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लाइफस्टाइल

पेनकिलर एस्प्रिन 18 तरह के कैंसर से मौत का खतरा 20% तक घटा सकती है, 2.5 लाख मरीजों पर हुई रिसर्च में साबित हुआ

पेनकिलर एस्प्रिन 18 तरह के कैंसर से मौत का खतरा 20% तक घटा सकती है, 2.5 लाख मरीजों पर हुई रिसर्च में साबित हुआ

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सस्ती और असरदार पेनकिलर कही जाने वाली दवा एस्प्रिन ब्रेस्ट, कोलोन और प्रोस्टेट जैसे कैंसर से मौत का खतरा 20 फीसदी तक घटा सकती है। रिसर्च करने के वाले कार्डिफ यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है, 18 तरह के कैंसर और एस्प्रिन के बीच सम्बंध को समझा गया। 2,50,000 मरीजों पर हुई रिसर्च में सामने आया कि ये 18 तरह के कैंसर से होने वाली मौत का खतरा कम कर सकती है। क्या काम करती है दवा, ये जानिएशोधकर्ताओं के मुताबिक, कैंसर बढ़ने पर यह शरीर के अलग-अलग हिस्सों में तेजी से फैलने लगता है। एस्प्रिन कैंसर को पूरे शरीर फैलने से रोकती है। यही कारण है कि कैंसर के इलाज में एस्प्रिन एक कारगर दवा के तौर पर जानी जाती है। रिसर्च रिपोर्ट कहती है कि कैंसर के मरीजों में जागरुकता होनी चाहिए कि वो डॉक्टर से एस्प्रिन लेने के लिए कह सकें। पिछले 50 सालों से एस्प्रिन के असर पर रिसर्च करने वाले प्रोफेसर पीटर एल्वुड का...
25 मिनट तक नींद न आए तो बिस्तर छोड़कर कोई किताब पढ़ें, सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल खड़े होकर करें; जानिए ये तरीके कैसे काम करते हैं

25 मिनट तक नींद न आए तो बिस्तर छोड़कर कोई किताब पढ़ें, सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल खड़े होकर करें; जानिए ये तरीके कैसे काम करते हैं

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पिछले एक साल में कोरोना के चलते नींद की समस्या से पीड़ित लोगों की संख्या में 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यह आंकड़ा भले ही अमेरिका का है, लेकिन कोरोनाकाल में नींद पर ऐसे ही दुष्प्रभाव दुनियाभर में देखे जा सकते हैं। अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन के मुताबिक, पिछले साल हुए एक सर्वे में 20% अमेरिकी युवाओं ने महामारी के कारण नींद को लेकर समस्या बताई थी, वहीं मार्च 2021 में किए गए सर्वे में ऐसे लोगों की संख्या 60% पहुंच तक गई है। नींद क्यों नहीं आती, इसके खतरे क्या हैं और इस समस्या को कैसे दूर करें, न्यूरोलॉजी एंड स्लीप सेंटर नई दिल्ली की स्लीप स्पेशलिस्ट डॉ. मनवीर भाटिया से जानिए.... ये हैं नींद न आने की वजह और खतरेएक्सपर्ट कहते हैं, लोग सोने के लिए बिस्तर पर देरी से जा रहे हैं और सामान्य दिनों की तुलना में अधिक समय तक बिस्तर पर लेटे रहते हैं, जिससे उनका सर्केडियन रिदम बिगड़...
बिना दिल के 555 दिन बिताने वाले शख्स की कहानी, एक दिन ऐसा भी आया जब कृत्रिम हार्ट ने 26 बार काम करना बंद किया

बिना दिल के 555 दिन बिताने वाले शख्स की कहानी, एक दिन ऐसा भी आया जब कृत्रिम हार्ट ने 26 बार काम करना बंद किया

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मिशिगन के रहने वाले स्टेन लार्किन की लाइफ चुनौतीभरी रही है। हार्ट डोनर के इंतजार में स्टेन ने 555 दिन बिना हार्ट के बिताए। इस दौरान सिंकआर्केडिया नाम की डिवाइस ने कृत्रिम हृदय की तरह काम किया। यह डिवाइस हर वक्त स्टेन के साथ रही। ऐसी डिवाइस का इस्तेमाल तब किया जाता है, जब इंसान के दिल के दोनों हिस्से काम करना बंद कर देते हैं। 16 साल की उम्र बीमारी का पता चलास्टेन का हार्ट इतनी बुरी स्थिति में पहुंच चुका है, इसका पता तब चला जब वो 16 साल के थे। एक दिन बास्केट बॉल खेलते समय अचानक गिर पड़े। हालत बेहद नाजुक हो गई। हॉस्पिटल में हुई जांच रिपोर्ट में सामने आया कि वो एरिथमोजेनिक राइट वेंट्रीकुलर डिस्प्लेक्सिया नाम की बीमारी से जूझ रहे हैं। यह ऐसी बीमारी है जिसमें धड़कन अनियमित हो जाती हैं। कभी भी कार्डियक अरेस्ट हो सकता है, खासतौर पर एथलीट्स में। चूंकि स्टेन बास्केट बॉल प्लेयर रहे हैं इसलिए खतरा ...
वैक्सीन लगवाने से पहले न लें पेनकिलर्स, यह टीके के असर को कम कर सकती है; साइड इफेक्ट दिखने पर एक्सपर्ट की सलाह से ही दवाएं लें

वैक्सीन लगवाने से पहले न लें पेनकिलर्स, यह टीके के असर को कम कर सकती है; साइड इफेक्ट दिखने पर एक्सपर्ट की सलाह से ही दवाएं लें

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वैक्सीन लगवाने से पहले पेनकिलर्स न लें। यह चेतावनी विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने सोशल मीडिया पर चल रही एक अफवाह का खंडन करते हुए दी है। सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाह में दावा किया जा रहा है कि वैक्सीन लेने से पहले पेनकिलर्स लें। ये दवा वैक्सीन के साइड इफेक्ट को कम करती है, जबकि यह दावा गलत है। असर कम हो सकता हैयूरोन्यूज को दिए एक बयान में WHO ने कहा है कि किसी भी शख्स को वैक्सीन लेने से पहले पेनकिलर लेने की सलाह नहीं दी गई है। ऐसा करने पर वैक्सीन पर असर कम हो सकता है। साइड इफेक्ट्स रोकने के लिए वैक्सीनेशन से पहले पैरासिटामॉल जैसे पेनकिलर्स लेने की बात भी कभी नहीं कही गई। सिर्फ ऐसी स्थिति में लें पेनकिलर्सविश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है, वैक्सीन लगवाने के बाद कुछ खास लक्षण जैसे दर्द, बुखार, सिरदर्द और मांसपेशियों में दर्द होने पर ही पेनकिलर्स ले सकते हैं, वो डॉक्टरी सलाह के बाद। वैक्...
वैज्ञानिकों ने वजन घटाने वाली डिवाइस बनाई, दावा; इसे जबड़े में लगाकर दो हफ्तों में 6 किलो से ज्यादा वजन घटाया गया

वैज्ञानिकों ने वजन घटाने वाली डिवाइस बनाई, दावा; इसे जबड़े में लगाकर दो हफ्तों में 6 किलो से ज्यादा वजन घटाया गया

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न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों ने दुनिया की पहली वेटलॉस डिवाइस बनाई है जो वजन को घटाने में मदद करती है। इसका नाम डेंटलस्लिम डाइट कंट्रोल रखा गया है। वैज्ञानिकों का दावा है, यह डिवाइस जबड़े को लॉक करके मोटापा घटाती है। इस डिवाइस का ट्रायल किया गया है। ट्रायल के दौरान 2 हफ्तों के अंदर लोगों ने 6.36 किलो वजन घटाया। ऐसे काम करती है डिवाइस सबसे पहले इस डिवाइस को ऊपर और नीचे के जबड़ों में अलग-अलग फिक्स किया जाता है।डिवाइस में चुम्बक लगे होने के कारण इंसान का मुंह 2 एमएम से ज्यादा नहीं खुल पाता है।नतीजा, इंसान आसानी से मोटा अनाज चबा नहीं पाता उसे लिक्विड डाइट पर निर्भर रहना पड़ता है और वजन नहीं बढ़ता है।दावा, बोलने की क्षमता पर नहीं डालती बुरा असर डिवाइस को तैयार करनी वाली ओटेगो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है, इसे लगाने से इंसान के बोलने की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता और न ही सांस लेने...
प्राकृतिक आपदा में फंसे होने की लोगों की आवाज पहचानकर बचाने वाला ड्रोन, यह गंध सूंघकर भी पता लगा सकेगा कि पीड़ित कहां है

प्राकृतिक आपदा में फंसे होने की लोगों की आवाज पहचानकर बचाने वाला ड्रोन, यह गंध सूंघकर भी पता लगा सकेगा कि पीड़ित कहां है

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जर्मनी के वैज्ञानिकों ने ऐसा ड्रोन तैयार किया है जो प्राकृतिक आपदा में फंसे लोगों को उनकी चीख-पुकार सुनकर बचा सकेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस यह ड्रोन इंसान, जानवर और इसके पंखों की आवाज में फर्क कर सकता है। ट्रायल के दौरान इंसान के चिल्लाने, तालियों और किसी चीज के टकराने जैसी आवाजें इसे सुनाई गईं और टेस्टिंग सफल रही। इसे वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है। पीड़ितों को सूंघ भी सकेगावैज्ञानिकों के मुताबिक, इस ड्रोन को इस तरह से तैयार किया जा रहा है कि यह आपदा में फंसे लोगों की गंध सूंघकर उनका पता लगा सके। ठीक वैसे ही जैसे कुत्ते की ब्लडहाउंड नस्ल गंध सूंघकर इंसान का पता लगा लेती है। इसे तैयार करने वाली टीम की सदस्य वेरेला कहती हैं, अगर कहीं कोई इमारत ध्वस्त हो गई है तो यह रेस्क्यू टीम को अलर्ट कर सकता है। ऐसे तैयार हुआ ड्रोन वैज्ञानिकों ने मुसीबत में फंसे लोगो...
70 साल की कोशिशों के बाद मलेरिया मुक्त हुआ चीन, कभी हर साल यहां 3 करोड़ मामले सामने आते थे; जानिए चीन ने मलेरिया पर कैसे काबू पाया

70 साल की कोशिशों के बाद मलेरिया मुक्त हुआ चीन, कभी हर साल यहां 3 करोड़ मामले सामने आते थे; जानिए चीन ने मलेरिया पर कैसे काबू पाया

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70 साल की लगातार कोशिशों के बाद चीन मलेरिया मुक्त हो गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसकी घोषणा की है। 40 के दशक में हर साल चीन में मलेरिया के 3 करोड़ मामले सामने आते थे। चीन वेस्टर्न पेसिफिक रीजन का पहला देश है जहां पिछले 4 साल में मलेरिया का एक भी मामला नहीं मिला है। WHO के महानिदेशक टेड्रोस गैब्रिएसस का कहना है, चीन ने यह सफलता दशकों की कड़ी मेहनत के बाद पाई है। इस घोषणा के साथ चीन उन देशों में शामिल हो गया है जो यह साबित कर चुके हैं कि देश को मलेरिया मुक्त बनाया नामुमकिन नहीं है। वो चीनी रणनीति जिससे मलेरिया पर काबू पायामलेरिया से निपटने के लिए चीन ने 2012 में 1-3-7 की रणनीति लागू की। स्वास्थ्य कर्मियों के लिए टार्गेट तय किए किए। रणनीति के मुताबिक, 1 दिन के अंदर मलेरिया के मामले को रिपोर्ट करना अनिवार्य किया गया। 3 दिन के अंदर इस मामले की पड़ताल करना और इससे होने वाले खतरे...
महामारी में अपनों में दूर हुए डॉक्टर्स बोले; उस मुश्किल दौर में हम डॉक्टर्स होने के साथ मरीज के लिए फैमिली भी थे, कैसे पीछे हटते

महामारी में अपनों में दूर हुए डॉक्टर्स बोले; उस मुश्किल दौर में हम डॉक्टर्स होने के साथ मरीज के लिए फैमिली भी थे, कैसे पीछे हटते

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चुनौती भरा एक-एक लम्हा और पल-पल बढ़ते मौतों के आंकड़े ने सबसे ज्यादा परेशान डॉक्टर्स को किया। मरीजों को बचाने की जद्दोजहद में ये अपनों से दूर हुए। कई रातों तक सो नहीं पाए। इनमें से कई डॉक्टर्स ऐसे भी थे, जिन्होंने अपनों को खोया लेकिन मरीजों का साथ नहीं छोड़ा। आज डॉक्टर्स डे है। यह दिन जाने-माने डॉक्टर बिधान चंद्र रॉय की याद में मनाया जाता है। डॉ. बिधान चंद्र स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री भी रहे।महामारी के इस दौर में अभी भी डॉक्टर्स और आम लोगों के लिए चुनौतियों का दौर खत्म नहीं हुआ है। डॉक्टर्स डे के इस मौके पर जानिए, महामारी ने डॉक्टर्स का जीवन कितना बदला और क्या सबक दिए... कोरोना की दूसरी लहर में मरीजों में नए तरह के मामले ज्यादा दिखे मसीना हॉस्पिटल मुम्बई की कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. सोनम सोलंकी कहती हैं, महामारी का सामना करते हुए एक साल...
तीसरी लहर को रोकने के लिए डेल्टा प्लस से बचाव करना जरूरी, एक्सपर्ट से जानिए कोरोनावायरस से कैसे बना खतरनाक डेल्टा प्लस वैरिएंट

तीसरी लहर को रोकने के लिए डेल्टा प्लस से बचाव करना जरूरी, एक्सपर्ट से जानिए कोरोनावायरस से कैसे बना खतरनाक डेल्टा प्लस वैरिएंट

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देश में कोरोना के नए रूप डेल्टा प्लस के करीब 50 मामले मिल चुके हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में इसके मिलने की पुष्टि भी हो चुकी है। कौन सी वैक्सीन इस वैरिएंट पर अधिक असरदार है, यह जानकारी सामने आना बाकी है, लेकिन हालिया रिसर्च में सामने आया है कि कोवैक्सीन डेल्टा प्लस वैरिएंट पर असरदार है। एक्सपर्ट्स का कहना है, तीसरी लहर को रोकने के लिए डेल्टा प्लस से बचाव करना जरूरी है। मुम्बई के मसीना हॉस्पिटल में संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. तृप्ति गिलाडा से जानिए, डेल्टा प्लस वैरिएंट कैसे बना और यह कितना खतरनाक है... कोरोनावायरस से कैसे बना डेल्टा प्लस वैरिएंट?डॉ. तृप्ति कहती हैं, दूसरे वायरस की तरह कोरोना भी रेप्लिकेट होता है, यानी अपनी संख्या को बढ़ाता है। इस दौरान वायरस में म्यूटेशन होता है। यह वायरस में एक तरह का होने वाला बदलाव है। इस तरह वायरस में हज...
5 हजार साल पहले ‘काली मौत’ महामारी फैलाने वाला बैक्टीरिया प्राचीन शिकारी की खोपड़ी में मिला, जर्मनी के वैज्ञानिकों का दावा

5 हजार साल पहले ‘काली मौत’ महामारी फैलाने वाला बैक्टीरिया प्राचीन शिकारी की खोपड़ी में मिला, जर्मनी के वैज्ञानिकों का दावा

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जर्मनी के वैज्ञानिकों ने 5 हजार साल पुराने उस बैक्टीरिया को खोज लिया है जिसने 14वीं सदी में 'काली मौत' नाम की महामारी फैलाई थी। बैक्टीरिया का नाम यर्सिनिया पेस्टिस है, इसे एक प्राचीन शिकारी की खोपड़ी से खोजा गया है। रिसर्च के दौरान यह साबित भी हो चुका है। अब तक माना जाता था कि 'काली मौत' यानी 'ब्लैक डेथ' प्लेग का बैक्टीरिया एक हजार साल पुराना है, लेकिन नई रिसर्च कहती है कि इसका वंश 7 हजार साल पुराना है। यह दावा जर्मनी की कील यूनिवर्सिटी ने अपनी हालिया रिसर्च में किया है। मौत के समय शिकारी की उम्र 20 से 30 साल थीकील यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता क्रॉस कियोरा का कहना है, हमें जिस शिकारी की खोपड़ी से यह बैक्टीरिया मिला है, मौत के समय उसकी उम्र करीब 20 से 30 साल थी। खोपड़ी को RV2039 नाम दिया गया है। लाटविया के रिन्नूकाल्न्स इलाके में इस शिकारी को करीब 5 हजार साल पहले दफनाया गया था। वैज्ञानिकों...