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45 वर्षीय अर्नब के पेट में 10 किलो का कैंसरस ट्यूमर सर्जरी करके निकाला गया

45 वर्षीय अर्नब के पेट में 10 किलो का कैंसरस ट्यूमर सर्जरी करके निकाला गया

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कोलकाता के रहने वाले 45 वर्षीय अर्नब मुखर्जी के पेट से सर्जरी करके 10 किलो का ट्यूमर निकाला गया है। डॉक्टर्स का कहना है, सर्जरी से पहले मरीज पेट के तेज दर्द से परेशान था, लेकिन कई दौर की जांचों के बाद ट्यूमर का पता चल पाया। मरीज में रेट्रोपेरिटोनियम सरकोमा कैंसर की पुष्टि हुई है। इसी साल अगस्त में अर्नब तेज पेट दर्द की शिकायत होने पर स्थानीय डॉक्टर के पास पहुंचे, लेकिन वो ट्यूमर का पता नहीं लगा सके। कुछ समय बाद पेट का आकार चार गुना बढ़ने पर डॉक्टर्स से सम्पर्क किया तो जांच में कैंसरस ट्यूमर की पुष्टि हुई। मरीज में रेट्रोपेरिटोनियम सरकोमा कैंसर का पता चला।...
7 फीट की रुमेयसा दुनिया की सबसे लंबी महिला, एक बीमारी के कारण लम्बाई तो बढ़ी पर हड्डियां मजबूत नहीं हो पाईं

7 फीट की रुमेयसा दुनिया की सबसे लंबी महिला, एक बीमारी के कारण लम्बाई तो बढ़ी पर हड्डियां मजबूत नहीं हो पाईं

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तुर्की की रुमेयसा गेलगी ने दुनिया की सबसे लंबी महिला होने का गिनीज रिकॉर्ड अपने नाम किया है। 24 वर्षीय रुमेयसा की लंबाई 7.01 फीट है। उन्हें वीवर सिंड्रोम नाम की बीमारी है। इसकी वजह से शरीर की लंबाई असामान्य तौर पर बढ़ती है। हालांकि, हडि्डयां उतनी मजबूत नहीं हो पातीं। इसलिए रुमेयसा व्हीलचेयर पर रहती हैं। रुमेयसा कहती हैं, हर खामी को खूबियों में तब्दील किया जा सकता है। इसलिए आप जो भी हैं उसे स्वीकार करें। अपनी क्षमताओं को समझें और जो बेहतर है वो करें।...
डिप्रेशन से जूझ रहे हैं तो वॉक पर जाएं, सोशल मीडिया से दूरी बनाएं और एक्सरसाइज से बेहतर होगी मन की सेहत

डिप्रेशन से जूझ रहे हैं तो वॉक पर जाएं, सोशल मीडिया से दूरी बनाएं और एक्सरसाइज से बेहतर होगी मन की सेहत

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट कहती है, दुनियाभर में लगभग 80 करोड़ लोग किसी न किसी तरह की मानसिक समस्या से जूझ रहे हैं। पूरी दुनिया में 15 से 29 वर्ष की उम्र के युवाओं में मौत की सबसे बड़ी वजह सुसाइड है। इसका सबसे बड़ा कारण है डिप्रेशन। एक्सपर्ट कहते हैं, कम या बहुत अधिक नींद, भोजन में पोषक तत्वों की कमी, असंतुलित जीवनशैली, एक्सरसाइज से दूरी के साथ रोजमर्रा की जिंदगी में बढ़ता तनाव सेहत को बिगाड़ रहा है। एक रिसर्च के मुताबिक, पौष्टिक आहार लेने भर से ही डिप्रेशन में 25 से 30 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। रोज की आदतों में भी बदलाव करके मेंटल हेल्थ को बेहतर रखा जा सकता है।...
इंसान भी गिरगिट की तरह रंग बदल सकेगा, वैज्ञानिकों ने माहौल के मुताबिक रंग बदलने वाली आर्टिफिशियल स्किन तैयार की

इंसान भी गिरगिट की तरह रंग बदल सकेगा, वैज्ञानिकों ने माहौल के मुताबिक रंग बदलने वाली आर्टिफिशियल स्किन तैयार की

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इंसान भी गिरगिट की तरह रंग बदल सकेंगे। ये जिस जगह से गुजरेंगे अपनी शरीर का रंग वैसा ही बदल सकेंगे। साउथ कोरियाई वैज्ञानिकों ने ऐसी आर्टिफिशियल स्किन तैयार की है जो गिरगिट की तरह काम करती है। इसे तैयार करने वाली सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है, यह रियल टाइम में बैकग्राउंड के मुताबिक अपना रंग बदलती है। जो भविष्य में बड़ा बदलाव ला सकती है।...
प्लास्टिक वाले बच्चों के खिलौनों, शैंपू और फूड कंटेनर्स में मौजूद केमिकल से हर साल 1 लाख अकाल मौतों का खतरा

प्लास्टिक वाले बच्चों के खिलौनों, शैंपू और फूड कंटेनर्स में मौजूद केमिकल से हर साल 1 लाख अकाल मौतों का खतरा

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इंसानों के लिए प्लास्टिक एक स्लो पॉइजन बनता जा रहा है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने लोगों को अलर्ट भी किया है। बच्चों के खिलौनों, शैंपू और खाने के प्लास्टिक कंटेनर में मौजूद केमिकल्स से हर साल 1 लाख लोगों की अकाल मौत हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्लास्टिक में मौजूद थैलेट्स नाम के केमिकल से अमेरिका में हर साल 55 से 65 साल के 107,000 बुजुर्गों की अकाल मौतें हो सकती हैं। पिछले एक दशक में थैलेट्स से इंसान में नपुंसकता और मोटापे का सीधा कनेक्शन पाया गया है। इसे देखते हुए कुछ देशों में इसके इस्तेमाल को कम किया गया है।...
प्लास्टिक बन रहा है ‘जहर’:प्लास्टिक वाले बच्चों के खिलौनों

प्लास्टिक बन रहा है ‘जहर’:प्लास्टिक वाले बच्चों के खिलौनों

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इंसानों के लिए प्लास्टिक एक स्लो पॉइजन बनता जा रहा है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने लोगों को अलर्ट भी किया है। बच्चों के खिलौनों, शैंपू और खाने के प्लास्टिक कंटेनर में मौजूद केमिकल्स से हर साल 1 लाख लोगों की अकाल मौत हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्लास्टिक में मौजूद थैलेट्स नाम के केमिकल से अमेरिका में हर साल 55 से 65 साल के 107,000 बुजुर्गों की अकाल मौतें हो सकती हैं। पिछले एक दशक में थैलेट्स से इंसान में नपुंसकता और मोटापे का सीधा कनेक्शन पाया गया है। इसे देखते हुए कुछ देशों में इसके इस्तेमाल को कम किया गया है।...
छोटी सी टेबलेट पानी को 99.9% तक कीटाणुमुक्त बनाएगी; अमेरिकी शोधकर्ताओं का दावा

छोटी सी टेबलेट पानी को 99.9% तक कीटाणुमुक्त बनाएगी; अमेरिकी शोधकर्ताओं का दावा

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दुनियाभर में अभी भी कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है। ऐसी जगहों के लिए वैज्ञानिकों ने खास तरह की हाइड्रोजेल टैबलेट तैयार की है। यह टैबलेट नदियों-तालाबों के पानी को एक घंटे में अंदर पीने लायक बना देगी। इस टैबलेट का एक प्रोटोटाइप तैयार किया गया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह टैबलेट पानी 99.9 फीसदी तक बैक्टीरियामुक्त बना देती है। टैबलेट तैयार करने वाली अमेरिका की टेक्सास यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है, आमतौर पर पानी को बैक्टीरियामुक्त बनाने के लिए उबालकर पिया जाता है। इसमें समय और एनर्जी दोनों लगती है, लेकिन नई हाइड्रोजेल टैबलेट से पानी को पीने लायक बनाना आसान है।...
ब्लड टेस्ट से दो साल पहले की जा सकेगी डिमेंशिया की भविष्यवाणी

ब्लड टेस्ट से दो साल पहले की जा सकेगी डिमेंशिया की भविष्यवाणी

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डिमेंशिया यानी याद्दाश्त सोचने-समझने की क्षमता का घटना। इसके मामले बुजुर्गों में सामने आते हैं। जल्द ही डिमेंशिया का पता इसके होने के 2 साल पहले ही लगाया जा सकेगा। एक ब्लड टेस्ट से इसकी जानकारी मिलेगी। जर्मनी की यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर गोटिंजेन के वैज्ञानिकों ने ब्लड टेस्ट से डिमेंशिया पता लगाने का दावा किया है। वैज्ञानिकों का कहना है, इंसान के ब्लड में ऐसे मॉलिक्यूल्स की पहचान की गई है, जिसकी मदद से 2 साल पहले ही डिमेंशिया की भविष्यवाणी की जा सकेगी। इससे इलाज और बीमारी को कंट्रोल करना आसान हो सकेगा।...
दालचीनी और बेरी से बनाई गई दवा, इससे पेशाबनली के संक्रमण और दर्द को दूर करने की कोशिश

दालचीनी और बेरी से बनाई गई दवा, इससे पेशाबनली के संक्रमण और दर्द को दूर करने की कोशिश

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दालचीनी और बेरी से बनी दवा से दर्द व संक्रमण दूर किया जा सकेगा। वैज्ञानिक दवा का ट्रायल कर रहे हैं। यह ट्रायल सिस्टाइटिस नाम की बीमारी के लिए किया जा रहा है। इस बीमारी से सबसे ज्यादा महिलाएं जूझती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है, नई दवा से संक्रमण के लिए जिम्मेदार ई-कोली और दूसरे बैक्टीरिया को इंफेक्शन फैलाने से रोका जा सकेगा।...
बीमारियों को सूंघने वाली ‘नाक’

बीमारियों को सूंघने वाली ‘नाक’

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बीमारियों को पहचानने के लिए वैज्ञानिक नई तरह की जांचों को विकसित करने में जुटे हैं। इलेक्ट्रॉनिक नोज इसका एक उदाहरण है। इलेक्ट्रॉनिक नोज के जरिए लिवर, फेफड़े और कोलोन कैंसर जैसी बीमारियों का पता लगाया जा सकता है। बीमारियों की जांच करने के लिए इस नाक को अपनी नाक पर मास्क की तरह लगाना होगा और कुछ ही समय में बीमारी का पता चल जाएगा। इसे तैयार करने वाली यूके की बायोटेक कंपनी आउलस्टोन मेडिकल का कहना है, इलेक्ट्रॉनिक नोज (ई-नोज )की मदद से कोविड का पता लगाया जा सके, इस पर भी काम किया जा रहा है। इसे ई-नोज भी कहते हैं। रिर्च के मुताबिक, आमतौर पर मरीज ब्लड, यूरिन और मल का सैम्पल देते समय सहज नहीं महसूस करता, लेकिन नई जांच मरीजों के लिए बेहद आसान साबित होगी और समय भी कम लगेगा।...