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हैंड सैनेटाइजर से शरीर में मेथेनॉल जैसे जहरीले केमिकल पहुंचते हैं; इससे अमेरिका में 15 में से 4 की आंखों की रोशनी गई, 3 की मौत हुई

हैंड सैनेटाइजर से शरीर में मेथेनॉल जैसे जहरीले केमिकल पहुंचते हैं; इससे अमेरिका में 15 में से 4 की आंखों की रोशनी गई, 3 की मौत हुई

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सैनेटाइजर का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करना जानलेवा साबित हो सकता है। मेयो क्लीनिक के एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि सैनेटाइजर का अधिक इस्तेमाल करते हैं आंखों की रोशनी जाने के साथ मौत भी हो सकती है। इसका सबसे ज्यादा खतरा बच्चों को है। सैनेटाइजर में मौजूद जहरीले केमिकल स्किन के जरिए बच्चों के शरीर में पहुंच सकते हैं। ऐसा क्यों है, इसकी वजह भी जानिए हैंड सैनेटाइजर में तीन तरह के अल्कोहल इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें से एक है, मेथेनॉल। इसका अधिक इस्तेमाल करने पर आंखों की रोशनी हमेशा के लिए खत्म हो सकती है या मौत भी हो सकती है।अमेरिका में मेथेनॉल वाले हैंड सैनेटाइजर बनाने पर बैन लगा दिया गया है। मेथेनॉल की जगह एथेनॉल और आइसोप्रोपेनॉल को सुरक्षित विकल्प माना गया है। वहीं, कई देशों में इस्तेमाल हो रहे सैनेटाइजर में मेथेनॉल मौजूद है।बच्चों की स्किन के जरिए मेथेनॉल शरीर में पहुंचकर लम्बे समय स...
स्मार्टफोन की स्क्रीन से सैम्पल लेकर कोविड टेस्ट किया जा सकेगा, दावा; 81 से 100 फीसदी तक सटीक परिणाम बताता है

स्मार्टफोन की स्क्रीन से सैम्पल लेकर कोविड टेस्ट किया जा सकेगा, दावा; 81 से 100 फीसदी तक सटीक परिणाम बताता है

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लंदन के वैज्ञानिकों ने कोरोना की जांच का नया तरीका ढूंढा है। इसका नाम फोन स्क्रीन टेस्टिंग रखा गया है। अब जांच के लिए स्वैब स्टिक से नाक या गले से सैम्पल लेने की जरूरत नहीं। स्मार्टफोन की स्क्रीन से सैम्पल लिया जा सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि फोन स्क्रीन टेस्टिंग से जांच के नतीजे आरटी-पीसीआर की तरह ही सटीक आते हैं और खर्च भी कम आता है। शोधकर्ता डॉ. रोड्रिगो यूंग कहते हैं, इस जांच को यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और डायग्नोसिस बायोटेक स्टार्टअप के साथ मिलकर तैयार किया है। स्मार्टफोन को ही क्यों चुनाजांच करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है, जब कोई इंसान खांसता है या बात करता है तो मुंह से ड्रॉप्लेट्स यानी लार की बूंदें निकलकर आसपास की सतह पर इकट्ठा हो जाती हैं। कोरोना से संक्रमित इंसान के ड्रॉप्लेट्स में वायरस के कण होते हैं। मुंह से निकलने वाले ये ड्रॉप्लेट्स स्मार्टफोन की स्क्रीन पर इक...
कैंसर के इलाज में दी जाने वाली इम्यूनोथैरेपी के साइड इफेक्ट से बचाएगी गठिया की दवा, जानिए ऐसा होता क्यों है

कैंसर के इलाज में दी जाने वाली इम्यूनोथैरेपी के साइड इफेक्ट से बचाएगी गठिया की दवा, जानिए ऐसा होता क्यों है

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कैंसर के इलाज में दी जाने वाली इम्यूनोथैरेपी के कारण कई बार मरीजों को साइड इफेक्ट झेलना पड़ता है। लेकिन गठिया की दवा से ऐसे साइड इफेक्ट से बचा सकती है। इन दवाओं को टीएनफ अल्ट्रा इन्हीबिटर कहते हैं। गठिया के मरीजों में सूजन होने पर ये दवाएं दी जाती हैं। यह दावा जेनेवा यूनिवर्सिटी और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में किया है। शोधकर्ताओं का कहना है, कैंसर के मरीजों को इम्यूनोथैरेपी देने पर कई बार सांस लेने में कठिनाई, मांसपेशियों में दर्द, वजन बढ़ना और सिरदर्द जैसे साइड इफेक्ट दिखते हैं। ऐसे साइड इफेक्ट को रोकने में गठिया की दवाएं असरदार हैं। ऐसे हुई रिसर्चशोधकर्ता माइकल पिटेट कहते हैं, जब इम्यून सिस्टम अधिक तेजी से काम करता है तो शरीर में सूजन भी तेजी से बढ़ती है। शरीर पर इसका बुरा असर पड़ता है। कई बार स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचने लगता है। इसलिए हम चाहते थ...
दूध से होने वाली एलर्जी को रोकने के लिए गाय के जीन्स से वो प्रोटीन हटाया जो इसे पचाने में दिक्कत करता है

दूध से होने वाली एलर्जी को रोकने के लिए गाय के जीन्स से वो प्रोटीन हटाया जो इसे पचाने में दिक्कत करता है

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रशिया के वैज्ञानिकों ने देश की पहली 'क्लोनिंग काउ' तैयार की है। इस गाय के जीन में ऐसे बदलाव किए गए हैं कि इससे निकलने वाले दूध से इंसानों को एलर्जी न हो सके। दुनियाभर में 70 फीसदी ऐसे लोग हैं जिन्हें दूध से किसी न किसी तरह की एलर्जी है। इसी को कंट्रोल करने के लिए यह प्रयोग किया जा रहा है। ऐसे तैयार हुई 'क्लोनिंग काउ'गाय के क्लोन को तैयार करने के लिए इसके भ्रूण के जीन में मनमुताबिक बदलाव किया गया। फिर इस भ्रूण को गाय के गर्भ में ट्रांसफर कर दिया जाता है। पैदा होने के बाद नए बछड़े की जांच करके यह जाना जाता है कि उसमें बदलाव हुए हैं या नहीं। रशिया में भी ऐसा ही किया गया है। इस तरह का प्रयोग आमतौर पर चूहों में अधिक किया जाता है। दूसरे बड़े जानवरों में क्लोनिंग करने पर खर्च अधिक आने के साथ उनकी ब्रीडिंग में भी मुश्किले आती हैं। ऐसे कम होगा दूध से एलर्जी का खतराशोधकर्ताओं का कहना है, एल...
मैजिक मशरूम से हो सकेगा डिप्रेशन का इलाज, इसमें मौजूद दवा का असर एक महीने बाद तक बरकरार रहता है

मैजिक मशरूम से हो सकेगा डिप्रेशन का इलाज, इसमें मौजूद दवा का असर एक महीने बाद तक बरकरार रहता है

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मैजिक मशरूम से डिप्रेशन का इलाज भी किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है, इसमें मौजूद साइलोसायबिन नाम का कम्पाउंड एंटीडिप्रेसेंट दवा की तरह काम करता है। यह ब्रेन और न्यूरॉन के बीच के कनेक्शन को बेहतर बनाता है। यही कनेक्शन डिप्रेशन को घटाने का काम करता है। यह दावा येल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है। चूहे पर हुई रिसर्च जर्नल न्यूरॉन में पब्लिश रिसर्च कहती है कि चूहे को साइलोसायबिन देने के बाद सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। उनके बिहेवियर में सुधार देखा गया है चूहे में दवा का असर एक महीने बाद तक बरकरार रहा। वैज्ञानिकों का कहना है, ड्रग की एक डोज का असर लम्बे समय तक रहता है। ऐसे बनती है डिप्रेशन की स्थिति शोधकर्ता क्वान का कहना है, ऐसा माना जाता है कि डिप्रेशन की स्थिति तब बनती है, जब न्यूरल कनेक्शन कमजोर हो जाता है। नई दवा इस कनेक्शन को 10 फीसदी...
देश में कोरोना की तीसरी लहर अगस्त में और पीक सितम्बर में आ सकता है; जुलाई के दूसरे हफ्ते से मामलों की संख्या बढ़ सकती है इसलिए अलर्ट रहें

देश में कोरोना की तीसरी लहर अगस्त में और पीक सितम्बर में आ सकता है; जुलाई के दूसरे हफ्ते से मामलों की संख्या बढ़ सकती है इसलिए अलर्ट रहें

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कोरोना की तीसरी लहर अगस्त में और पीक सितम्बर में आ सकता है। यह दावा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में किया गया है। रिपोर्ट कहती है, अगर वर्तमान डाटा को मानें तो जुलाई के दूसरे हफ्ते से तीसरी लहर शुरुआत हो सकती है। रोजाना कोरोना के 10 हजार मामलों के साथ बढ़त हो सकती है। दूसरी लहर की तरह खतरनाकSBI की रिपोर्ट कोरोना के पिछले ट्रेंड के आधार पर तैयार की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना की तीसरी लहर भी दूसरी की तरह खतरनाक हो सकती है। हालांकि, दूसरी लहर के मुकाबले मौतों की संख्या कम हो सकती है। जुलाई में शुरू हुई बढ़तदूसरी लहर के दौरान, देश में कोरोना के मामलों का पीक 7 मई को आया था। इस दौरान 24 घंटे में कोविड-19 के 4,14,188 मामले सामने आए। 5 जुलाई को कोरोना के नए मामलों में बढ़त हुई और 39,796 मामले सामने आए। अब तक 4 लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इसमें 723 मौत के ताजा मामले हैं। ...
सिरदर्द के 4 कारण जिन्हें लोग नहीं जानते, प्याज और प्रोसेस्ड फूड बढ़ाते हैं दर्द; सीने-कंधे में परेशानी भी इसकी वजह बन सकते हैं

सिरदर्द के 4 कारण जिन्हें लोग नहीं जानते, प्याज और प्रोसेस्ड फूड बढ़ाते हैं दर्द; सीने-कंधे में परेशानी भी इसकी वजह बन सकते हैं

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हार्वर्ड से जुड़ी न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सैत आशिना कहती हैं, माइग्रेन और तनाव से होने वाले सिरदर्द या क्लस्टर सिरदर्द को बढ़ाने वाले कारणों को ट्रिगर कहा जाता है। अधूरी नींद, प्रोसेस्ड फूड और गंध के अलावा भी कई ऐसे कारण हैं सिरदर्द की वजह बनते हैं। जानिए सिरदर्द के लाइफस्टाइल से जुड़े कारण... नींद: दर्द का है सम्बंधनींद की कमी से माइग्रेन और तनाव के कारण सिरदर्द होता है। हालांकि, अबतक इसका सीधा कारण पता नहीं चल पाया है। लेकिन, विज्ञान के मुताबिक, दर्द और नींद का आपस में संबंध जरूर है। अच्छी नींद से सिरदर्द दर्द कम होता है। डाइट: प्रोसेस्ड फूड से खतराकुछ खाद्य पदार्थ जैसे बीन्स, दालें, केला, चीज, डेयरी प्रोडक्ट और प्याज माइग्रेन के दर्द को बढ़ा देते हैं। प्रोसेस्ड फूड जिनमें नाइट्राइट्स, मोनो सोडियम ग्लूटामेट पाए जाते हैं उनसे भी सिरदर्द बढ़ता है। एनवायरनमेंट: तेज गंध भी सिरदर्द का कारण...
सदी के अंत तक इंसान 130 साल की उम्र तक जी सकेगा, पिछले एक दशक में लम्बी उम्र वालों की संख्या बढ़ी; अभी 118 साल की केन सबसे उम्रदराज

सदी के अंत तक इंसान 130 साल की उम्र तक जी सकेगा, पिछले एक दशक में लम्बी उम्र वालों की संख्या बढ़ी; अभी 118 साल की केन सबसे उम्रदराज

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ज्यादातर लोग मानते हैं कि दुनियाभर में बढ़ती बीमारियां इंसान की उम्र को घटा रही हैं, लेकिन हालिया रिसर्च के नतीजे चौंकाने वाले हैं। नई रिसर्च कहती है, इंसान की उम्र में इजाफा हुआ है। अब इंसान 130 साल तक जी सकता है। इतना ही नहीं, बीते एक दशक में लम्बी उम्र वालों की संख्या बढ़ी है। यह दावा वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने किया है। सदी के अंत तक दिखने लगेगा असरअमेरिकी शोधकर्ताओं ने इंसान की औसत उम्र निकालने के लिए दीर्घायु से जुड़े अंतरराष्ट्रीय डाटाबेस का प्रयोग किया। यह डाटा जर्मनी के मैक्स प्लैंक संस्थान ले लिया गया है। रिसर्च में सामने आया कि भविष्य में इंसान की उम्र बढ़ेगी। सदी के अंत तक इंसान 125 से 130 साल की उम्र तक जी सकेगा। सुपरसेंटेरियन लोगों की निगरानी कीशोधकर्ताओं के मुताबिक, वर्तमान में भी कई लोग 130 साल की उम्र तक जी सकते हैं। वैज्ञानिकों ने 100 से अधिक उम्र वाले सुप...
वैज्ञानिकों ने गाय के पेट में जीवाणुओं का ऐसा समूह खोजा जिसमें 3 तरह के प्लास्टिक को पचाने की ताकत; ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिकों का दावा

वैज्ञानिकों ने गाय के पेट में जीवाणुओं का ऐसा समूह खोजा जिसमें 3 तरह के प्लास्टिक को पचाने की ताकत; ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिकों का दावा

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गाय प्लास्टिक भी पचा सकती है। वैज्ञानिकों को गाय के पेट में जीवाणुओं का ऐसे समूह मिला है जो प्लास्टिक पचा सकता है। ये जीवाणु पेट में पहुंचने वाली प्लास्टिक को टुकड़ों में तोड़बर पचा देते हैं। यह दावा ऑस्ट्रिया की यूनिवर्सिटी ऑफ नेचुरल रिर्सोसेज एंड लाइफ साइंसेज के वैज्ञानिकों ने किया है। वैज्ञानिकों का कहना है, गाय के रूमेन रेटिकुलम में ऐसे जीवाणओं का समूह पाया जाता है जो खाना पचाने का काम भी करते हैं। रूमेन रेटिकुलम गाय के पाचनतंत्र का एक हिस्सा होता है। जीवाणु तीन तरह के प्लास्टिक को पचाने में असरदारइसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने तीन तरह के प्लास्टिक का इस्तेमाल किया गया। पहला, पॉलिथिलीन टेराफथेलेट था। यह एक सिंथेटिक पॉलीमर है जिसका इस्तेमाल पैकेजिंग और टेक्सटाइल इंडस्ट्री में किया जाता है। दूसरा प्लास्टिक पॉलीब्यूटिलीन एडिपेट टेरेफ़्थेलेट है, इसका इस्तेमाल प्लास्टिक बैग बनाने म...
पेनकिलर एस्प्रिन 18 तरह के कैंसर से मौत का खतरा 20% तक घटा सकती है, 2.5 लाख मरीजों पर हुई रिसर्च में साबित हुआ

पेनकिलर एस्प्रिन 18 तरह के कैंसर से मौत का खतरा 20% तक घटा सकती है, 2.5 लाख मरीजों पर हुई रिसर्च में साबित हुआ

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सस्ती और असरदार पेनकिलर कही जाने वाली दवा एस्प्रिन ब्रेस्ट, कोलोन और प्रोस्टेट जैसे कैंसर से मौत का खतरा 20 फीसदी तक घटा सकती है। रिसर्च करने के वाले कार्डिफ यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है, 18 तरह के कैंसर और एस्प्रिन के बीच सम्बंध को समझा गया। 2,50,000 मरीजों पर हुई रिसर्च में सामने आया कि ये 18 तरह के कैंसर से होने वाली मौत का खतरा कम कर सकती है। क्या काम करती है दवा, ये जानिएशोधकर्ताओं के मुताबिक, कैंसर बढ़ने पर यह शरीर के अलग-अलग हिस्सों में तेजी से फैलने लगता है। एस्प्रिन कैंसर को पूरे शरीर फैलने से रोकती है। यही कारण है कि कैंसर के इलाज में एस्प्रिन एक कारगर दवा के तौर पर जानी जाती है। रिसर्च रिपोर्ट कहती है कि कैंसर के मरीजों में जागरुकता होनी चाहिए कि वो डॉक्टर से एस्प्रिन लेने के लिए कह सकें। पिछले 50 सालों से एस्प्रिन के असर पर रिसर्च करने वाले प्रोफेसर पीटर एल्वुड का...