा ब्लड शुगर के लेवल में 12 से 15 फीसदी तक कमी लाता है। ऐसा क्यों है इसकी भी वजह जानिएवैज्ञानिकों का कहना है, बाजरे का औसत ग्लाइसीमिक इंडेक्स 52.7 होता है। यह चावल और रिफाइंड गेहूं के मुकाबले 30 फीसदी तक कम होता है। वहीं, मुक्के के मुकाबले भी बाजरे का ग्लाइसीमिक इंडेक्स कम होता है। किसी चीज का ग्लाइसीमिक इंडेक्स जानकर पता लगाया जा सकता है वो चीज ब्लड शुगर लेवल कितना बढ़ाएगी और कितने समय में बढ़ाएगी। इसीलि...
पश्चिम अफ्रीका का मामला:26 वर्षीय महिला ने 9 बच्चों को जन्म देकर बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड, कइयों के बचने की उम्मीद नहीं थी; शुक्र है डिलीवरी के 3 माह बाद भी ये जिंदा हैं

पश्चिम अफ्रीका का मामला:26 वर्षीय महिला ने 9 बच्चों को जन्म देकर बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड, कइयों के बचने की उम्मीद नहीं थी; शुक्र है डिलीवरी के 3 माह बाद भी ये जिंदा हैं

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26 साल एक महिला ने मोरक्को में 9 बच्चों को जन्म देकर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है। पश्चिमी अफ्रीकी देश माली की रहने वाली हेलीमा सिसे की डिलीवरी 5 मई को हुई थी। डॉक्टर्स ने 50 फीसदी बच्चों के ही जिंदा रह पाने की आशंका जाहिर की थी, लेकिन सभी बच्चे स्वस्थ हैं। एक साथ जन्म लेने वाले 9 बच्चों को नोनुप्लेट्स कहते हैं। इनमें 5 लड़कियां और 4 लड़के हैं। हलीमा और उनके 35 वर्षीय पति कादेर आर्बे 9 बच्चों को पाकर काफी खुश हैं। हेलीमा कहती हैं, बच्चों की संख्या पता चलने के बाद बेहतर मेडिकल सुविधाओं के लिए मोरोक्को गई और 5 मई को डिलीवरी हुई। प्री-मैच्योर डिलीवरी होने के कारण बच्चों का वजन सामान्य से काफी कम था। 35 लोगों के स्टाफ ने मिलकर डिलीवरी कराईबीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, 25वें हफ्ते में महिला को मोरोक्को के हॉस्पिटल लाया गया। यहां महिला की प्री-मैच्योर डिलीवरी हुई। इसमें 10 डॉक्टर और 25 ल...
पोस्ट कोविड का असर:रिकवरी के 30 दिन बाद मरीजों में बाल टूटने के मामले बढ़ रहे, इसकी वजह हार्मोन में बदलाव, वजन घटना और पोषक तत्वों की कमी

पोस्ट कोविड का असर:रिकवरी के 30 दिन बाद मरीजों में बाल टूटने के मामले बढ़ रहे, इसकी वजह हार्मोन में बदलाव, वजन घटना और पोषक तत्वों की कमी

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कोरोना से रिकवर होने वाले मरीजों में हेयरफॉल के मामले बढ़ रहे हैं। दूसरी लहर में वायरस को मात देने वाले लोगों में स्किन एलर्जी, रैशेज, कमजोरी, थकान, ड्राय आइस के बाद अब बालों के टूटने के लक्षण भी दिख रहे हैं। एक्सपर्ट का कहना है, ऐसे मरीजों में रिकवरी के 30 दिन बाद बालों में कमी आ रही है। वहीं, कुछ मरीजों में कोविड के दौरान भी ऐसे मामले सामने आए थे। कुछ मरीजों के खानपान में पोषक तत्वों की कमी, बुखार, तनाव, बेचैनी और हार्मोन में बदलाव भी हेयरफॉल की वजह हो सकती है। इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल में सीनियर कॉस्मेटिक एंड प्लास्टिक सर्जन डॉ. शाहीन नूरेएजदान कहती हैं, ऐसे मरीजों की संख्या में दोगुनी हो गई है। इसकी वजह पोस्ट कोविड इंफ्लेमेशन है। वजन में बदलाव, विटामिन-डी और बी-12 की कमी इसकी बड़ी वजह हो सकती है। डाइट में प्रोटीन जरूर लेंसीनियर कॉस्मेटिक एंड प्लास्टिक सर्जन डॉ. कुलदीप सिंह क...
सुई और साइड इफेक्ट के डर ने बढ़ाई बेचैनी:वैक्सीन लगने के बाद 30% तक साइडइफेक्ट की वजह है बेचैनी, महिलाओं में इसके मामले ज्यादा; भारतीय इम्युनाइजेशन कमेटी की रिसर्च

सुई और साइड इफेक्ट के डर ने बढ़ाई बेचैनी:वैक्सीन लगने के बाद 30% तक साइडइफेक्ट की वजह है बेचैनी, महिलाओं में इसके मामले ज्यादा; भारतीय इम्युनाइजेशन कमेटी की रिसर्च

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वैक्सीन लगने के बाद 30 फीसदी से अधिक लोगों में साइड इफेक्ट की वजह है बेचैनी। यह खुलासा वैक्सीन के साइड इफेक्ट पर रिसर्च करने वाली नेशनल एडवर्स इवेंट्स फॉलोइंग इम्युनाइजेशन कमेटी ने किया है। कमेटी ने ऐसे 88 मामलों पर स्टडी की। इनमें से 22 मामलों में साइड इफेक्ट की वजह बेचैनी सामने आई। 28 जून को स्टडी पूरी होने के बाद नतीजे जारी किए गए हैं। महिलाओं में बेचैनी के मामले ज्यादारिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में बेचैनी के मामले अधिक सामने आए हैं। इस बेचैनी की एक बड़ी वजह है सुई से लगने वाला डर। इसे नीडिल फोबिया कहते हैं। जिन 22 लोगों को बेचैनी की शिकायत हुई उनमें से 16 लोगों ने कोविशील्ड लगवाई और बाकियों ने कोवैक्सीन का डोज लिया था। एक्सपर्ट कहते हैं, इस तरह की बेचैनी को पोस्ट वैक्सीनेशन का साइड इफेक्ट नहीं मानना चाहिए। कोविड की वैक्सीन अभी नई है इसके कितने साइड इफेक...
सुई और साइड इफेक्ट के डर ने बढ़ाई बेचैनी:वैक्सीन लगने के बाद 30% तक साइडइफेक्ट की वजह है बेचैनी, महिलाओं में इसके मामले ज्यादा; भारतीय इम्युनाइजेशन कमेटी की रिसर्च

सुई और साइड इफेक्ट के डर ने बढ़ाई बेचैनी:वैक्सीन लगने के बाद 30% तक साइडइफेक्ट की वजह है बेचैनी, महिलाओं में इसके मामले ज्यादा; भारतीय इम्युनाइजेशन कमेटी की रिसर्च

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वैक्सीन लगने के बाद 30 फीसदी से अधिक लोगों में साइड इफेक्ट की वजह है बेचैनी। यह खुलासा वैक्सीन के साइड इफेक्ट पर रिसर्च करने वाली नेशनल एडवर्स इवेंट्स फॉलोइंग इम्युनाइजेशन कमेटी ने किया है। कमेटी ने ऐसे 88 मामलों पर स्टडी की। इनमें से 22 मामलों में साइड इफेक्ट की वजह बेचैनी सामने आई। 28 जून को स्टडी पूरी होने के बाद नतीजे जारी किए गए हैं। महिलाओं में बेचैनी के मामले ज्यादारिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में बेचैनी के मामले अधिक सामने आए हैं। इस बेचैनी की एक बड़ी वजह है सुई से लगने वाला डर। इसे नीडिल फोबिया कहते हैं। जिन 22 लोगों को बेचैनी की शिकायत हुई उनमें से 16 लोगों ने कोविशील्ड लगवाई और बाकियों ने कोवैक्सीन का डोज लिया था। एक्सपर्ट कहते हैं, इस तरह की बेचैनी को पोस्ट वैक्सीनेशन का साइड इफेक्ट नहीं मानना चाहिए। कोविड की वैक्सीन अभी नई है इसके कितने साइड इफेक...